राज्यसभा चुनाव के बाद नीतीश कुमार की ‘विदाई’ तय? दो चरणों में दे सकते हैं इस्तीफा

पटना: बिहार की राजनीति में ‘टाइमिंग’ ही सब कुछ है और ऐसा लगता है कि नीतीश कुमार ने अपनी विदाई और बिहार के नए भविष्य की टाइमिंग फिक्स कर ली है। राज्यसभा चुनाव में जीत के बाद अब नीतीश कुमार के सामने MLC पद छोड़ने की संवैधानिक मजबूरी है। लेकिन खबर सिर्फ इतनी नहीं है—अंदरखाने चर्चा है कि नीतीश कुमार एक सुनियोजित रणनीति के तहत मुख्यमंत्री पद भी छोड़ने वाले हैं। सवाल ये है कि क्या बिहार को पहली बार बीजेपी का मुख्यमंत्री मिलने वाला है? और वो कौन सा चेहरा होगा जो नीतीश कुमार की विरासत को संभालेगा?

नीतीश कुमार की राजनीति हमेशा चौंकाने वाली रही है। सूत्रों की मानें तो इस बार वे ‘दो चरणों’ में सत्ता से हटेंगे। पहला चरण: राज्यसभा सदस्य चुने जाने के बाद उन्हें 30 मार्च तक विधान परिषद (MLC) की सदस्यता छोड़नी होगी। दूसरा चरण: अप्रैल के दूसरे सप्ताह तक, जब वे औपचारिक रूप से राज्यसभा की शपथ लेंगे, तब वे मुख्यमंत्री पद से भी इस्तीफा दे सकते हैं। इस रणनीति के पीछे मकसद है सत्ता का हस्तांतरण (Transfer of Power) इतनी शांति से करना कि गठबंधन में कोई दरार न दिखे। यानी अप्रैल के मध्य तक बिहार की कुर्सी पर कोई नया चेहरा नजर आ सकता है।

अब सबसे बड़ा सवाल—अगला मुख्यमंत्री कौन? बीजेपी के खेमे में हलचल तेज है। रेस में सबसे आगे मौजूदा डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी का नाम चल रहा है, जिनका कद हाल के दिनों में काफी बढ़ा है। लेकिन लिस्ट लंबी है—केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय, डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा, मंगल पांडे और दिलीप जायसवाल के साथ-साथ मुस्लिम चेहरे के तौर पर शाहनवाज हुसैन का नाम भी चर्चा में है। हालांकि, अंतिम फैसला दिल्ली दरबार यानी बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को ही करना है। 26 मार्च को ‘समृद्धि यात्रा’ के समापन के बाद एनडीए के भीतर इस पर औपचारिक मुहर लग सकती है।

नीतीश कुमार का केंद्र की राजनीति में जाना सिर्फ एक व्यक्तिगत फैसला नहीं है। इसके पीछे गहरा सियासी गणित है। अगर बीजेपी का मुख्यमंत्री बनता है, तो अगले विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी के पास राज्य में अपनी जड़ें मजबूत करने का मौका होगा। वहीं, केंद्र में जेडीयू की भूमिका और भी अहम हो जाएगी। हालांकि, यह रास्ता कांटों भरा है। जेडीयू के जमीनी कार्यकर्ताओं को इस बदलाव के लिए तैयार करना और नए मुख्यमंत्री के प्रति जनता का भरोसा जीतना एनडीए के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी।

30 मार्च की तारीख बिहार की सियासत में एक नए अध्याय की शुरुआत कर सकती है। क्या नीतीश कुमार वाकई अपनी बरसों पुरानी कुर्सी बीजेपी को सौंप देंगे? या फिर आखिरी लम्हों में कोई नया ट्विस्ट आएगा? बिहार की राजनीति ने पहले भी कई पलटी मारी है, लेकिन इस बार का बदलाव स्थायी लग रहा है।

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