‘उत्तर दा पुत्तर’ रिव्यू: कर्म और धर्म के सवालों के साथ हंसाती है फिल्म
इन दिनों बॉलीवुड में मिडिल क्लास परिवारों की कहानियों को बहुत ही पसंद किया जा रहा है. इसी कड़ी में इस हफ्ते सिनेमाघरों में दस्तक दी है एक बेहद ही मजेदार और दिल को छू लेने वाली फिल्म— ‘उत्तर दा पुत्तर’. संदीप कपूर और प्रिया कपूर के प्रोडक्शन और रविंदर सिवाच के डायरेक्शन में बनी यह फिल्म एक हल्की-फुल्की फैमिली कॉमेडी है. लेकिन हंसाने के साथ-साथ यह फिल्म एक बहुत ही गहरा सवाल भी उठाती है कि— ‘जिंदगी कर्म से चलती है या किस्मत और वास्तु से?’
आइए सबसे पहले बात करते हैं फिल्म की कहानी की. कहानी के सेंटर में हैं प्रोफेसर साई राम टुटेजा, जिनका किरदार पर्दे पर निभाया है टैलेंटेड एक्टर अन्नू कपूर ने. अब प्रोफेसर साहब पेशे से तो फिजिक्स यानी साइंस के टीचर हैं… लेकिन अपनी पर्सनल लाइफ में वो वास्तुशास्त्र, अंधविश्वास और किस्मत पर अंधा भरोसा करते हैं. सोचिए… एक तरफ साइंस का दिमाग और दूसरी तरफ अंधविश्वास की सोच. यही विरोधाभास इस फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी है.
कहानी में असली ट्विस्ट तब आता है जब प्रोफेसर टुटेजा अपने परिवार के लिए बड़ी मुश्किलों से एक ‘परफेक्ट वास्तु’ वाला घर ढूंढ निकालते हैं. उन्हें लगता है कि अब उनकी जिंदगी की सारी परेशानियां खत्म हो जाएंगी. लेकिन तभी एक ऐसी अचानक घटना घटती है, जो उनके सारे अंधविश्वास और भरोसा को हिलाकर रख देती है. इसके बाद शुरू होती है प्रोफेसर साहब की अपने रिश्तों और जिंदगी को दोबारा पटरी पर लाने की एक मजेदार और इमोशनल राइड.
अब बात करते हैं फिल्म की स्टारकास्ट और उनकी अदाकारी की. इस फिल्म की सबसे बड़ी मजबूती इसकी स्टारकास्ट ही है. अन्नू कपूर ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कॉमिक टाइमिंग और इमोशनल सीन्स में उनका कोई मुकाबला नहीं है. एक कन्फ्यूज्ड और अंधविश्वासी प्रोफेसर के रोल में उन्होंने जान फूंक दी है. पवन मल्होत्रा, बृजेंद्र काला और रुखसार रहमान जैसे मंझे हुए कलाकारों ने अपने-अपने किरदारों को बहुत ही खूबसूरती से निभाया है.
बात करें डायरेक्शन और टेक्निकल साइड की, तो डायरेक्टर रविंदर सिवाच की तारीफ करनी होगी. उन्होंने इस सीरियस मुद्दे को किसी उपदेश या भाषण की तरह नहीं, बल्कि बहुत ही लाइट-हार्टेड और एंटरटेनमेंट अंदाज़ में पेश किया है. फिल्म में दिल्ली के मिडिल क्लास माहौल को बहुत ही रियल और नेचुरल तरीके से दिखाया गया है, जिससे आम दर्शक खुद को आसानी से जोड़ पाते हैं. फिल्म के डायलॉग्स बहुत ही मजेदार हैं और बैकग्राउंड स्कोर हर कॉमिक सीन में चार चांद लगाता है.
फिल्म का सेकेंड हाफ थोड़ा धीमा पड़ता है. ऐसा लगता है कि कुछ किरदारों को थोड़ा और टाइम दिया जा सकता था. लेकिन इन छोटी-मोटी कमियों के बावजूद फिल्म अपनी पकड़ बनाए रखती है और आपको बोर नहीं होने देती. ओवरऑल बात करें तो यह एक बहुत ही साफ-सुथरी और मैसेज-ओरिएंटेड फैमिली एंटरटेनर फिल्म है. यह आपको हंसाती भी है, गुदगुदाती भी है और थिएटर से निकलते वक्त एक बहुत ही पॉजिटिव सोच देकर जाती है कि इंसान को अंधविश्वास के भरोसे रहने के बजाय अपने कर्मों पर भरोसा करना चाहिए.
अगर आप इस वीकेंड अपनी पूरी फैमिली के साथ कोई साफ-सुथरी और अच्छी फिल्म देखना चाहते हैं, तो ‘उत्तर दा पुत्तर’ आपके लिए एक परफेक्ट चॉइस है.
