नीतीश कुमार ने राज्यपाल को सौंपा इस्तीफा, 20 साल पुराने ‘नीतीश युग’ का औपचारिक अंत
बिहार की सियासत में आज एक अध्याय का अंत हो गया है। नीतीश कुमार ने अब से कुछ ही देर पहले राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंप दिया है। करीब 20 सालों तक बिहार की कमान संभालने वाले ‘सुशासन बाबू’ ने आज भारी मन से अपनी कैबिनेट को भंग किया और सचिवालय से विदा ली।
नीतीश कुमार की राजनीति की नींव संघर्षों पर टिकी है। 1974 के जेपी आंदोलन की कोख से निकले इस नेता ने इंजीनियरिंग की डिग्री छोड़कर समाज बदलने का रास्ता चुना। लालू यादव के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले नीतीश ने जब महसूस किया कि विचारधारा से समझौता हो रहा है, तो 1994 में उन्होंने ‘समता पार्टी’ बनाकर अपनी अलग राह चुनी। यह एक ऐसे ‘चाणक्य’ का उदय था जो शोर कम और काम ज्यादा करने में विश्वास रखता था।
साल 2005 बिहार के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ। नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ मिलकर ‘न्याय के साथ विकास’ का नारा दिया। उन्होंने बिहार की छवि बदली—अपराधियों पर नकेल कसी, सड़कों का जाल बिछाया और शिक्षा में क्रांतिकारी बदलाव किए। ‘साइकिल योजना’ और ‘महिला आरक्षण’ ने उन्हें आधी आबादी का मसीहा बना दिया। यही वो स्वर्ण काल था जब देश के बड़े-बड़े अर्थशास्त्री ‘बिहार मॉडल’ की चर्चा करने लगे थे।
नीतीश कुमार की राजनीति सिर्फ विकास तक सीमित नहीं रही, वे गठबंधन की बिसात के सबसे चतुर खिलाड़ी भी साबित हुए। 2013 में एनडीए से नाता तोड़ना, 2015 में महागठबंधन की जीत और फिर 2017 में वापस एनडीए में वापसी—उनके हर कदम ने विश्लेषकों को चौंकाया। आलोचकों ने उन्हें ‘पलटू राम’ कहा, लेकिन नीतीश का तर्क हमेशा ‘बिहार का हित’ रहा। उन्होंने साबित किया कि बिहार की सत्ता का रास्ता चाहे कहीं से भी गुजरे, मंजिल सिर्फ वही होंगे।
आज का दिन विदाई का था। अपनी आखिरी कैबिनेट बैठक में नीतीश ने मंत्रियों और अधिकारियों के साथ फोटो खिंचवाए। सचिवालय की दीवारों ने आज 20 साल के इतिहास को विदा होते देखा। राज्यसभा सांसद के रूप में अब उनकी नई पारी दिल्ली में शुरू होगी। इस्तीफे के बाद 1 अणे मार्ग खाली कर वे 7 सर्कुलर रोड शिफ्ट हो रहे हैं, जो इस बात का प्रतीक है कि नीतीश अब केंद्र की बड़ी भूमिका के लिए तैयार हैं। उनके इस्तीफे के साथ ही बिहार में अब नई सरकार और नए मुख्यमंत्री के स्वागत की तैयारी शुरू हो गई है।
नीतीश कुमार का इस्तीफा सिर्फ एक पद का त्याग नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति के एक बड़े युग का विश्राम है। उन्होंने एक ऐसा बिहार छोड़ा है जो अब अपने अधिकारों के लिए लड़ना जान गया है।
