नई दिल्ली के आईजीएनसीए में भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी को किया गया याद; उमड़ी गणमान्य लोगों की भीड़

भारतीय राजनीति के आकाश में अटल बिहारी वाजपेयी एक ऐसे ध्रुवतारे की तरह हैं, जिनकी चमक युगों-युगों तक इस देश का मार्गदर्शन करती रहेगी। नई दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र यानी आईजीएनसीए के समवेत सभागार में अटल जी के बहुआयामी व्यक्तित्व और उनके राष्ट्रीय योगदान को याद करते हुए एक बेहद विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के स्वायत्त संस्थान आईजीएनसीए द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में जहां अतुल पांडे द्वारा निर्देशित डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘शत शत अटल’ का भव्य प्रदर्शन हुआ, वहीं उनके बेहद करीबी रहे वरिष्ठ पत्रकार अशोक टंडन की पुस्तक ‘अटल संस्मरण’ पर गंभीर और दिलचस्प चर्चा भी आयोजित की गई।

कार्यक्रम की शुरुआत अतुल पांडे द्वारा निर्देशित और अतुल गंगवार द्वारा निर्मित डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘शत शत अटल’ की स्क्रीनिंग के साथ हुई। इस डॉक्यूमेंट्री में अटल बिहारी वाजपेयी के राजनीतिक जीवन, उनके दृढ़ नेतृत्व, दूरदर्शी राष्ट्रीय दृष्टिकोण, लोकतांत्रिक मूल्यों और उनकी गहरी मानवीय संवेदनाओं को बेहद प्रभावशाली ढंग से पिरोया गया है।

सभागार में उपस्थित दर्शकों ने इस डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से अटल जी के जीवन के कई ऐसे प्रेरक और भावनात्मक पक्षों को बेहद करीब से महसूस किया, जिसने एक समय पर पूरे देश की दिशा बदल दी थी। इस फिल्म ने वहां मौजूद हर शोधार्थी, पत्रकार और छात्र को भावुक भी किया और गर्व से भी भर दिया।

फिल्म प्रदर्शन के बाद, वरिष्ठ पत्रकार अशोक टंडन द्वारा लिखित बहुचर्चित पुस्तक ‘अटल संस्मरण’ पर एक बेहद गंभीर विमर्श का आयोजन हुआ। इस चर्चा का कुशल संचालन आईजीएनसीए के मीडिया सेंटर के प्रमुख अनुराग पुनेठा ने किया, जबकि मुख्य वक्ता के रूप में स्वयं लेखक अशोक टंडन और आईजीएनसीए के अध्यक्ष व पद्म भूषण से सम्मानित रामबहादुर राय मंच पर मौजूद रहे।

अटल जी के साथ अपने एक बेहद आत्मीय संस्मरण को साझा करते हुए रामबहादुर राय ने एक बेहद दिलचस्प वाकया सुनाया। उन्होंने कहा— सबसे पहले मैंने अटल जी को साल 1962 में सुना था। उस वक्त उनके भाषण का ऐसा क्रेज था कि हम 10-15 लोग पूरे 75 किलोमीटर साइकिल चलाकर उन्हें सुनने के लिए गए थे। रामबहादुर राय ने आगे बताया कि वाजपेयी जी की यह खासियत थी कि वो हमेशा वही बोलते थे, जो उनको बोलना होता था। कोई भी उनसे अपनी मर्जी से कुछ नहीं बुलवा सकता था, चाहे वो कोई बड़ा पत्रकार हो या फिर कोई और राजनेता।

अशोक टंडन ने पुस्तक में दर्ज उस ऐतिहासिक और दिलचस्प वाकये को भी साझा किया, जब तत्कालीन राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा ने अटल जी को पहली बार देश का प्रधानमंत्री नियुक्त किया था। इसके अलावा, लालकृष्ण आडवाणी के साथ उनके रिश्तों पर बात करते हुए उन्होंने साफ किया कि— तब की भाजपा सरकार में दोनों का कद बिल्कुल बराबर था। दोनों केवल एकदूसरे का सर्वोच्च सम्मान करते थे, बल्कि वे दोनों एकदूसरे के पूरक थे। कार्यक्रम के अंत में अनुराग पुनेठा ने इस किताब की सराहना करते हुए कहा कि हर उस शख्स को यह किताब जरूर पढ़नी चाहिए जो अटल जी के जीवन के अनछुए पहलुओं को जानना चाहता है।

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