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चीन से लड़ाई क्या सिर्फ सरकार और सेना लड़ेगी?

अतुल गंगवार

भारतीय जनता पार्टी को केन्द्र में सरकार बनाए हुए छह वर्ष का समय हो गया है। इन छह वर्षों में अगर देखें तो देश लगातार संघर्ष करता नज़र आ रहा है। पहले पांच वर्षों के कार्यकाल में सरकार ने नोटबंदी, जीएसटी जैसे साहसिक कदम उठाये थे। सीमा पर भी पाकिस्तान की नापाक हरकतों का मुकाबला दमदार तरीके से किया था और पाकिस्तान को उसके घर में घुस कर मारा था। दूसरे कार्यकाल के आरंभ में ही धारा 370 एवं राम मंदिर जैसे मुद्दों को इस सहजता के साथ सुलझा लिया जैसे कि ये कुछ हो ही ना। इनका हौव्वा खत्म करने में सरकार ने वक्त ही नहीं लगाया। लेकिन दुर्भाग्य है इस देश का पहले पांच वर्ष के कार्यकाल में जिस सरकार को जनता ने वापिस 350 से अधिक सीटों के साथ सत्ता में वापिस लाया उसको विपक्ष आज भी मानने से इनकार कर रहा है।

कभी पाकिस्तान पर हमले का सबूत मांगने वाला विपक्ष चुनाव में मुंह की खाने वाला विपक्ष। हार का ठीकरा ईवीएम पर फोड़ने वाला विपक्ष आज भी ज़मीनी हकीकत से मुंह मोड़ रहा है। देश आज कई मोर्चों पर संघर्ष कर रहा है। आर्थिक मोर्चे पर सालों से चल रहे घोटालों के खुलने के कारण हो रही आर्थिक हानि। देश में सी ए ए, एन आर सी जैसे मुद्दों पर एक खास समुदाय का विरोध और उस विरोध के पीछे दिखायी देता विपक्षी हाथ। देश के प्रमुख विश्वविद्यालय जेएनयू, जामिया, अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी से देश के खिलाफ लगने वाले नारे। दिल्ली में हुए ताज़ा दंगे। कोरोना महामारी का प्रकोप जिससे मिल कर लड़ने की बजाय अपनी नाकामियों का ठीकरा एक दूसरे के सर फोड़ने की कोशिश करना । विदेश में नेपाल का सर उठाना, चाइना का गलवान घाटी पर कब्जा करने की कोशिश करना। भारतीय सेना के द्वारा उस कब्जे को नाकाम करना और चीन की सेना को नुकसान पहुंचाना। इन सबके साथ देश को आज लड़ना पड़ रहा है कांग्रेस और वामपंथियों की साजिशों से।

राहुल गांधी

कांग्रेस के चिर युवा नेता राहुल गांधी हर मुद्दे पर सरकार को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रहें हैं। चाहें वो कोरोना के खिलाफ लड़ाई में किए जा रहे प्रयास हों, या नेपाल के मुद्दे पर केन्द्र सरकार की नीति हो। चीन के विरुद्ध सरकार के प्रयासों की निंदा करनी हो। जब देश की सीमाओं पर दुश्मन तीन तरफा हमला करने की तैयारी कर रहा हो ( पाकिस्तान, नेपाल और चीन) उस समय सरकार के साथ खड़ा होने की बजाय वह देश में आंतरिक अस्थिरता को फैलाने की कोशिश कर रहें हैं। उनके साथ इस कार्य में वामपंथी विचार धारा जिसे पूरा विश्व लेफ्ट कर चुका है लगे हुए हैं। आज नेपाल की हिम्मत इतनी क्यों बढ़ गयी कि वो भारत को आंखे दिखाने लगा है। मामला साफ है चीन उसका इस्तेमाल कर रहा है। भारत सरकार को पानी पी पी कर कोसने वाले वामपंथी अंदर खाते से चीन को समर्थन दे रहें हैं। 1962 से ये लोग इस इंतजार में हैं कि कब चीन दिल्ली तक पहुंचे। कांग्रेस के मौजूदा नेतृत्व को इस बात से कोई मतलब नहीं है कि देश का भला कैसे हो? उसके लिए तो अपने आकाओं के तलवे चाटने से ज़रूरी काम कुछ नहीं है। उन्हें चीन से कितना धन मिला है, क्या उनका चीन की सत्ताधारी पार्टी से समझौता हुआ है? इसे ये बेहतर जानते होंगे। लेकिन एक बात तो तय है कि जब अधिकांश विपक्षी पार्टियां इस समय सरकार को समर्थन दे रही हैं चाइना के खिलाफ उस समय में भी वामपंथी दलों और कांग्रेस का सरकार को समर्थन देने की बजाय बताता है कि दाल में कुछ काला नहीं, दाल ही काली है।

इस समय सिर्फ अच्छी बात ये है कि देश सरकार के साथ खड़ा है। जिस प्रकार से देश ने चाइना का बहिष्कार किया है, वहां बने सामान का बहिष्कार किया है। उससे एक बात तो पता चलती है कि देश का नागरिक अपने स्वाभिमान के साथ कोई समझौता करने को तैयार नहीं है। वह इस अवसर पर देश की सेना और सरकार के साथ खड़ा है। उसको अपने देश के प्रधानमंत्री पर पूरा भरोसा है। दुर्भाग्य है कि जहां देश चीन से कुछ भी खरीदने को तैयार नहीं है वही दूसरी ओर ऐसा लग रहा है कि चीन ने हमारे देश की कांग्रेस पार्टी ही खरीद रखी है। वरना वो उन सवालों के जवाब केन्द्र से नहीं मांगती जिनके जवाब मिलने पर चीन को फायदा होता।

देश के लिए ये समय संकट का है। लोगों को सावधान रहना होगा। छोटी छोटी बातों पर उनको भड़काकर देश का माहौल खराब करने की कोशिश की जायेगी। हो सकता है सांप्रदायिक सौहार्द को भी बिगाड़ने की कोशिश की जाये। जनता को समझना होगा सीमाओं पर हमारी सेना मुस्तैद है। देश में एक दो विपक्षी दलों को छोड़कर बाकी सभी दल भी इस समय सरकार के साथ हैं। हमें भी इस समय देश के अंदर कोई अपनी घटिया इरादों को पूरा करने में कामयाब ना हो जाये इसके लिए जागरूक रहना होगा। अब समय की मांग है कि हम अपने अधिकारों की बात छोड़कर देश के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करें। देश रहेगा तो हमारे अधिकार रहेंगे। देश ही नहीं रहा तो गुलामों के क्या और कैसे अधिकार।

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