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भाजपा- ग़ैरों पे करम अपनो पे सितम

बोल बिंदास-

कांग्रेस मुक्त भारत बनाने की भाजपा को बहुत जल्दी है. इसके चलते वो कैसे भी, कहीं से भी, किसी भी पार्टी से लोगों को भाजपा में ला रही है. दिल्ली में अभी ताजा दलबदल दिल्ली कांग्रेस के कद्दावर नेता अरविंदर सिंह लवली और अमित मलिक का हुआ है. दिल्ली कांग्रेस मे शीला दीक्षित खेमे के माने जाते हैं और अभी अजय माकन से नाराज चल रहे थे. इससे पहले भी आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के कई नेता भाजपा का दामन थाम चुके है. इन लोगों में से कई पार्टी से चुनाव के मैदान में भी हैं. दलबदल और दलबदलुओं को टिकट देने की कवायद भाजपा ना केवल दिल्ली बल्कि ओर भी राज्यो में कर चुकी है. इसको लेकर कार्यकर्ताओं में गुस्सा है लेकिन उसे व्यक्त करने की ताकत नही.लेकिन यहां लोगों को दलबदल कराना और उसके बाद टिकट देना ही मसला नही है. ताजा मामला है भाजपा द्वारा अपनी नरेला से अपनी निगम प्रत्याशी सविता खत्री को पार्टी से निकालने का.

सविता खत्री के चुनाव प्रचार में आम आदमी पार्टी के सैक्स सीडी कांड में विवादित पूर्व मंत्री संदीप कुमार शामिल हुए थे.

भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विनय सहस्त्रबुद्धे ने पार्टी कार्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता में ये घोषणा की. हालांकि उन्होंने ये स्पष्ट किया कि क्योंकि नाम वापिस लेने की तारीख बीत जाने के कारण वो सविता खत्री से चुनाव चिंह वापिस नही ले सकते.

पार्टी के इस निर्णय से पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ता निराश है. उन्होंने संदीप कुमार के वहां पंहुचने को आम आदमी पार्टी की साजिश बताया है. उनका कहना है जहां संदीप चुनाव प्रचार कर रहे थे वहां सविता मौजूद ही नही थीं. संदीप के साथ कुछ समय पहले आम आदमी पार्टी छोड़कर आये कार्यकर्ता थे. पार्टी की नरेला इकाई के अध्यक्ष नील दमन खत्री और स्थानीय कार्यकर्ता पार्टी नेतृत्व तक अपनी बात पंहुचाना चाहते हैं और उन्हे इस बात की उम्मीद है कि उन्हे न्याय मिलेगा. अगर पार्टी नेतृत्व अपने फैसले पर पुनर्विचार नही किया तो कार्यकर्ता अपने दम पर सविता को चुनाव लड़ायेंगे. उत्तर पूर्वी जिले के पूर्व अध्यक्ष विनोद सहरावत भी इस मामले को आम आदमी पार्टी की साजिश मानते है.

किसी को पार्टी में रखना या ना रखना किसी भी पार्टी का अपना मामला है. लेकिन पार्टी में कौन किस नियत से आ रहा है ये जाने बिना उसे पार्टी में शामिल कराना और उसको अपने कार्यकर्ता की अनदेखी कर जिम्मेदारी देना ये कहां तक ठीक है? नरेला मामले में जिस तरह से पार्टी ने जल्दबाजी दिखायी है उससे एक बात तो तय है कि पार्टी को अपने कार्यकर्ताओं पर भरोसा नही रहा है. भाजपा की ये रणनीति उसे सत्ता में तो ला सकती है लेकिन जिस राजनैतिक शुचिता की बात उसके नेता कर रहे है उसे कैसे बचायेगी ये देखना होगा.

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