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चित्र भारती फिल्म महोत्सव :सिनेमा के दिग्गजों ने बताई फिल्म निर्माण की बारीकियां

नई दिल्ली: 20 फरवरी | चित्र भारती फिल्म महोत्सव में मंगलवार को सिनेमा जगत के दिग्गजों ने समारोह में आए फिल्म निर्माणकारों और सिनेमा के छात्रों से अपने अनुभव साझा किए और उन्हें सिनेमा जगत की बारीकियों ने भी रूबरू कराया। इसके अलावा विभ़़िन्न थेयेटर समूहों से जुड़े छात्रों ने समाज को संदेश देने वाले व नुक्कड़ नाटक की प्रस्तुत किए। इस दौरान विभिन्न श्रेणियों में चयनित हुई फिल्मों की स्क्रीनिंग भी की गई।

अपनी मास्टर क्लास में फिल्म डायरेक्टर श्री मधुर भंडारकर ने कहा कि फिल्म बनाने के लिए सबसे पहले बजट का ध्यान रखना होता है। उन्होंने अपनी फिल्मों का उदाहरण देते हुए कहा कि मैं कम बजट में अच्छी फिल्में बनाने में विश्वास रखता हूं। मैं खासकर महिला प्रधान फिल्में बनाता हूं। प्रश्नोत्तर के दौरान जब उनसे महिला प्रधान फिल्मों को बनाने का कारण पूछा गया कि क्या वह नारीवादी हैं तो इसके जवाब में उन्होंने कहा कि मैं सिर्फ मानववाद को मानता हूं। उन्होंने पदमावत फिल्म का उदाहरण देते हुए कहा कि अ भिव्यक्ति की आजादी के नाम पर एक तरफा सामाजिक सक्रियता नहीं होनी चाहिए। उन्होंने अपनी फिल्म इंदू सरकार का उदाहरण देते हुए कहा कि जब फिल्म का विरोध हो रहा था तो पुरस्कार वापसी गैंग के लोग खामोश थे।

श्री मनोज तिवारी ने कहा कि फिल्मों में जाने से पहले एक बात का हमेशा ध्यान रखें कि कोई भी रोल छोटा नहीं होता और यदि आपकी पारिवारिक पृष्ठभूमि फिल्मों की नहीं है तो आपको ज्यादा से ज्यादा मेहनत करने की जरूरत है। सिनेमा में धैर्य सबसे बड़ी चीज होती है यदि आप निराश हुए तो फिर सफलता से उतते ही दूर हो जाते हैं। श्री सुभाष घई ने ओपन फोरम में नए फिल्मकारों के साथ बातचीत की। उन्होंने कहा कि जीवन में हम यदि ये सोचें कि सिनेमा के ज्ञाता हो गए हैं तो वह सही नहीं है। सिनेमा की दुनिया में हमें जीवनभर सीखना पड़ता है। मैं भारतीय हूं और हमेशा भारत और इसकी संस्कृति को ध्यान में रखते हुए ही फिल्म बनाउंगा। चित्र भारती ने जो प्रयास किया है वह सराहनीय है। हम जिस भाषा के हैं उस भाषा में फिल्म बनाएं क्योंकि हम उस भाषा के भाव को समझते हैं। उन्होंने महान फिल्मकार सत्यजीत रे का उदाहरण देते हुए कहा कि वह कहते थे कि क्योंकि मैं बंगाल हूं इसलिए बंगाली फिल्म की अच्छी बना सकता हूं। पूर्व का ज्ञान पश्चिम के ज्ञान से उन्नत है लेकिन   हम पश्चिम के विचार में उलझे रहते हैं। हम लोगों को चाहिए कि हम ऐसा करें कि विश्व सिनेमा हमारे पीछे चले न कि हम उनके पीछे चलें।

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