दुलारचंद यादव हत्याकांड में अनंत सिंह को मिली जमानत, पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पलटा केस

मोकामा: बिहार की राजनीति में सस्पेंस, ड्रामा और पावर का कॉकटेल एक बार फिर देखने को मिल रहा है। मोकामा के बाहुबली विधायक अनंत सिंह करीब 4 महीने बाद जेल की सलाखों से बाहर आ चुके हैं। 15-15 हजार रुपये के बेल बॉन्ड पर उन्हें पटना हाईकोर्ट से जमानत मिली है। रिहाई के बाद अनंत सिंह अपने भारी-भरकम लावलश्कर के साथ शक्ति प्रदर्शन करते हुए पटना स्थित आवास पहुंचे, जहाँ से वे आज मोकामा के लिए कूच करेंगे। लेकिन सवाल ये है कि जिस दुलारचंद यादव हत्याकांड ने बिहार चुनाव में भूचाल ला दिया था, उसमें अचानक कोर्ट ने उन्हें राहत क्यों दी? आखिर पुलिस की चार्जशीट में ऐसी कौन सी खामी रह गई जिसने ‘छोटे सरकार’ का रास्ता साफ कर दिया?

पटना हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकीलों ने धारदार दलीलें पेश कीं। बचाव पक्ष का सीधा दावा था कि अनंत सिंह पूरी तरह निर्दोष हैं और उन्हें राजनीतिक द्वेष के चलते झूठा फंसाया गया है। कोर्ट को बताया गया कि पुलिस ने चार्जशीट तो दाखिल कर दी, लेकिन अनंत सिंह के पास से कोई भी ऐसी आपत्तिजनक सामग्री (Incriminating material) बरामद नहीं हुई जो उन्हें इस कत्ल से सीधे जोड़ती हो। बचाव पक्ष ने FIR की विसंगतियों को उजागर करते हुए कहा कि आरोप के मुताबिक अनंत सिंह ने दुलारचंद के पैर की एड़ी पर गोली चलाई थी। वकील ने सवाल उठाया कि क्या पैर की एड़ी पर गोली मारना जानलेवा हमला कहा जा सकता है? न तो बार-बार फायरिंग हुई और न ही शरीर के किसी नाजुक हिस्से को निशाना बनाया गया।

इस पूरे केस का सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट पेश की गई। इस रिपोर्ट ने पुलिस की ‘गोली वाली थ्योरी’ की धज्जियां उड़ा दीं। रिपोर्ट के मुताबिक, दुलारचंद यादव की मौत गोली लगने से नहीं, बल्कि किसी ‘कठोर और भारी वस्तु’ (Hard and Blunt Substance) से लगी गंभीर अंदरूनी चोटों के कारण हुई थी। रिपोर्ट में कहा गया कि फेफड़ों और हृदय के कुचल जाने से ‘हाइपोवोलेमिक शॉक’ (Hypovolemic Shock) हुआ, जो मौत की असली वजह बना। बचाव पक्ष ने दलील दी कि अगर गोली मौत की वजह नहीं है, तो अनंत सिंह पर हत्या का सीधा आरोप कैसे टिक सकता है? उन्होंने तर्क दिया कि ये चोटें सह-आरोपियों या गाड़ियों से कुचलने की हो सकती हैं, न कि अनंत सिंह द्वारा चलाई गई तथाकथित गोली की।

केस डायरी के पैराग्राफ 212 ने अभियोजन पक्ष के दावों की पोल खोल दी। इसमें सूचक (Informant) के पिता का बयान दर्ज है, जिसमें उन्होंने कहा कि जब वे अपने ऑफिस में थे, तब उनके बेटे ने फोन पर सिर्फ इतना बताया कि ‘पिताजी की मृत्यु हो गई है’। इस शुरुआती सूचना में न तो अनंत सिंह का नाम था और न ही किसी साजिश का जिक्र। इसके अलावा, कई गवाहों ने मारपीट और फायरिंग की बात तो कही, लेकिन कोर्ट में कोई भी यह स्पष्ट नहीं कर सका कि गोली असल में किसने चलाई। गवाहों के बयानों में इस विरोधाभास ने पुलिस की जांच प्रणाली की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

याद दिला दें कि 30 अक्टूबर 2025 को पटना के बसावनचक में एक चुनावी कार्यक्रम के दौरान दो गुटों में टकराव हुआ था। FIR के मुताबिक, अनंत सिंह के काफिले और दूसरे पक्ष के बीच पहले बहस हुई, फिर मारपीट और फिर फायरिंग। आरोप था कि दुलारचंद यादव को गोली लगने के बाद अनंत सिंह के काफिले की गाड़ियां उनके ऊपर से गुजार दी गईं। घटनास्थल से FSL टीम ने टूटे कांच और मिट्टी के नमूने तो जुटाए, लेकिन कोर्ट में ये साबित करना मुश्किल हो गया कि दुलारचंद की मौत का वास्तविक कारण क्या था। क्या उन्हें कुचला गया या गोली मारी गई? इसी उलझन ने बचाव पक्ष को बढ़त दिला दी।

अनंत सिंह की रिहाई ने न केवल उनके समर्थकों में जोश भर दिया है, बल्कि विपक्षी खेमे में बेचैनी भी बढ़ा दी है। हालांकि उन्हें जमानत मिल गई है, लेकिन कानूनी तलवार अभी भी लटकी हुई है क्योंकि अंतिम फैसला आना बाकी है। इस केस ने बिहार की पुलिस जांच और साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर जो सवाल उठाए हैं, उसका जवाब मिलना अभी बाकी है। क्या ‘छोटे सरकार’ इस केस से पूरी तरह बरी हो पाएंगे? या फिर ट्रायल के दौरान कोई नया सबूत सामने आएगा?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed