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मीडिया कथा भाग -11-सर्जना शर्मा

सर्जना शर्मा

एक्सप्रेस समूह के मालिक श्री रामनाथ गोयंका 80 के दशक के आरंभ में हिंदी का एक अखबार लाए जनसत्ता जिसका संपादक उन्होनें अपने प्रिय और विश्वसनीय श्री प्रभाष जोशी जी को बनाया । जोशी जी की टीम में एक से बढ़ कर एक पत्रकार थे । डेस्क और रिपोर्टिंग दोनों में । बहुत बेहतरीन लोगों का चुनाव उन्होनें किया । अखबार की टैग लाइन थी — सबको खबर दे , सबकी खबर ले । जनसत्ता ने धूम मचा दी । जोशी जी ने गरिष्ठ संस्कृतनिष्ठ शब्दों के बजाए लोक भाषा का प्रयोग किया जो बहुत सफल हुआ । मरजीवडे, खाड़कू शब्द भी जनसत्ता की ही देन है । जनसत्ता दिल्ली में बहुत लोकप्रिय हो गया । नवंबर 1983 में शुरू हुआ अखबार नबंर 1984 तक लोकप्रियता के शिखर पर पहुंच गया । भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिख नरसंहार पर जनसत्ता ने धुआंधार रिपोर्टिंग की । जनसत्ता की धमक सत्ता के गलियारों में बहुत थी । जनसत्ता में काम करने की बहुत इच्छा थी एक बार जनसत्ता में उपसंपादक के लिए टेस्ट भी दिया था लेकिन हो नहीं पाया ।लगता है उस समय भाषा पर मेरी अच्छी पकड़ न होने के कारण नहीं हो पाया होगा । एक तो भाषा पर पंजाबी का बहुत ज्यादा असर और फिर पत्रकारिता में बहुत नए भी थे ।
जनसत्ता का रूतबा हुआ तो उसके पत्रकारों का भी हुआ । प्रभाष जोशी जी को जिन पर बहुत गर्व था एक समय ऐसा आया कि उन्होनें ही जोशी के नाम और साख पर बट्टा लगा दिया । ये किस्सा चूंकि सार्वजनिक है और इसमें दिल्ली पुलिस ने बाकायदा रिपोर्ट दर्ज की थी अंतरराष्ट्रीय सैक्स रेकैट चलाने वाला एक पिंप कमलजीत पकड़ा गया । दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने कमलजीत को एक पुराने ग्राहक के जरिए जाल बिछा कर उसको पकड़ा था । दिल्ली पुलिस ने अपनी प्रेस कांफ्रेस में बताया कि कमलजीत के तार पत्रकारों और नेताओं से भी जुड़े हैं वो अक्सर इन लोगों से मिलता है । और ये पत्रकार दिल्ली की प्रेस स्ट्रीट यानि बहादुरशाह जफर मार्ग से हैं । कमलजीत बहुत कुख्यात था । वो मुबंई और चैन्नई से कॉल गर्ल्स लाता था । उसके रैक्ट में भारतीय लड़कियों के अलावा सीरिया ,लेबनान ,जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया की लड़कियां भी शामिल थीं । शायद 1997 की बात है । प्रभाष जोशी जी ने अपने क्राईम रिपोर्टर को कमलजीत को इंटरव्यू करने तिहाड़ जेल भेजा उसने जनसत्ता के तीन रिपोर्टरों और कुछ नेताओं के नाम बताए । । लेकिन सभी पद का दुरूपयोग कर रहे थे ऐसा भी नहीं है । बहुत ईमानदार और अच्छे पत्रकार भी कई वर्षों तक जनसत्ता की शान रहे उनको साधुवाद । केवल जनसत्ता में ही पद का दुरूपयोग था ऐसा भी नहीं । पत्रकारिता में आज भी बहुत बड़ा नाम एक अंग्रेजी पत्रकार कुख्यात चार्लस सोबराज को तिहाड़ जेल से भगाने के मामले में फंस गए थे । जनसत्ता के रिपोर्टरों पर केवल आरोप था उनको चार्जशीट नहीं किया गया था । लेकिन इन महोदय के खिलाफ बाकायदा एफआईआर दर्ज हुई थी इनको चार्जशीट भी किया गया था जिस मीडिया हाऊस में ये कार्यरत थे उसके एक संपादक की तत्कालीन प्रधानमंत्री से नज़दीकी के कारण पटियाला हाऊस से उनको आरोपों से बरी करा लिया गया था । और बरी किए जाने की खबर फ्रंट पेज पर छापी गयी थी ।
पत्रकारों ने सत्ता से अपनी नजदीकियों का बहुत लाभ उठाया । उनमें से बहुत से आज देश के अमीर और प्रतिष्ठित लोगों में से एक हैं । नेताओं के साथ साथ बहुत से पत्रकार कारपोरेट घराने के कृपापात्र भी बने जिन्होनें बहुत पैसा कमाया और बाद में अपना काम शुरू कर लिया । EXTRA -CURRICULAR ACTIVITES के कारण बहुत से पत्रकार बड़े मीडिया घरानों के पे रोल पर भी आ गए । बॉलीवुड ने भी प्रतिभावान हीरों की पहचान की और अपनी व्यक्तिगत पब्लिसिटी और अपनी फिल्मों के प्रचार प्रसार के लिए उन्हें पैकेट देने शुरू किए । यानि जो लोग “सर्वगुण संपन्न” उनकी पांचो अंगुलियां घी में और सिर कड़ाही में होने लगा । अनेक पत्रकारों ने अपनी पत्नियों को भी मंत्रालयों, कारपोरेट घरानों में प्लेसमेंट दिलाना शुरू कर दिया । एक पत्रकार महोदय तो इतने बुद्धिमान निकले कि उन्होनें अपनी पत्नी को पहले एक सरकारी पत्रिका में उपसंपादक लगवाया और फिऱ मंत्रालय में अपनी ऊंची पहुंच के कारण पत्नी की पदोन्नति करवाते रहे । दिल्ली की सरकारी कॉलोनी पंडारा में घर भी आबंटित करवा लिया ।
व्यापक संबंध होने के कारण बहुत सी बातें पता चल जाती हैं । एक बार एक बहुत अच्छे परिचित जो कि एक कॉरपोरेट घराने का कॉरपोरेट कम्युनिकेशंस देखते थे उनसे मुलाकात हुई । उनके हाथ में एक सूची थी जिसमें बहुत से पत्रकारों के नाम थे । सबको एक जैसी राशि तो नहीं दी जा रही थी उसमें पत्रकार की “औकात” के हिसाब से मंथली पैकेट की राशि थी 25 हज़ार से डेढ़ -दो लाख रूपए तक । खैर अब मेरे पास कोई सबूत नहीं है नाम लिखना बेकार है । पेड पत्रकारों का काम खबरों में घराने के हितों की रक्षा करना और छवि चमकाना था । पेड न्यूज़ भी आज मीडिया जगत की एक कड़वी और भद्दी सच्चाई है । अनेक बड़ी राष्ट्रीय और मल्टीनेशनल कंपनियां मंहगे उपहारों से लेकर विदेश यात्राएं तक करवाती हैं । इसका फायदा मीडिया हाऊस नहीं उठाते ऐसा भी नहीं है । आपको याद होगा कुछ पत्रकारों को कॉरपोरेट हाऊसेस द्वारा लाभ पहुंचाए जाने की बात सामने आयी थी । मीडिया हाऊसेस ने पत्रकारों को नौकरी से मिकाल दिया तब एक महिला पत्रकार ने खुलासा किया था कि जब उनके मीडिया हाऊस की सालाना सम्मिट होती है तो उन पर विज्ञापन और स्पोंसरशिप लाने का बहुत दबाव बनाया जाता था । यानि दाल में काला नहीं दाल ही काली हो चुकी है । मीडिया मिशन नहीं रहा तो निशचित रूप से उदेश्य और काम काज की शैली बदल जाएगी ।
पत्रकारिता में एक बहुत बड़ा नाम जिनको पत्रकार बनने की चाह रखने वाले अनेक युवाओं ने अपना आदर्श माना उन्होनें तो पत्रकारिता धर्म की ही धज्जियां उड़ा दीं । जिस चैनल में वे थे वहां उन्होनें एक स्टिंग करवाया । स्टिंग को लेकर संसद में जोरदार हंगामा हुआ । सबूत के तौर स्टिंग की टेप मांगी गयी तो उन्होनें टेप देने में आनाकानी की । क्योंकि यदि वे टेप दे देते तो तत्कालीन सरकार कहीं मुंह दिखाने लायक न रह जाती । सरकार में उनकी धाक थी और रुतबा भी । सबसे उनके बहुत अच्छे संबंध थे । उन्होनें टेप नहीं दी कहा खराब हो गयी । बाद में उन्हें स्वामी भक्ति का ईनाम भी मिला । उनको पद्मश्री से सम्मानित किया गया ।

ये तो हुए देश की सीमाओं के भीतर करतब दिखाने वाले पत्रकार बहुत से ऐसे भी हैं जो अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के पे रोल पर हैं । देश के हितों को ताक पर रख कर ये भारत विरोधी एजेंडा खूब चलाते हैं । आप पाकिस्तान टीवी की खबरें देख लिजिए जहां इनके दिन रात गुणगान होते हैं आपको पता चल जाएगा कौन हैं ये लोग ।
निसंदेह सारा पत्रकार जगत ऐसा नहीं है । बहुत अच्छे आदर्शवादी लोग आज भी है । जिनको अपने काम से काम है लेकिन कुछ लोगों के कारण बदनामी ज्यादा हो गयी मीडिया की साख भी गिरी आम लोगों के बीच विश्वसनीयता भी घटी ।
******* चुनावी मौसम में किसकी होती है पौ बारह किसने सट्टा बाजार में श्री अटलबिहारी को दिया Thumbs down और फिर कितने में किया सौदा **** कुछ और रोचक बातें भी कल पढ़िए *******

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