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टॉम सर को कम जाना पर जितना जाना, बहुत जाना- कमलेश के मिश्रा

बोल बिंदास | आज टॉम सर(टॉम ऑल्टर) बहुत याद आ रहे हैं. वजह है आज (22 जून) उनका जन्मदिन होना. हमारी जिस फ़िल्म “किताब” की इतनी चर्चा हो रही है वह इस क़ाबिल बन सकी तो इसका बड़ा श्रेय टॉम सर को जाता है.

टॉम सर से मेरी कोई बहुत पुरानी मुलाक़ात नहीं थी, पर किताब के कॉन्सेप्ट ने मुझे उनके बेहद क़रीब ला दिया था.

किताब मसूरी में तिलक मेमोरियल लाइब्रेरी में, लैंडोर में, उनके घर पर शूट हुई, यह टॉम सर के अतिरिक्त सहयोग से सम्भव हो सका. वजह सिर्फ़ यह थी कि किताबों से उनका गहरा जुड़ाव था और “किताब” कहीं न कहीं उनके जीवन के एक पक्ष से गहरी जुड़ रही थी. मुझे याद है मैंने टॉम सर को बिना किताबों के कभी नहीं देखा. चाहे उनके साथ पहला शूट हो या फिर किताब शूट के वर्कशॉप के दरम्यान उनके मुंबई वाले घर पर नाश्ते की टेबल. काम या बातचीत के बीच का हर ख़ाली समय उनका किताब के पन्नों को समर्पित होता था. टॉम सर जैसे सहज कलाकार विरले ही होते हैं. हमारी फ़िल्म में रिया का किरदार निभाया है पूजा दीक्षित ने. टॉम सर एक दक्ष और नामी कलाकार और पूजा इंडस्ट्री में पाँव रखी एक नई कलाकार, पर वर्कशॉप से लेकर शूट तक टॉम सर ने अपनी सह कलाकार को अपनी सादगी से बेहद सहज रखने की कोशिश की। बक़ौल टॉम सर “अगर एक बार बड़े कलाकार का औरा नए सह कलाकार पर हावी हो जाए तो लाख कोशिश कर लो वह शूट पर भी दिखता ही है और यह ठीक नहीं होता ऐसे में हमारी ज़िम्मेदारी बनती हैं कि हम ख़ुद को सबके लिए सहज रखें”। टॉम सर के इस दर्शन का असर मेरी फ़िल्म पर ख़ूब हुआ, किताब दोनों कलाकारों के सहज और उम्दा अभिनय से सज पायी है तो इसका श्रेय टॉम साहेब को जाता है.


टॉम सर को कम जाना पर जितना जाना, बहुत जाना, बहुत सीखा. मसूरी टॉम साहेब का होम टाउन है और वे वहाँ, लोगों के बीच कभी भी सेलेब्रिटी की तरह नहीं रहे. चाय की टपरी पर बैठ जाना, हँसी ठहाके, गलियों से होते हुए पैदल ही अपने घर की ओर निकल जाना, रास्ते में जानने वाले का दुःख सुख पूछते जाना, ये सब देखा हमने. याद है पहले दिन वे शूट पर अपने घर से लोकेशन तक पैदल चल कर आए थे, ताकि इसी बहाने सुबह की सैर और अपने लोगों से मुलाक़ात हो जाएगी. इतने सहज और स्नेहधन से पूर्ण थे टॉम साहेब. वे जहाँ हैं उनका भरपूर आशीर्वाद मुझे और किताब को मिल रहा है. मैं कृतज्ञ हूँ.

इस जन्मदिन पर आपको सादर नमन🙏🙏

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