सुदीप्तो सेन की फिल्म ‘चरक’ रिलीज: हजार साल पुराने ‘चरक उत्सव’ की आड़ में अंधविश्वास का खेल, बच्चों की बलि पर आधारित है कहानी

मुंबई: बॉक्स ऑफिस के ट्रेंड और चमक-धमक वाली मसाला फिल्मों से दूर रहकर, कड़वे सच को बड़े पर्दे पर उतारने का साहस हर फिल्ममेकर नहीं कर पाता। लेकिन सुदीप्तो सेन ने अपनी पिछली फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ से ये साबित कर दिया था कि वे धमकियों से डरने वाले नहीं हैं। अब सुदीप्तो एक और झकझोर देने वाली कहानी लेकर आए हैं—फिल्म का नाम है ‘चरक’। एक ऐसी फिल्म जिसे हरी झंडी देने से पहले सेंसर बोर्ड के भी पसीने छूट गए।

सुदीप्तो सेन की फिल्मों का सफर कभी आसान नहीं रहा। ‘द केरल स्टोरी’ के वक्त उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलीं, और अब ‘चरक’ को लेकर सेंसर बोर्ड ने भी कड़ा रुख अपनाया। मेकर्स के लिए फिल्म को क्लियर कराना टेढ़ी खीर साबित हुआ। लेकिन सुदीप्तो अपनी रिसर्च के साथ तैयार थे। उन्होंने सालों की मेहनत से जुटाए गए दस्तावेज और रिकॉर्ड सेंसर कमेटी के सामने रखे, तब जाकर फिल्म को ‘एडल्ट’ सर्टिफिकेट के साथ पास किया गया। यह फिल्म पूर्वी भारत के बंगाल, बिहार और ओडिशा जैसे राज्यों में सदियों से मनाए जा रहे ‘चरक उत्सव’ की पृष्ठभूमि पर आधारित है, जहाँ आस्था की आड़ में अघोरी प्रथाओं और तांत्रिक साधनाओं का काला खेल चलता है।

फिल्म की कहानी ऊंचे पहाड़ों और घने जंगलों के बीच बसे एक छोटे से गांव की है। यहाँ चरक उत्सव की तैयारी चल रही है, जहाँ माना जाता है कि देवी-देवता भक्तों की हर मुराद पूरी करते हैं। लेकिन इसी मुराद के पीछे छिपा है अंधविश्वास का वो जाली, जहाँ मासूम बच्चों की बलि देने तक की कुप्रथा आज भी जीवित है।

कहानी का केंद्र है एक पुलिस इंस्पेक्टर और उसकी लेखिका पत्नी, जिनकी शादी के 12 साल बाद भी कोई औलाद नहीं है। विज्ञान और कानून के बीच रहने वाले इस इंस्पेक्टर के मन में भी कहीं न कहीं उस उत्सव के जरिए पिता बनने का लालच जाग उठता है। इसी बीच गांव के दो बच्चे गायब हो जाते हैं और कहानी एक ऐसे मोड़ पर पहुँचती है जो दर्शकों को विचलित कर देगी।

अगर आप सोचते हैं कि अंधविश्वास सिर्फ अनपढ़ों तक सीमित है, तो ‘चरक’ का क्लाइमेक्स आपके इस भ्रम को चकनाचूर कर देगा। फिल्म दिखाती है कि कैसे ‘पढ़े-लिखे’ लोग भी अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए रुढ़ियों के आगे घुटने टेक देते हैं। अंजलि पाटिल और साहिदुर रहमान ने अपने किरदारों को जीवंत कर दिया है। सुब्रत दत्ता और नवनीश का अभिनय भी रोंगटे खड़े करने वाला है। किसी स्टूडियो के सेट के बजाय पश्चिम बंगाल के असली गांवों में शूट हुई यह फिल्म उन दर्शकों के लिए है जो सिनेमा में मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की कड़वी हकीकत देखना चाहते हैं।

‘चरक’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि उन कुरीतियों के खिलाफ एक आवाज़ है जिसे हम परंपरा मानकर ढो रहे हैं। सुदीप्तो सेन ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वे समाज के उन हिस्सों को छूने का साहस रखते हैं जिनसे दुनिया कतराती है। अगर आप भी सिनेमा में असलियत की तलाश में हैं, तो ‘चरक’ आपको ज़रूर देखनी चाहिए।

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