मुंबई ने सिखाया सबक! ‘लात’ मारने की बात करने वाले राज ठाकरे को बीएमसी में लगी ‘सियासी लात’, मनसे सिमटी 6 सीटों पर

मुंबई, जिसे सपनों का शहर कहा जाता है, उसने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह नफरत और विभाजन की राजनीति को स्वीकार नहीं करता। बीएमसी चुनाव से ठीक पहले मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने हिंदी भाषियों के खिलाफ जिस ‘लात’ मारने वाली भाषा का इस्तेमाल किया था, चुनावी नतीजों में जनता ने वही ‘सियासी लात’ उनकी पार्टी को मार दी है। सिर्फ राज ठाकरे ही नहीं, बल्कि उनके भाई उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) का भी 30 साल पुराना किला ढह गया है।

बीएमसी चुनाव से तीन दिन पहले राज ठाकरे ने हुंकार भरी थी कि “हिंदी आपकी भाषा है, इसे थोपोगे तो लात मारूँगा।” लेकिन नतीजों ने राज ठाकरे की मनसे को महज 6 सीटों और 2.87 प्रतिशत वोट शेयर पर समेट दिया। ताज्जुब की बात यह है कि 8 सीटें जीतने वाली असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम का वोट शेयर भी मनसे के करीब पहुँच गया। मुंबई के मतदाताओं ने साफ कर दिया कि यह महानगर किसी भाषा विशेष की जागीर नहीं है।

राज और उद्धव ठाकरे ने मराठी अस्मिता के नाम पर हिंदी विरोध की राजनीति को जमकर हवा दी थी। राज ठाकरे ने जहां कक्षा 5 तक हिंदी अनिवार्य करने को साजिश बताया, वहीं उद्धव के मुखपत्र ‘सामना’ ने उत्तर भारतीयों के ‘लिट्टी-चोखा’ और ‘कचौरी’ पर तंज कसते हुए ‘वड़ा-पाव’ को मराठी अस्मिता का प्रतीक बनाया। ‘बजाओ पुंगी, भगाओ लुंगी’ और ‘रसमलाई’ जैसे आपत्तिजनक बयानों के जरिए भाषाई ध्रुवीकरण की कोशिश की गई, लेकिन मुंबई के 38 प्रतिशत मराठी वोटरों ने भी इस नफरत की राजनीति में फंसने से इनकार कर दिया।

मुंबई के कांदिवली, मलाड, कुर्ला और गोरेगांव जैसे इलाकों में उत्तर भारतीय मतदाताओं की भारी तादाद है। इन मतदाताओं ने ठाकरे बंधुओं की विभाजनकारी राजनीति के जवाब में बीजेपी और कांग्रेस को तरजीह दी। 227 सीटों में से 89 सीटें जीतकर बीजेपी ने दिखा दिया कि मुंबई अब विकास और समावेशी राजनीति की ओर बढ़ रही है। राज ठाकरे, जिनका राजनीतिक ग्राफ 2014 के बाद से लगातार गिर रहा है, 2024 के विधानसभा चुनाव में खाता भी नहीं खोल पाए थे और अब बीएमसी ने उनकी ‘आखिरी उम्मीद’ को भी खत्म कर दिया है।

मुंबई का स्वभाव समावेशी है, और बीएमसी के नतीजों ने इसी स्वभाव पर मुहर लगाई है। राज और उद्धव ठाकरे ने जिस भाषाई आग को सुलगाने की कोशिश की थी, जनता ने उसे अपने वोट की ताकत से बुझा दिया है।

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