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बच के रहना विश्वास… केजरीवाल के ताप से तुम्हे कोई नही बचा सकता- अतुल गंगवार

बच के रहना विश्वास… केजरीवाल के ताप से तुम्हे कोई नही बचा सकता.

बोल बिंदास

देश के राजनैतिक फलक पर जितनी तेजी से अरविंद केजरीवाल का उदय हुआ था उतनी तेजी से वो अस्त होते नज़र आ रहे हैं. अरविंद केजरीवाल की ‘आम आदमी पार्टी’ अभी सबसे संकट के दौर से गुज़र रही है.मैगी 2 मिनट नूडल्स की तर्ज पर बनी इस पार्टी के नेताओं में बढ़ रहे मतभेद अब सार्वजनिक होते जा रहे हैं और सबसे बड़ी बात ये है कि अब अरविंद केजरीवाल की सत्ता को चुनौती मिल रही है. ताजा विवाद विधायक अमानतुल्लाह खान और केजरीवाल के चहेते? कुमार विश्वास के बीच है.

अमानतुल्लाह ने विश्वास पर पार्टी से विश्वासघात करने का आरोप लगाया था. उनका कहना था कि विश्वास पार्टी को बीजेपी के ईशारे पर तोड़ना चाहते हैं. उन्होंने कुमार पर 30 करोड़ रुपये में विधायक खरीदने की कोशिश करने का आरोप भी लगाया. उनके इन आरोपो से नाराज होकर कुमार कोप भवन में जा बैठे. फिर शुरू हुआ मान मनोव्वल का ड्रामा . जिसकी परिणीति हुयी अमानतुल्लाह खान को पार्टी से सस्पेंड करके औऱ कुमार विश्वास को राजस्थान का प्रभारी बनाकर.

ये खेल तो फिलहाल थम सा गया लगता है, लेकिन एक सवाल खड़ा होता है कि क्या केजरीवाल ने विश्वास के दबाव के आगे हार मान ली और विश्वास को उनका मनचाहा करने दिया? जो लोग अरविंद केजरीवाल के इतिहास से वाकिफ हैं वो शायद इस बात से इत्तेफाक नही रखते. उनके अनुसार केजरीवाल अपने लक्ष्य के आगे आने वाली किसी भी रुकावट को दूर करने की ताकत रखते हैं. योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण जैसे पार्टी के संस्थापक सदस्यों को उन्होंने जिस तरह से निपटाया वो सबने देखा था. वो जिस तरह से पार्टी चला रहे हैं वो भी सब देख रहें हैं. किसी से हार मानना उनकी फितरत नही हैं. जिस अन्ना के आंदोलन पर सवार होकर वो सत्ता में पंहुचे आज वो अन्ना उनके लिए मायने नही रखते जब उन्होंने उन्हे निपटा दिया, तो बाकी लोग क्या औकात रखते हैं उनके सामने. तो फिर क्या वजह है कि वो आज बैकफुट पर दिखायी दे रहे हैं?

आपको ध्यान होगा एक आवाज़ दिल्ली में निगम चुनावों में पार्टी की करारी हार के बाद उठी थी. वो थी पार्टी संयोजक के पद से अरविंद को हटना चाहिए और विश्वास को संयोजक बनाना चाहिए. पार्टी के कई नेताओं दिलीप पांडेय, आशीष तलवार, दुर्गेश पाटक, संजय सिंह आदि ने इस्तीफा दे दिया था. यह पहली बार था कि दबे सुरों में ही सही लेकिन केजरीवाल की सत्ता को खुलेआम चुनौती मिलती दिखायी दे रही थी. ब्रांड अरविंद केजरीवाल पंजाब, गोवा के बाद दिल्ली में मिली करारी हार के बाद बेहद कमजोर स्थिति में दिखायी पड़ रहा था. पार्टी के प्रमुख लोगों को लग रहा था कि आज पार्टी जिस हालत में आ पंहुची है उसके लिए जिम्मेदार केजरीवाल के काम करने का तरीका है. केजरीवाल भी इस बात को समझ रहे थे कि आज उनकी स्थिति उस वक्त जैसी नही है जब उन्होंने योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण को निपटाया था और कहीं कोई आवाज नही उठी थी और उठी भी तो उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. तो वो क्या करें.

केजरीवाल ने अमानतुल्लाह खान को संस्पेंड करके एक जीर से दो शिकार किए हैं. पार्टी अनुशासन के नाम कार्यवाही करके उन्होंने ये संदेश देने की कोशिश की है कि वो अभी भी सर्वेसर्वा है पार्टी के और राजस्थान प्रभारी बनाकर विश्वास को उन्होंने दिल्ली से थोड़ा दूर कर दिया है और कोशिश की है जो लोग विश्वास को पार्टी संयोजक बनाकर केजरीवाल को चुनौती दे रहे ते वो खामोश हो जायें. उनको मिलने वाली चुनौती को उन्होंने दिल्ली से दूर करने की कोशिश की है. लेकिन क्या उनके इस कदम से पार्टी में सबकुछ ठीक हो जायेगा? ये तो वक्त ही बतायेगा लेकिन केजरीवाल को जानने वाले लोग ये बात अच्छी तरह जानते है कि केजरीवाल किसी को माफ करने वालों में से नही हैं. विश्वास पर उन्होंने आज विश्वास कर लिया हो, ऐसा किसी को लगता हो तो लगता हो, उनकेे करीबी जानते हैं क्योंकि फिलहाल केजरीवाल क्योंकि थोड़ा कमजोर पड़ गये हैं इसलिए उन्होंने थोड़ा वक्त लिया है. जैसे ही उनकी स्थिति थोड़ी मजबूत होगी कुमार विश्वास को भी ठिकाने लगाने में उन्हें वक्त नही लगेगा. इसलिए विश्वास जीत कर भी हारे हैं और केजरीवाल की हार में ही उनकी जीत छुपी है. वो पार्टी के संयोजक बने रह सकते हैं.

अतुल गंगवार

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