सम्राट चौधरी होंगे बिहार के नए मुख्यमंत्री, बीजेपी विधायक दल की बैठक में लगा मुहर
बिहार की सियासत में आज एक नया इतिहास रचा गया है। नीतीश कुमार के विदा होने के साथ ही भारतीय जनता पार्टी ने बिहार की कमान अपने सबसे मुखर और ओबीसी चेहरे सम्राट चौधरी को सौंप दी है। सम्राट चौधरी, एक ऐसा नेता जिसने कभी नीतीश कुमार को सत्ता से हटाने के लिए पगड़ी बांधी थी, आज वही नेता बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने जा रहा है।
सम्राट चौधरी की राजनीति का सफर करीब तीन दशक पुराना है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत राबड़ी देवी की सरकार में बतौर मंत्री की थी। आरजेडी के साथ लंबा समय बिताने के बाद वे जीतन राम मांझी की सरकार का भी हिस्सा रहे। लेकिन साल 2017 में जब वे बीजेपी में शामिल हुए, तो उनकी किस्मत ने एक नई करवट ली। बीजेपी ने उन्हें पहले प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया, फिर विधान परिषद भेजा और 2025 में पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त कर दिया। उनकी संगठनात्मक क्षमता और आक्रामक तेवरों ने उन्हें बीजेपी का सबसे प्रमुख चेहरा बना दिया।
सम्राट चौधरी को राजनीति विरासत में मिली है। उनका जन्म 16 नवंबर 1968 को मुंगेर के लखनपुर गांव में हुआ था। उनके पिता शकुनी चौधरी बिहार की राजनीति के दिग्गज खिलाड़ी रहे हैं, जो सात बार विधायक और सांसद चुने गए। उनकी माता पार्वती देवी भी विधायक रह चुकी हैं। सम्राट ने मदुरई कामराज विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की और 1990 में सक्रिय राजनीति में कदम रखा। राजनीति के दांव-पेंच उन्होंने अपने पिता से सीखे और आज वे उसी विरासत को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक ले आए हैं।
सम्राट चौधरी अपनी पगड़ी के लिए भी काफी चर्चा में रहे। जब नीतीश कुमार एनडीए से अलग हुए थे, तब सम्राट ने पगड़ी बांधकर प्रतिज्ञा की थी कि वे इसे तभी उतारेंगे जब जेडीयू को सत्ता से बाहर करेंगे। हालांकि, बाद में नीतीश की वापसी और खुद डिप्टी सीएम बनने के बाद उन्होंने अयोध्या में रामलला के दर्शन कर पगड़ी खोल दी थी। उनके करियर में विवादों का भी साथ रहा—चाहे 1999 में उम्र विवाद के कारण मंत्री पद गंवाना हो, या राहुल गांधी की दाढ़ी की तुलना ओसामा बिन लादेन से करना। लेकिन इन सबके बावजूद, कोइरी जाति से आने वाले सम्राट आज बीजेपी के सबसे बड़े ओबीसी लीडर बनकर उभरे हैं।
बिहार की सत्ता में सम्राट चौधरी का राजतिलक सिर्फ एक व्यक्ति का बदलाव नहीं, बल्कि बीजेपी की दूरगामी सोच का परिणाम है। अब देखना होगा कि ‘सुशासन बाबू’ के बाद ‘सम्राट’ बिहार के विकास की गाड़ी को किस रफ़्तार से आगे बढ़ाते हैं।
