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आध्यात्मिक मूल्य ही देश को जोड़ते हैं- प्रत्यूषा वत्सला

आध्यात्मिक मूल्य पूरे देश को एक कड़ी के रुप में जोड़ते हैं I विभिन्न भाषाएं, जाति  व पहनावा होते हुएभी आध्यात्मिक विचार व मूल्य ही वह तत्व  है जो देशवासियों को एक कड़ी में  जोड़ता है I यह विचार डॉक्टर प्रत्यूषा वत्सला प्रिंसिपल ,  लक्ष्मीबाई कॉलेज ने कहे I

मेधाविनी सिंधु सृजन व पी जी डी ए वी कॉलेज नेहरू नगर के सहयोग से भारतीय संस्कृति एवं युवा चिंतन विषय पर एक सेमिनार आयोजित किया गया जिसमें मुख्य वक्ता थे, डॉक्टर प्रत्यूषा वत्सला प्रिंसिपल लक्ष्मीबाई कॉलेज तथा एसोसिएट प्रोफेसर ज्योति राणा, डी ए वी  कॉलेज, फरीदाबाद, डॉ आर के गुप्ता प्रिंसिपल,  पी जी डी ए वी, नेहरू नगर,   प्रीति  मल्होत्रा, संयोजिका मेधाविनी सिंधु सृजन, सह संयोजिका डॉक्टर निशा राणा, शरण्या संस्था संयोजिका सुनीता भाटिया व कॉलेज का प्रबुद्ध महिला वर्ग भी उपस्थित रहा।

डॉक्टर प्रत्यूषा वत्सला ने अपने वक्तव्य में संस्कारों को संस्कृति का आधार बताते हुए कहा कि देश के उत्तर,दक्षिण, पूर्व,  पश्चिम को जोड़ने में आध्यात्मिक मूल्य व विचार मूल कड़ी का कार्य करते हैं। जो विचार और परंपरा हमें ऊपरी सतह पर दिखाई देते है वह  वास्तविकता  में सतह पर पड़ी धूल के समान हैं जब कि संस्कृति का वास्तविक  स्वरूप गहराई में उतरने पर ही समझ आता है I आध्यात्मिक मूल्य ही पूरे देश को एक कड़ी के रुप में बांधते हैं I भाषाएं, जाति, प्रांत,पहनावा भिन्न होते हुए भी एक आध्यात्मिक विचार व मूल्य ही वह तत्व है जो देशवासियों को एक करता है |

संस्कृति हर देश की  विशेषता है I युवा  भोगवादी संस्कृति से बाहर निकलकर  अध्यात्म व  दर्शन को समझने का प्रयास करें I  संस्कृति में जिज्ञासा हो व प्रश्न करने का अधिकार हो जैसे नचिकेता ने यम से किया था I भारतीय संस्कृति में पर्यावरण के मुख्य तत्व पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि को देवता की संज्ञा दी है I यूनेस्को ने भी ज्ञान योग व कर्मयोग के तालमेल की बात की है I युवा सज्जन हो,  विचारवान हो और ऊर्जावान होकर उचित अनुचित में भेद कर सके और दोनों पीढ़ियों के बीच कड़ी का काम कर सके, तभी सुंदर देश का निर्माण होगा I

डॉक्टर ज्योति राणा ने संस्कार, स्नेह , समन्वय, सहजता  और सहनशीलता के पांच ‘स’  को भारतीय संस्कृति का  आधार बताया I संस्कारी युवा समाज  के संबंधों में तालमेल  बिठाएं और गलत परंपराओं  जैसे भेदभाव , जातिवाद , शोषण  व कुरीतियों को तोड़कर नए विचारों को समाज में स्थापित करें, समाज में स्नेह का भाव रखें और ‘सर्वे भवंतु सुखिनः’  के सिद्धांत पर काम करें I प्रेम -तत्व समाज का आधार है I  युवा सहज भाव से सभी को स्नेह व प्रेम दें और  सहनशीलता  को जीवन में धारण करें तो समाज में समरसता स्थापित होगी I

शरण्या की संयोजिका सुनीता भाटिया ने  ‘त्यक्तेनभुञ्जीत:’ के सूक्ति वाक्य को श्री राम का उदाहरण देकर समझाया कि आज देश त्यागी  राम की आराधना करता है I वैभवशाली रावण की नहीं I  युवा जीवन में स्वार्थ व लालच से बाहर निकल समाज में  समरसता स्थापित करे, परिवार से जुड़े, तभी वह समाज से  जुड़ सकेगा I

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