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यूपी पर राज करके भी मायावती ने क्यों नहीं किया मैला ढो रहे दलितों का उद्धार?- भाग दो- रवि पाराशर

 रवि पाराशर वरिष्ठ पत्रकार हैं। सीधे- सरल, बेबाक अंदाज में अपनी बात कहने वाले रवि इस लेख में दलितों के नाम पर सिंहासन पर बैठने वाली मायावती क्यूं नही सरपर मैला ढोने वाले परिवारों की नियति नही बदल पायी इस पर अपनी बात कह रहें हैं। ये लेख दलितों के नाम पर अपनी झोली भरने वालों की मानसिकता पर रोशनी डालता है और हमें ये सोचने पर मजबूर कर देता है कि क्यों आज भी सरपर मैला ढोने का दंश झेल रहे परिवारों के साथ न्याय नही हो रहा है। प्रस्तुत है इस लेख की दूसरी कड़ी।

यूपी में ग़ैर-कांग्रेस सरकारों ने क़रीब 28 साल तक राज किया है और कांग्रेस ने क़रीब 40 साल। अब अगर हम मैला ढोने की मजबूरी को दलित उत्थान की कसौटी मान लें, तो यूपी की हालत सबसे ज़्यादा शर्मनाक है। केंद्रीय सामाजिक न्याय राज्य मंत्री विजय सांपला ने 5 मई, 2016 को राज्यसभा में बताया कि पूरे देश में मैला ढोने को मजबूर लोगों में सबसे ज्यादा 82 प्रतिशत यानी दस हज़ार से ज़्यादा यूपी में हैं। यह सरकारी आंकड़ा है। ज़ाहिर है हक़ीक़त से बहुत कम होगा। एक अनुमान के मुताबिक़ 2016 में मैला ढोने को मजबूर दलितों की संख्या पूरे देश में 13 लाख थी। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इनमें ज़्यादा संख्या महिलाओं की है।
जनगणना के आंकड़ों के आधार पर केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने लोकसभा में 25 फरवरी, 2016 जानकारी दी थी कि देश में 1,67,487 परिवारों में एक-एक व्यक्ति हाथ से सफ़ाई करने वाला सफ़ाईकर्मी है। केंद्र की मोदी सरकार के स्वच्छ भारत मिशन के तहत देश में शौचालय क्रांति आने से यह संख्या कम ज़रूर हुई होगी, लेकिन अब भी बड़ी संख्या में दलित यह घ्रणित काम करने को मजबूर हैं।
यूपी में अभी तक राज करने वाली सभी पार्टियों, ख़ासकर ख़ुद को दलितों की मसीहा घोषित करने वाली पार्टियों और नेताओं को इस हक़ीक़त पर शर्म आनी चाहिए। दूसरी पार्टियों पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाने वालों की जवाबदेही ज़्यादा बनती है। यूपी में सात साल से ज़्यादा के शासनकाल में बीएसपी सरकार ने प्रतिमाएं स्थापित कर अरबों रुपए उड़ा दिए। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का ध्यान दूसरों का मैला ढोने वालों पर क्यों नहीं गया?
सरकारी आंकड़े को ही सही मानें, तो पूरे देश में सिर पर मैला ढोने वालों की संख्या 12,226 में से यूपी में रह रहे क़रीब दस हज़ार ऐसे दलितों के उद्धार, पुनर्वास पर कितना ख़र्च आएगा? प्रतिमाओं पर ख़र्च बजट का एक-दो फ़ीसदी भी नहीं। फिर भी मायावती और उनकी पार्टी ने इस ओर ध्यान क्यों नहीं दिया? राज्यसभा में पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक़ गुजरात में ऐसे केवल दो सफ़ाई कर्मी ही चिन्हित किए गए थे। यह फ़र्क़ बहुत कुछ साबित करता है।
दलितों का अपमान हर लिहाज़ से घोर निंदनीय है। इस मुद्दे पर अरबों रुपए ख़र्च कर रैलियां और विरोध प्रदर्शन भी जायज़ ठहराए जा सकते हैं, लेकिन उनके उद्धार के लिए भी आप कुछ तो कीजिए! तब तो ज़रूर, जब आप सत्ता की सबसे चमकदार कुर्सी और महलों पर दलित कार्ड खेलकर ही क़ाबिज़ होते हों। कांग्रेस ने यूपी में 40 साल के शासन में क्या किया, यह तो उसने 28 साल तक सत्ता से बाहर रहने के दौरान समझ लिया होगा। अभी यूपी के निकाय चुनावों में भी कांग्रेस को लोगों ने आइना दिखा दिया है। राज्य में बीजेपी भी सत्ता में रही है और समाजवादी पार्टी का कार्यकाल तो ग़ैर-कांग्रेस सरकारों में सबसे ज़्यादा है।
अपना मल ख़ुद साफ़ करने के हिमायती महात्मा गांधी के आदर्शों पर चलने वाली कांग्रेस को आज़ादी के 43 साल बाद याद आया कि मैला ढोने की कुप्रथा बंद होनी चाहिए। साल कांग्रेस की केंद्र सरकार ने 1993 में क़ानून बनाया गया कि दिसंबर, 2007 तक ये कुप्रथा बंद होगी। फिर अवधि दो साल और बढ़ाकर मार्च, 2009 कर दी गई। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त बदलने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाई गई, तो सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने 2013 में एक क़ानून और बनाया, जिसमें इस कुप्रथा से जुड़े मजबूर परिवारों के कल्याण की व्यवस्था की गई। लेकिन हालात पूरी तरह आज भी नहीं बदले हैं।
सियासत के उलट कुछ कर्मठ समाज-सेवियों ने ज़रूर इस तरफ़ ध्यान दिया। साल 2016 में ऐसे ही सामाजिक कार्यकर्ता बेजवाड़ा विल्सन को मैगसेसे सम्मान की घोषणा हुई है। उनकी कोशिशों से देश भर में क़रीब तीन लाख लोग तब तक इस कुप्रथा से मुक्त हो चुके थे। विल्सन के माता-पिता मैला ढोने के लिए मजबूर थे। 20 साल की उम्र में ही उन्होंने आंदोलन शुरू किया। दबाव बना और 1993 में केंद्र को क़ानून बनाना पड़ा। सभी सियासी पार्टियों को विल्सन जैसी विभूतियों से सबक़ लेना चाहिए। उन्हें तो ज़रूर, जो दलित समुदाय के कंधों पर खड़े होकर सियासी आसमान छू रहे हैं।
देश के सबसे बड़े राज्य यूपी की इस मामले में ज़मीनी हक़ीक़त शर्मनाक है। यूपी से ही सबसे ज़्यादा प्रधानमंत्री दिल्ली तक पहुंचे हैं। उसी दिल्ली के हाईकोर्ट ने 03 अगस्त, 2016 को मैला ढोने की कुप्रथा पर व्यवस्था को कड़ी फटकार लगाई है। दिल्ली राज्य विधिक सेवा आयोग ने अदालत को जानकारी दी थी कि देश की राजधानी में 233 लोग दूसरों का मैला ढोने को मजबूर हैं। सोचिए कि सबसे बड़े प्रदेश और राजधानी में अगर ऐसे हालात होंगे, तो फिर दलित हितों को लेकर मौसमी बयानबाज़ी का मक़सद क्या हो सकता है?

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