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30 सालों से जारी कॉंट्रैक्ट फॉर्मिंग का भी विरोध कर रहे हैं किसान

मोदी सरकार के नए तीन कृषि कानून, किसानों को रास नही आ रहे, खासतौर पर पंजाब के किसानों को। इन में से एक कानून है कांट्रैक्ट फार्मिंग का। सरकार जिस कांट्रैक्ट फार्मिंग को किसानों की किस्मत बदलने वाला बता रही है। विपक्ष की कई पार्टियां और कुछ किसान संगठनों का कहना है कि इस कृषि कानून से खेती पर कॉरपोरेट हावी हो जाएंगे, किसान मजदूर बन कर रह जाएंगे।

भारत में पिछले 30 वर्षों से कॉट्रैक्ट फार्मिंग जारी है और लाखों हेक्टेर में खेती की जा रही है । गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में बड़े पैमाने पर कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग होती है। पंजाब में भी कॉंट्रैक्ट फार्मिंग कई वर्षों से जारी है, जहां का किसान सबसे ज्यादा आंदोलित लगता हैं। पंजाब ने तो 2013 में राज्य स्तर पर कांट्रॅक्ट फार्मिंग का क़ानून भी बनाया था।

पेप्सी कोला बनाने वाली पेप्सीको उन पहली कंपनियों में से थी जिसने सबसे पहले पंजाब में कॉंट्रैक्ट फार्मिंग में हाथ आजमाए। कंपनी आज भी वहां कॉंट्रैक्ट फार्मिंग कर रही है। पंजाब में पेप्सिको अकेली कंपनी नही जो कॉंट्रैक्ट फार्मिंग में जुटी है इसके अलावा एलटी फूड, EBRO फूड और सन स्टार ओवरसीज जैसी अनेकों कंपनियां वहां ठेके पर खेती करवा रही हैं।

कॉंट्रैक्ट फार्मिंग अगर इतनी ही बुरी होती तो टेलीकॉम इंडस्ट्री से जुड़ी भारती एयरटेल की कंपनी “फील्डफ्रेश” समेत ITC, पतंजलि, डाबर, गोदरेज एग्रोवेट जैसी कंपनियां इससे क्यों जुड़ी होती। किसानों के डर और मान्यताओं के विपरित मुकेश अंबानी के रिलायंस ग्रुप की कोई भी कंपनी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कॉंट्रैक्ट फार्मिंग नही कर रही है।

आज बहुत से मुद्दों के साथ किसान कॉंट्रैक्ट फार्मिंग का भी विरोध कर रहे हैं। मजे की बात यह है कि कॉंट्रैक्ट फार्मिंग की मलाई चाटने वाले भी इसके विरोध में झंडा उठाए हैं। पिछले 30 सालों में एक भी किसान ने अपनी जमीन किसी कॉरपोरेट के हाथों नही गंवाई। खासतौर पर पंजाब में जो किसान ठेके पर खेती कर रहे हैं उनकी इनकम बाकी किसानों से अधिक है साथ ही जोखिम भी कम है।

कुदरत के रहम पर निर्भर भारत में किसान दो प्रकार के जोखिम उठाते हैं, एक मार्केट रिस्क दूसरा प्रोटेक्शन रिस्क। कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के तहत कंपनियां काफी हद तक ये रिस्क अपने सिर ले लेती हैं। किसानों को इस बात की चिंता नहीं रहती है, उनका माल किस रेट पर किस मार्केट में बिकेगा। यह सब पहले ही तय हो जाता है।

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के तहत यह स्पष्ट होता है कि किसी भी सूरतेहाल में कंपनी, किसान की जमीन की न तो खरीद-बिक्री कर सकती है और न ही गिरवी रख सकती है। अतः इस लिहाज से किसानों के हित यहां पर संरक्षित है। अतः जो लोग कह रहे हैं कि कॉरपोरेट किसानों की जमीनें हथिया लेंगे, वह बस लोगों को बरगला रहे हैं, इसके अलावा कुछ भी नहीं है।

नए कृषि कानूनों में किसानो के सुझावों को शामिल करने या कानूनों की धाराओं में सांसोधन की बात भी सरकार मान चुकी है। पर फिर भी किसान अड़े हैं। कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के फायदों के बीच सबसे बड़ी चुनौती इसके समान बंटवारे की है। बड़े किसानों की तरह छोटे किसानों को भी कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग के दायरे में लाना होगा। सरकार को छोटे किसानों को कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग से जोड़ने के तरीके निकालने होंगे। ताकि बड़े किसानों की तरह ठेके पर खेती कर छोटा किसान भी अपने जोखिम कंपनियों को शिफ्ट कर सके।

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