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मीडिया कथा भाग -7-सर्जना शर्मा

सर्जना शर्मा


वैसे तो हर दफ्तर में शायद कुछ लोगों के लिए सबसे दुख भरा और कुछ लोगों के लिए सबसे सुख भरा वो महीना होता है जिसमें इंक्रीमेंट प्रमोशन और प्रोबेशन पर आए लोगों को स्थायी किया जाता है । मीडिया इंडस्ट्री में भी इस महीने की सबको आतुरता से प्रतीक्षा रहती है । और इंटस्ट्रीज़ के बारे में नहीं कह सकती लेकिन मीडिया के बारे में दावे के साथ कह सकती हूं कि खूब रेवड़ियां बंटती थी । आप समझ ही सकते हैं मुहावरा अपने आप में सौ की एक बात कहता है । अँधा बांटे रेवड़ी अपने अपने को देय । और हमारे यहां कुछ दिल जले लोगों ने एक मुहावरा और भी चलाया था — घोडों को नहीं घास गधे खाएं च्यवनप्राश ।
जब लैटर बंटते तो खूब कहा सुनी होती कुछ लोग लैटर लेते ही नहीं थे कुछ एचआर में जाकर वापस कर आते थे एचआर के लिए भी शायद ये सबसे कठिन महीना होता था ।ज़रूरी नहीं कि संपादक घोड़ों के अच्छे काम
की तारीफ करें वो बेचारे साल भर दौड़ दौड़ कर मेहनत कर कर के टापते रह जाते थे । उनके हाथ 500 रूपए इंक्रीमेंट लगता और संपादकों के गधों को उन दिनों में तीन से पांच हज़ार तक का इंक्रीमेट मिल जाता था । जिस के प्रोग्राम की टीआरपी चार हो उसको भी तीस फीसदी इंक्रीमेंट मिल सकता है बशर्ते कि वो रेवडियां पाने वाले ग्रुप में हो और जिसका प्रोग्राम चैनल टीआरपी में नंबर दो या एक हो और वो रेवड़ी कोटे से बाहर है तो उसे केवल पांच फीसदी इंक्रीमेंट ही मिलेगा । भाई लोग भी काफी क्रिएटिव तरीके से विरोध व्यक्त करते थे । एक बार किसी ने गुरू दत्त की फिल्म प्यासा के गाने —– “ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है ” कि पैरोडी लिख डाली –ये प्रमोशन अगर मिल भी जाए तो क्या है , ये इंक्रीमेंट अगर मिल भी जाए तो क्या है “। पूरी पैरोडी बाकायदा टाईप करके नोटिस बोर्ड पर लगी थी । एक बार कुछ दिलजले लोगों ने गुमनाम ई मेल आईडी बनायी और उससे सबको अपने मन की भड़ास निकालते हुए मेल भेजे यहां तक कि मालिक को भी भेज दिए । खैर ये तो कहानी हर दफ्तर की है ।
असली मुद्दा है बेवजह कुछ लोगों से नफरत करने का । बेवजह हमें लगता था लेकिन उनके पास तो ठोस वजहें थीं । एक तो हम संघी उपर से परिक्रमा ना करने वाले फिर जहां सिद्धांतों पर अड़ने की बात हो वहां अड़ भी जाते । और ज़रूरी नहीं कि आप अपनी नफऱत शब्दों में व्यक्त करें । आपकी बॉडी लैगवेज , आपकी बातचीत के लहजे का रूखापन भी बहुत कुछ कहता है । और हां इन लोगों की एक और विशेष बात होती है ये लोग कभी आपसेनड़रे मिला कर बात नहीं कर सकते । क्योंकि इन के दिल में चोर होता है और ये कायर भी होते हैं । हमारे यहां एक आऊटपुट एडिटर आए । मैं तो कहूंगी करेला और नीम चढ़ा । वामपंथी, लिबरल , लेखक और शांतिदूत । कार्यभार संभालते ही नए संपादकों को सारी जानकारियां मिल जाती थीं । जो लोग हमारी भाषा तक का मज़ाक उड़ाते थे वो कान पूरी तरह भर देते थे । मुझे याद है एक दिन मैनें एक चपड़ासी को सेवा संपादक कह दिया । ओह उस दिन न्यूज़ रूम में मुझे खूब बुरा भला कहा गया आपने क्या अपना संघ समझा है यहां पर । यहां ऐसी भाषा नहीं चलती चपड़ासी को चपड़ासी ही कहो । आदि आदि सब लोगों के चौतरफे आक्रमण से मेरे आंसू निकल आए । लेकिन मैं इन लोगों के सामने बेबस थी ।
वार्षिक असेसमैंट का समय चल रहा था । उन दिनों हमारे यहां कईं पन्नों की बुक लेट थी जिसे पहले हम भरते फिर हमारे दो सीनियर उस पर अपनी राय लिखते हमारे काम को आंकते । और सबसे बाद में आऊटपुट एडिटर उस पर अपनी मुहर लगाते । मेरे बुकलेट भरने के चार पांच दिन बाद शांतिप्रिय लिबरल आऊटपुट एडिटर ने मुझे अपने कमरे में बुलवाया — “आपकी बुकलेट कहीं खो गयी है आपको दोबारा भरनी पड़ेगी ।ये लो दूसरी बुकलेट और मुझे भर कर अभी देदो लेकिन देना मुझे ही ताकि अब इधर उधर ना हो “। मैनें इसको बहुत सहज लिया और बिना कोई शक किए एक घंटे के भीतर भर कर उनको वापस कर दी । लेकिन ये लोग कितनी कुटिल चालें चल सकते हैं क्या क्या षडय़ंत्र कर सकते हैं ये तो पिछले पांच 6 साल से खेमे बंदी में पूरा देश देख ही रहा है । फर्क इतना है कि अब इनके अभियान राष्ट्रीय स्तर पर चलते हैं ।
बहुत साल बाद मुझे सच पता चला । दरअसल जिन दो सीनियरों ने मेरे काम पर अपनी राय और नंबर दिए थे । उन दोनों को इन्होंनें बुलाया और पूछा ये आपने जो इतनी तारीफ लिखी है क्या ये सचमुच ऐसी हैं । कुछ ज्यादा ही लिख दिया आपने । ये बात उन दोनों नें मुझे लगभग पांच छह साल बाद बतायी । एक तो उन्हीं के खेमे के थे । लेकिन उनमें पत्रकारिता जिंदा थी और उनको अच्छे भले की समझ थी । उन्होनें मुझे बताया कि उन पर बहुत दबाव डाला जाता था कि वे मेरे खिलाफ रिपोर्ट लिख कर दें । लेकिन उनका ज़मीर इन लोगों से अच्छा था उन्होनें कहा नहीं मैं झूठ नहीं लिख सकता । ये बात उन्होनें मुझे खुद तीन साल पहले बतायी ।
अब आप समझे मेरी ही बुकलेट क्यों गुम हो गयी थी । मुझे ही क्यों दोबारा भर कर उनको देनी थी क्योंकि उनको अपने मन के अनुसार और बाकी संपादक मंडली के अनुसार रिव्यू और नंबर देने थे । आपको ये घटना बताने का मतलब सिर्फ इतना है कि ये वामपंथी, लिबरल आजकल जो नेरेटिव खड़े कर रहे हैं ये उनके सामूहिक प्रयास हैं । व्यक्तिगत स्तर पर यदि इनकी ऐसी कुटिल मानसिकता है तो जब पूरा वामपंथी समाजवादी लिबरल मीडिया लामबंद हो जाता है तो किसी भी नेता, किसी भी जाति विशेषकर सवर्णों और किसी भी मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के खिलाफ अपने हिसाब से बुकलेट भर सकते हैं । अपना नेरेटिव कैसे बनाया जाए झूठ को सच ,सच को झूठ कैसे बनाया जाए ये इन्हें बखूबी आता है । पहले सब मीडिया हाऊसेस पर इनका कब्जा इनका वर्चस्व होता था कोई चुनौती देने वाला नहीं था । अब जब इनको वैचारिक चुनौती मिलने लगी है तो बौखलाहट होना स्वाभाविक है । विचारधारा का विरोध करते करते ये कब अपनी ही पत्रकार बिरादरी के खिलाफ खड़े हो गए इनको भी पता ही नहीं चला होगा और अब ये खाई दिन ब दिन गहरी ही होती जा रही है । ये आऊट पुट महोदय वैसे भी बहुत पारखी थे । जहां पत्रकारिता पढाने जाते वहां से दो तीन सुंदर हीरे ले ही आते थे । उनके जौहरी गुणों पर बात फिर कभी आज इतना ही
( कल से पढ़िए कलम के सिपाहियों को किसने बनाया पालतू कहां से शुरू हुई परंपरा ) कैसे लगना शुरू हुआ लोकतंत्र के चौथे खंबे में घुन )

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