भोपाल के कोलार में फिल्म ‘शतक’ का प्रदर्शन, संघ की शताब्दी यात्रा पर आधारित है फिल्म

भोपाल: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने सौ साल पूरे करने जा रहा है। इन सौ सालों में संघ ने समाज और राष्ट्र निर्माण में क्या भूमिका निभाई है, इसी को बयां करती फिल्म ‘शतक’ की आज भोपाल में विशेष स्क्रीनिंग की गई। विश्व संवाद केंद्र और सतपुड़ा चलचित्र समिति के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम ने भोपाल के प्रबुद्ध वर्ग और युवाओं के बीच एक नई चर्चा छेड़ दी है। फिल्म के माध्यम से संघ की वैचारिक यात्रा और उसकी कार्यपद्धति को जिस तरह से पेश किया गया है, उसने दर्शकों को भावुक भी किया और प्रेरित भी।

भोपाल के कोलार स्थित डीडीएक्स सिनेमा में आज सुबह से ही हलचल तेज़ थी। मौका था फिल्म ‘शतक’ की विशेष स्क्रीनिंग का। इस फिल्म में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 1925 से लेकर अब तक की संगठनात्मक यात्रा और उसके कार्य विस्तार को प्रभावी ढंग से दिखाया गया है। सौ से अधिक श्रोताओं ने इस फिल्म को एक ‘दस्तावेज़’ करार दिया। दर्शकों का मानना है कि ‘शतक’ केवल एक फिल्म नहीं है, बल्कि यह उन निस्वार्थ कार्यकर्ताओं की कहानी है जिन्होंने अपना पूरा जीवन राष्ट्र सेवा के लिए समर्पित कर दिया। स्क्रीनिंग में पत्रकार, शोधार्थी, समाजसेवी और शिक्षाविदों ने बड़ी संख्या में भाग लिया।

इस स्क्रीनिंग की खास बात यह रही कि कई लोग अपने परिवारों के साथ पहुंचे थे। पत्रकारिता के विद्यार्थियों और वर्तमान ‘जेन-जी’ पीढ़ी के युवाओं के लिए यह अनुभव बेहद अलग रहा। युवाओं का कहना था कि संघ के बारे में बाहर बहुत कुछ सुना जाता है, लेकिन इस फिल्म ने उन्हें संघ के वास्तविक कार्य और उसकी विचारधारा को गहराई से समझने का मौका दिया।

फिल्म प्रदर्शन के बाद हुई चर्चा में यह बात प्रमुखता से उभरकर आई कि संघ केवल एक संगठन नहीं, बल्कि एक व्यापक विचारधारा है। श्रोताओं ने कहा कि फिल्म इस तथ्य को साबित करती है कि कैसे संघ ने समाज के हर क्षेत्र में—चाहे वह शिक्षा हो, सेवा हो या सुरक्षा—समर्पित व्यक्तित्वों का निर्माण किया है। ‘शतक’ फिल्म ने यह संदेश भी दिया कि संघ का प्रभाव अब समाज के विविध क्षेत्रों में गहराई तक समाहित है और शताब्दी वर्ष में यह फिल्म उसकी वैचारिक विजय का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है।

संघ की सौ साल की यात्रा को डेढ़-दो घंटे की फिल्म में समेटना एक बड़ी चुनौती थी, जिसे ‘शतक’ ने बखूबी निभाया है। भोपाल की इस स्क्रीनिंग ने यह साबित कर दिया है कि राष्ट्र निर्माण के विचारों में आज भी उतनी ही गहराई है जितनी सौ साल पहले थी।

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