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क्या सोशल डिस्टेंसिंग में बाधक बन रही है भाषा

डॉ धनेश द्विवेदी
dhan_af@yahoo.co.in

आज पूरा विश्व कोविड-19 से जूझ रहा है और उससे उबरने के प्रयास कर रहा है। सभी देशों को समझ आ गया है कि इस महामारी से निपटने में अभी तक केवल दो ही उपाय सार्थक हुए हैं। पहला उपाय है घरों में ही रहें और दूसरा, यदि निकलना भी पड़े तो सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करें। अब सवाल यह आता है कि सोशल डिस्टेंसिंग के मायने क्या हैं ?, क्या यह शब्द देश के आम-नागरिकों तक उतनी ही गम्भीरता से पहुंचने में सफल हुआ है जितना कि सरकारी संस्थाये इसे लेकर गम्भीर हैं। विभिन्न समाचार चैनलों और अखबारों को देखकर तो यही लगता है कि देश के सभी हिस्सों में सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं और लोग अपनी ही जान से खेल रहे हैं। समाचार चैनल तरह तरह के वीडियो चला रहे हैं और जनता पर तोहमत लगाते हैं। लेकिन क्या यह सही है? यह बड़ा प्रश्न है। क्योंकि जिस जनता पर वह सोशल डिस्टेंसिंग का पालन न करने का इल्जाम लगा रहे हैं क्या उसे सोशल डिस्टेंसिंग का मतलब भी मालूम है ?। ऐसे तो सोशल डिस्टेंसिंग शब्द का उपयोग खूब किया गया है लेकिन बिहार के सुदूर क्षेत्र में बैठा व्यक्ति, केरल के एक छोटे से कस्बे में रहने वाला नागरिक और कश्मीर का सामान्य निवासी क्या सोशल डिस्टेंसिंग शब्द को उतनी ही गंभीरता से ले सकता है जितना कि हम उसे समझाना चाहते हैं। सोशल डिस्टेंसिंग शब्द को हिंदी सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद कर देश की आम जनता में पहुंचाने की महती आवश्यकता है। हम एक बहुभाषी देश में रहते हैं जहाँ एक हिंदी भाषी, सोशल डिस्टेंसिंग की अपेक्षा सामाजिक फासला, मलयाली भाषी-समूहिका अकलम, तेलुगु भाषी -समजिका दूरम और बांग्ला भाषी – सामाजिक दुरत्बा बेहतर तरीके से समझ सकते हैं। इस तरह के प्रयास से आमजन तक उसकी भाषा में पहुंचने से उसे सोशल डिस्टेंसिंग का सही अर्थ समझ आयेगा और इसका पालन करने में वह दूसरे की मदद भी कर सकता है क्योंकि कोरोना से बचाव का यही सबसे कारगर रास्ता है।

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