सदन में ‘जाति’ पर जंग! बिहार विधानसभा में ‘ब्राह्मणवाद’ शब्द पर मचा कोहराम, स्पीकर ने रिकॉर्ड से हटवाया शब्द

बिहार, पटना: विधानसभा में जब नीति और नियत पर चर्चा होती है, तो उम्मीद की जाती है कि जनता के सरोकार सबसे ऊपर होंगे। लेकिन बिहार की सियासत में ‘जाति’ और ‘वाद’ का ऐसा मिश्रण है कि विकास के मुद्दे अक्सर पीछे छूट जाते हैं। आज बिहार विधानसभा में यही हुआ। मौका था उच्च शिक्षण संस्थानों में सुधार पर चर्चा का, लेकिन एक शब्द— ‘ब्राह्मणवाद’—ने सदन के भीतर वो चिंगारी सुलगा दी जिसने सत्ता पक्ष और विपक्ष को आमने-सामने खड़ा कर दिया। बीजेपी इसे ब्राह्मणों का अपमान बता रही है, तो विपक्षी दल इसे एक व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई करार दे रहे हैं।

बिहार विधानसभा की कार्यवाही सामान्य रूप से चल रही थी, तभी सीपीआई-एमएल (CPI-ML) के विधायक संदीप सौरभ ने उच्च शिक्षण संस्थानों में यूजीसी (UGC) के नियमों को सख्ती से लागू करने के लिए कार्यस्थगन प्रस्ताव पेश किया। उनका तर्क था कि कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में भेदभाव खत्म करने के लिए ये नियम जरूरी हैं। लेकिन, अपने प्रस्ताव को पढ़ते हुए उन्होंने एक ऐसी लाइन कही जिसने हंगामा बरपा दिया। संदीप सौरभ ने आरोप लगाया कि ‘ब्राह्मणवाद मानसिकता’ के लोग इन सुधारों को रोकना चाहते हैं। बस फिर क्या था, सत्ता पक्ष के विधायक, खासकर बीजेपी के मिथलेश तिवारी, अपनी सीटों से खड़े हो गए और इसे एक पूरे समाज का अपमान करार देते हुए सदन में शोर-शराबा शुरू कर दिया।

हंगामा बढ़ता देख विपक्ष ने भी मोर्चा संभाल लिया। आरजेडी नेता आलोक मेहता ने संदीप सौरभ का पक्ष लेते हुए एक बेहद तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि ‘ब्राह्मणवाद’ कोई जाति नहीं है, बल्कि एक विचारधारा है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा— जिनको यह शब्द चुभ रहा है, उनकी चोर की दाढ़ी में तिनका है। आरजेडी विधायक भाई वीरेंद्र ने भी सरकार पर हमला बोला और कहा कि जायज मुद्दे को दबाने के लिए एक शब्द का बतंगड़ बनाया जा रहा है। दूसरी तरफ, बीजेपी विधायक मिथलेश तिवारी ने गरजते हुए कहा कि इन लोगों को ब्राह्मणों से समस्या है और ये बार-बार एक समाज को टारगेट कर रहे हैं।

विवाद की आग में सबसे भावुक मोड़ तब आया जब उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा ने मोर्चा संभाला। उन्होंने संदीप सौरभ की शब्दावली पर कड़ी आपत्ति जताई और इसे उनकी संकीर्ण मानसिकता का परिचायक बताया। विजय सिन्हा ने अपना निजी अनुभव साझा करते हुए कहा कि वे खुद एक भूमिहार ब्राह्मण हैं, लेकिन इसके बावजूद छात्र जीवन में उन्हें रैगिंग का शिकार होना पड़ा और हॉस्टल से निकाल दिया गया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब संविधान सबको समानता का अधिकार देता है, तो सदन के भीतर किसी खास विचारधारा या जाति को इस तरह क्यों घसीटा जा रहा है? उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी दल बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की भावनाओं को ठेस पहुँचा रहे हैं।

सदन के भीतर जब स्थिति अनियंत्रित होने लगी, तो विधानसभा अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने व्यवस्था देते हुए कहा कि जाति और धर्म से जुड़े संवेदनशील शब्दों पर यहाँ बहस नहीं होगी। अध्यक्ष ने तत्काल प्रभाव से ‘ब्राह्मण’ शब्द को सदन की कार्यवाही (Record) से हटाने का निर्देश दिया। सदन के बाहर मीडिया से बात करते हुए संदीप सौरभ ने फिर कहा कि उन्होंने किसी जाति का नहीं, बल्कि ‘ब्राह्मणवाद’ यानी एक पुरानी व्यवस्था का जिक्र किया था, जिस पर वे आज भी कायम हैं।

सदन की कार्यवाही से शब्द तो हटा दिए गए, लेकिन जो सियासी दरार पैदा हुई है, वो इतनी जल्दी भरने वाली नहीं है। ‘ब्राह्मण’ और ‘ब्राह्मणवाद’ के बीच की इस बहस ने यह तो साफ कर दिया है कि बिहार में आज भी मुद्दों से ज्यादा शब्दों की राजनीति हावी है।

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