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यह मेरा मजदूर, यह तेरा मजदूर- डॉ धनेश द्विवेदी

डॉ धनेश द्विवेदी

          दिल्ली के आईएसबीटी से मुंबई के बांद्रा टर्मिनल तक, गुजरात के सूरत से उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा तक स्थान अवश्य बदला किंतु मंजर वही है। केंद्र द्वारा तमाम राहत पैकेज देने के बाद भी राज्य सरकारें मजदूरों को राज्य के अंदर रोकने में नाकाम दिखाई दे रही हैं । प्रवासी मजदूर पलायन के लिए मजबूर हैं। एक तरफ विशाल भीड़ है जो दर-बदर की ठोकरें खाने को मजबूर है तो दूसरी तरफ तमाम वादे हैं, कसमें हैं, राजनीति है । एक तरफ एक-एक बिस्किट के पैकेट के लिए लड़ता और जूझता  पेट है  तो दूसरी तरफ हज़ारों टन खुले में रखा अनाज सड़ रहा है। एक तरफ प्रसव पीड़ा के बाद सड़क पर ही जन्मे नवजात शिशु के साथ खून से लथपथ मां है तो दूसरी तरफ कई एकड़ में बने आलीशान सुविधाओं के अस्पताल। इन्हीं सब के बीच अपनों के पास जाने वाले भी दो भागों में विभाजित हैं । पहले वो जो जहाज में बैठ कर विदेशी रंगीन पानी पीते हुए वातानुकूलित यान से मुस्कुराते हुए हवाई अड्डे पर उतरते हैं और महंगी-महंगी गाड़ियों में बैठकर घर चले जाते हैं  । दूसरे वो हैं जो  पिछले 2 महीने से निकले तो हैं, पर अभी तक बिना पानी, बिना भोजन के तपती धूप में चलते जा रहे हैं और कमबख्त रास्ता है कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है। अभी तक यह नहीं पता चल रहा है कि एक पक्ष की नियति ही ऐसी है या किसी की नीयत ठीक न होने के कारण ऐसा हो रहा है । वैसे सबको यह पता है कि पहले पक्ष की नींव से लेकर इमारत तक दूसरे पक्ष के खून-पसीने की देन है। राजनीति से लेकर मजबूत अर्थव्यवस्था और 21 वीं सदी के समृद्ध भारत की आधारशिला इन गरीब मजदूरों के कंधों पर ही टिकी होती है।

गरीबी सबसे बड़ा अभिशाप होती है और इस बात का जीता-जागता उदाहरण देश की सड़कों का देखा जा रहा है। तमाम विद्वानों के अपने-अपने मत हैं। कोई कहता है गरीबी का मुख्य कारण शिक्षा की कमी है तो क्या पहले शिक्षा सुदृढ़ करने पर जोर दिया जाए लेकिन इन मजदूरों में कई डिग्री धारक भी हैं । कोई कहता है कि ग़रीबी की सबसे बड़ी वजह पैसे का असंतुलित संग्रह है तो क्या पहले अमीर और गरीब के बीच पैसे का संतुलन बनाया जाए। कभी यह भी कहा गया कि गरीबी की वज़ह बढ़ती जनसंख्या है तो क्या इन भूखे पेटों को इसी हालत में छोडकर सबसे पहले जनसंख्या नियंत्रण पर ध्यान दिया जाए ।इनमें से या इनके अलावा जो भी कारण हो, गरीबी उन्मूलन जरूरी है किन्तु वर्तमान में राज्य सरकारों द्वारा बिना मेरा मजदूर, तेरा मजदूर किए इनकी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के प्रयास किए जाने चाहिए।

ये लेखक के अपने विचार हैं

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