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जंगल की आग, प्रकृति पर मनुष्य का कहर

उत्तराखंड के जंगलों का आग से जलना नियति बन चुका है। ये आग न केवल वहां के वृक्षों , पशु – पक्षियों को अपना शिकार बनाती है, वहां के पर्यावरण का भी खासा नुकसान करती है। ये आग लगती कैसे है? क्या ये मानव की लापरवाही का नतीजा है, या फिर कोई सोची समझी साजिश है। आग बुझाने के नाम प्रतिवर्ष करोड़ों स्वाहा हो जाते हैं।मास्टर क्रू सेन्टर, क्रू सेंटर , क्रू मैन, फायर मैन ये सब आधुनिक नाम है वन बिभाग के जो आग बुझाने के संवेदनशील कार्य को देखते हैं।लेकिन जंगल की आग है कि बुझती ही नहीं।


समूचे उत्तराखंड के जंगल आजकल आग से धू धूकर जल रहे हैं । कभी इस जंगल तो कभी उस जंगल,कभी इस ढंगार तो कभी उस ढंगार।


वन बिभाग डाल डाल, तो आग पात पात। वनकर्मी डगर डगर ,तो आग ढंगार ढंगार। कभी इस पाख तो कभी उस पाख।अब वन बिभाग मौसम की शरण मे है कि कब जमकर वरुणदेव बरसें और जंगल की आग से निजात मिले हर वर्ष की भांति आग भी बुझ जाएगी और बजट भी ठिकाने लग जायेगा। फिलहाल आग का ये कहर उत्तरकाशी में चामकोट क्षेत्र के जंगलों पर बरपा है।
अगर हम अपने जंगलों के प्रति यूँ ही लापरवाही बरतेंगे तो वो दिन दूर नही जब इसकी बड़ी कीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ेगी।

लोकेंद्र सिंह बिष्ट

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