कथा से साथ लौटा यादों का बायस्कोप

हिंदू सनातन परंपरा में श्रीमद् भागवत कथा का बहुत महत्व है और वह भी पुरुषोत्तम माह में आयोजित हुई कथा तो अपने आप में स्वर्ग के रास्ते खोल देती है। बचपन से अब तक यह सुनते थे कि समाज में लोगों ने श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया लेकिन किसी भी भागवत कथा में साक्षात् उपस्थिति अब तक संभव नहीं हुई थी। कुछ ऐसा संयोग हुआ कि परिवार के बड़े, भाई अशोक वशिष्ठ जी ने श्रीमद् भागवत कथा का संकल्प लिया और हम भी इस कथा में शामिल हुए।

मथुरा के चन्दनवन के रिद्धि सिद्धि हॉल में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के प्रभाव से मन अभी तक बाहर नहीं आ पाया है। कथा का ये नशा कब तक अपना असर दिखाता रहेगा ये कहना अभी मुश्किल है।इसके साथ ही यादों का बायस्कोप अपने साथ ले आया है ढेरों ऐसी स्मृतियाँ जो लंबे समय तक चलचित्र की तरह मन मस्तिष्क और अवचेतन में चलती रहेंगी। अध्यात्म की यात्रा जितनी बाहर चल रहा था , उतनी ही भीतर भी चल रही थी। ये सकारात्मक वातावरण का असर था या पवित्र ब्रजभूमि का या फिर रसिक आचार्य नंदकिशोर पांडे के सानिध्य का,कि जैसे मथुरा पहुंचे थे वैसे वापिस नहीं लौटे।
चंडीगढ़ से मथुरा के लिए चलते हुए अनेक तरह की आशंकाएं मन में थी।

40 साल से अधिक समय अत्यंत सक्रिय पत्रकारिता में बिताने के बाद न तो धार्मिक कथाओं में बहुत ज्यादा रुचि बची थी और ऊपर से जेठ के महीने में नौतपा का प्रकोप।मामला परिवार का था इसलिए हिम्मत जुटा कर किसी तरह मथुरा पहुंच गये।

श्रीमद्भागवत भारतीय वाङ्मय का मुकुटमणि है। भगवान शुकदेव द्वारा महाराज परीक्षित को सुनाया गया भक्तिमार्ग तो मानो सोपान ही है। इसके प्रत्येक श्लोक में श्रीकृष्ण-प्रेम की सुगन्धि है। बीसियों कथाएं थीं,सैकड़ों जीवंत चरित्र थे,त्रेता थे,द्वापर थे,कलियुग थे,कई कल्प थे और इन सबको जोड़ने वाली थी अध्यात्म की एक अविरल धारा।

लगभग आधी शताब्दी के बाद ब्रज की भूमि में 10 दिन तक रहने का सौभाग्य मिला। आचार्य नंदकिशोर पांडे जी जो खुद को नंदू महाराज भी कहते हैं के माध्यम से ब्रजभाषा के माधुर्य के दर्शन का भी एक अपूर्व अवसर मिला जिससे हम अभी तक अपरिचित ही थे। नंदकिशोर जी संस्कृत साहित्य में डबल आचार्य हैं। उनकी आचार्य की एक डिग्री पुरोहित्य में हैं। उनकी वाणी पर सरस्वती माता की अपार कृपा है। उनकी एक विशेषता यह भी है कि वह कथा कहते-कहते वह श्रोताओं के आध्यात्मिक स्तर को भी उन्नत करते चलते हैं। वह संस्कृतनिष्ठ हिंदी के साथ धाराप्रवाह ब्रज की ओर कब मुड़ जाते हैं पता ही नहीं चलता।हमने जिस ब्रजभाषा को अभी तक सुना था वह इसकी ग्रामीण अभिव्यक्ति ही थी। कुछ इसका भदेस स्वरूप सुना था पर इसका शुद्ध स्वरूप जो कि माधुर्य से परिपूर्ण था उसको इन दिनों में ही जानने का अवसर मिला। बचपन में माँ से ब्रज के जिन शब्दों को सुना था उनमें से कुछ को आचार्य जी की कथा में सुनकर एक विलक्षण आनंद का अनुभव हुआ। ब्रज में महिलाओं द्वारा किसी बच्चे को डांटने के लिए दी जाने वाली प्यार की गाली दारी के’ यानि सौत के पुत्र, लेज(रस्सी), दगरा(कच्चा रास्ता) डोकरी(बुढ़िया) जैसे शब्द सुनकर एक अलग तरह का अनुभव हुआ।

ये कथा ही नहीं थी परिवार का भी एक अनोखा मिलन था। बड़े भाई अशोक वासिष्ठ जो कि कथा के परीक्षित भी थे के स्नेह निमंत्रण पर कथा सुनने विस्तारित परिवार की लगभग हर शाखा से परिजन हुमहुमा कर कथा में पहुंचे। परिवार के सैकड़ों आत्मीय बंधु थे, उनमें 80 साल से अधिक के वरिष्ठजन थे तो कुछ महीने के शिशु भी थे। महाभारत के महासंग्राम में कुरुक्षेत्र के ज्योतिसर में गीता का उपदेश देते हुए जब सब तरह के तर्कों के बावजूद अर्जुन युद्ध करने को तैयार नहीं थे तब भगवान कृष्ण ने उन्हें अपना विराट स्वरूप दिखाया तो अर्जुन ने गांडीव उठा लिया। परिवार का ऐसा ही विराट स्वरूप मथुरा की कथा में देखने को मिला। सब लोग गदगद थे। कथा के दौरान लगभग सभी की कभी न कभी आंखें डबडबा आयीं थीं, यही इस मिलन की, कथा की सार्थकता है। कथा के दौरान ही 21 किलोमीटर की गोवर्धन की परिक्रमा भी की। बरसते मेघ के बीच आधी रात लाखों भक्त नंगे पांव परिक्रमा मार्ग में थे। ये पुरुषोत्तम मास चल रहा है, सो श्रद्धालुओं की संख्या काफी ज्यादा थी पर कोई हड़बड़ी नहीं, कोई जल्दी नहीं। बस एक ही स्वर था-राधे राधे श्याम मिला दे। यही भारत की आत्मा है, यही इसका प्राण तत्व।

ईरान की प्रसिद्ध लेखिका और इलस्ट्रेटर मरजान सत्रापी का अभी दो दिन पहले निधन हुआ है।उन्होंने कहा था कि अलविदा होना थोड़ा मरने जैसा होता है।कथा से, चन्दनवन से , मथुरा से, अपनों से अलविदा थोड़ा मरने जैसा ही था। कुछ हम साथ लेकर लौटें हैं तो हमारे में से बहुत कुछ वहीं रह भी गया है। जैसे हम वहां पहुंचे थे ठीक वैसे तो वापिस नहीं ही लौटें हैं।यही जीवन है। ज़िन्दगी ऐसे ही तो चलती रहती है।

लेखक- हरेश वाशिष्ठ (वरिष्ठ पत्रकार)
लेखक लंबे समय तक चंडीगढ़ के ट्रिब्यून समाचार पत्र समूह में समाचार संपादक रहे हैं।

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