नीतीश के ‘ड्राय स्टेट’ पर अपनों का ही प्रहार! क्या 10 साल बाद बिहार में खत्म होगी शराबबंदी?

बिहार में 2016 में जब पूर्ण शराबबंदी लागू हुई थी, तो इसे एक ऐतिहासिक सामाजिक सुधार बताया गया था। लेकिन आज, 10 साल बाद नीतीश कुमार की एनडीए सरकार के भीतर ही इस कानून को लेकर बगावत के सुर तेज हो गए हैं। गठबंधन के साथी जीतनराम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी ने अब सीधे मुख्यमंत्री पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। सवाल राजस्व के नुकसान का है, सवाल गरीबों पर हो रहे अत्याचार का है और सवाल उस ‘होम डिलीवरी’ का है जिसने इस कानून की हवा निकाल दी है।

बिहार की राजनीति के दिग्गज और केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी ने गया में पत्रकारों से बात करते हुए सरकार की दुखती रग पर हाथ रख दिया है। मांझी ने तंज कसते हुए कहा कि बिहार में शराबबंदी सिर्फ कागजों पर है, असलियत में शराब की ‘होम डिलीवरी’ हो रही है। उन्होंने साफ कहा कि इस कानून की वजह से बिहार को भारी राजस्व का नुकसान हो रहा है। मांझी की दलील है कि नीति गलत नहीं है, लेकिन उसे लागू करने का तरीका पूरी तरह फेल हो चुका है।

जीतनराम मांझी ने एक डराने वाला आंकड़ा पेश किया है। उनके मुताबिक, शराबबंदी से जुड़े करीब 8 लाख मामले अदालतों में लंबित हैं, जिनमें से साढ़े तीन से चार लाख लोग समाज के सबसे गरीब और वंचित वर्ग से आते हैं। मांझी का आरोप है कि पुलिस और एजेंसियां सिर्फ छोटे प्यादों और गरीबों को पकड़ती हैं, जबकि बड़े तस्कर पैसे के दम पर बच निकलते हैं। जहरीली शराब से होने वाली मौतों ने भी सरकार की घेराबंदी तेज कर दी है।

सिर्फ मांझी ही नहीं, उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) ने भी विधानसभा के भीतर कानून की समीक्षा की मांग उठाकर जेडीयू को बैकफुट पर धकेल दिया है। पार्टी विधायक माधव आनंद ने सदन में कहा कि जब शराब अवैध रूप से मिल ही रही है, तो फिर राजस्व का नुकसान क्यों झेला जाए? सहयोगियों की ये मांग अब नीतीश कुमार के लिए सिरदर्द बन गई है क्योंकि बहुमत के लिए सरकार इन सहयोगियों पर निर्भर है।

इधर, जेडीयू अपने रुख पर अड़ी है। पार्टी प्रवक्ता नीरज कुमार ने सहयोगियों की मांग को हास्यास्पद करार दिया है। जेडीयू का तर्क है कि यह कानून सर्वसम्मति से पास हुआ था और इससे समाज में, खासकर महिलाओं के बीच सुरक्षा का भाव बढ़ा है। जेडीयू का मानना है कि शराबबंदी खत्म करने का मतलब होगा समाज को वापस अंधेरे में धकेलना।

बिहार में शराबबंदी अब केवल एक कानून नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। एक तरफ नीतीश कुमार की साख है, तो दूसरी तरफ सहयोगियों का बढ़ता दबाव और 2025 के चुनावी समीकरण। अब देखना होगा कि नीतीश कुमार इस दबाव के बीच कोई बीच का रास्ता निकालते हैं या अपनी जिद पर कायम रहते हैं।

बिहार में शराबबंदी कानून की समीक्षा की मांग अब बाहर से नहीं, बल्कि सरकार के भीतर से उठी है। जीतनराम मांझी के आंकड़ों और उपेंद्र कुशवाहा के सवालों ने नीतीश सरकार को दोराहे पर खड़ा कर दिया है।

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