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सियासत का शिकार किसान- अतुल गंगवार

अतुल गंगवार

देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी किसानों की सम्मान निधि उनके खाते में डालने के लिए ऑनलाइन कार्यक्रम के लिए आए तो देश के लोग इस बात का इंतज़ार कर रहे थे कि मोदी इस अवसर पर जब बोलेंगे तो क्या बोलेंगे? देश में चल रहे किसान आंदोलन से ना केवल इस देश के कृषि कानून समर्थक किसान परेशान हैं, उनके साथ देश की आम जनता भी परेशान है। किसान आंदोलन के नाम पर जिस तरह किसानों के तथाकथित हमदर्दों ने दिल्ली को चारों ओर से घेरा है उससे पूरी दिल्ली परेशान है। जगह जगह देश भर में मुठ्ठी भर लोगों ने सड़कों, रेल की पटरियों को रोक कर जनता को परेशान कर रखा है। आज मोदी जी ने अपने उद्बोधन में ऐसे लोगों की पोल खोल कर रख दी जो आज किसानों के हमदर्द बनकर उन्हीं (किसानों) का दर्द बढ़ा रहे हैं।

देश के पूर्व प्रधानमंत्री, भारत रत्न स्व.श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी के जन्मदिवस पर उन्हें स्मरण करते हुए मोदी जी ने कहा कि कृषि क्षेत्र में सुधारों के सूत्रधार अटल जी ही थे। उन्होंने कहा कि अटल जी का कहना था कि कृषि क्षेत्र में होने वाले तमाम भ्रष्टाचार राष्ट्र के लिए रोग के समान हैं। मोदी जी ने देश में सर्वाधिक समय राज करने वाले दल के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न स्व. श्री राजीव गांधी जी के उस कथन को उद्धत करते हुए कहा कि राजीव जी ने स्वयं स्वीकार किया था कि ऊपर से चला हुआ 1 रुपया नीचे पहुंचते हुए घिस जाता है। लेकिन आज हमारी सरकार ने तकनीक के इस्तेमाल से देश के 9 करोड़ से ज़्यादा किसानों के खाते में 18 हजार करोड़ रुपये की सम्मान निधि का वितरण किया है। रुपया घिसा भी नहीं है। सारा का सारा किसानों के खाते में गया है। उन्होंने कहा कि हमारी सरकार देश के किसानों के उज्ज्वल भविष्य के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि वह सब से, उन लोगों से भी जो उनके घोर विरोधी हैं किसानों के हित के लिए बात करने के लिए तैयार हैं। लेकिन बात मुद्दों, तर्क और तथ्यों पर होगी। उन्होंने किसानों से विनम्र निवेदन किया किसी के बहकावे में ना आयें।

मुझे लगता है मोदी जी का किसानों को किया गया ये संबोधन किसानों के लिए एक ओर मौका है अपनी समस्या का सम्मानजनक समाधान करने का। ये उन नेताओं को भी सोचना होगा जो किसानों का हितैषी होने का दावा करते हुए आज कड़ाके की ठंड में किसानों को सड़कों पर ले आए हैं। आखिर उनका जमीर क्या उन्हें नहीं झिंझोड़ता होगा कि उनकी जिद की वजह से अभी तक 31 किसान अपने प्राण गंवा बैठे हैं। सरकार निरंतर कह रही है आइये बात कीजिए। लेकिन नहीं जिद है पहले कानून वापिस हों। ये देश है जिसमें लोकतंत्र है। इसको भीड़ तंत्र ना बनाइये। आज आप सड़क पर हैं, कल हो सकता है कानून के समर्थक सड़क पर होंगे, देश को जनता द्वारा चुनी सरकार चलायेगी या फिर जनता द्वारा नकार दिए गए नेताओं द्वारा एकत्र की गई भीड़। ये भी आज देश को तय करना होगा। बात थी कृषि सुधार के लिए बनाए गए कानूनों की। जब इन कानूनों पर चर्चा होनी थी तो ये दल सोए हुए थे, सच तो ये हैं कि ये दल उस समय अपने अपने चुनावी घोषणा पत्रों में पंजाब के किसानों से सत्ता में आने के बाद कुछ इसी तरह के कृषि सुधारों के वादे कर रहे थे। आखिर क्या वजह है कि कल तक इन सुधारों की बात कर रहे ये दल आज इन कानूनों का विरोध कर रहे हैं? किसानों को भी उनके इस दोगले आचरण के बारे में सोचना समझना होगा।

साथ ही किसान आंदोलन की आड़ में अपना उल्लू सीधा कर रहे कुछ राजनैतिक दलों की मंशा को भी किसानों के साथ इस देश की जनता को भी समझना होगा। अन्नदाता के नाम पर देश की जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर रहे ये लोग कम से कम किसानों का तो भला नहीं कर रहे हैं।

आखिर क्या वजह है जो वामपंथी दल यहां किसानों के लिए मंडी व्यवस्था की वकालत कर रहे हैं वह इस बात पर क्यों ख़ामोश है कि उनके द्वारा शासित केरल में मंडी व्यवस्था लागू क्यों नहीं है? अगर ये मंडी व्यवस्था अच्छी है तो केरल में क्यों नहीं है? ये एक ऐसा प्रश्न है जिसका जवाब जनता को मांगना ही चाहिए। हालांकि जिस तरह की राजनीति अभी इस देश में चल रही हैं उसमें सवाल के जवाब या यूं कहें राहुल जी के अंदाज में ‘जवाब का सवाल’ मिलना तो मुश्किल है।

पश्चिम बंगाल में ममता दीदी ने केन्द्र सरकार द्वारा किसानों को दी जानी वाली किसान सम्मान निधि से भी वंचित रखा। आज अगर ममता दीदी का ममत्व किसानों के प्रति होता तो प्रदेश के 70 लाख किसान इससे लाभांवित होते। क्या किसानों को उनसे ये नहीं पूछना चाहिए कि यदि पंजाब के किसानों से उन्हें हमदर्दी है तो पश्चिम बंगाल के किसानों ने क्या अपराध किया है जो उन्हें केन्द्र सरकार की योजनाओं से वंचित रखा है? इस ‘जवाब का सवाल’ राहुल जी किससे पूछेंगे? ममता दीदी से या फिर मोदी से।

मोदी जी ने अपने उद्बोधन में पिछले 6 वर्षों में सरकार द्वारा किसानों का जीवन स्तर सुधारने के लिए किए गए कार्यों के बारे में भी बात की। अब अगर सरकार ने किसानों के लिए ये सब कार्य किए हैं तो किसान को तकलीफ क्या है इन नए कानूनों से? सरकार जब उनका भला सोच रही है, कर रही है तो इन कानूनों को भी आजमाने में क्या हर्ज है? सरकार बार बार कह रही है कि मंडी की पुरानी व्यवस्था चलती रहेगी।

एक सवाल ये भी उठता है कि अगर किसान इस विषय में सरकार के साथ संवाद ही नहीं करेंगे तो इस बात का समाधान कैसे निकलेगा? पहले कानून वापिस ले सरकार फिर होगी बात ये कहना है तमाम किसान नेताओं का। सरकार का कहना है बात कीजिए, कानूनों में कुछ सुधार की आवश्यकता होगी तो सरकार उस पर विचार करेगी। लेकिन किसान नेताओं की इस जिद से किसका भला होने वाला है? ये भी इस देश की आम जनता को जानने का हक है।

किसान नेताओं का सच भी तो हमें समझना होगा? सरकार की मंशा पर सवाल उठा रहे इन किसान नेताओं की हकीकत भी आम जनता को समझनी चाहिए। महेन्द्र सिंह टिकैत की विरासत पर रोटियां सेंक रहे राकेश टिकैत अपने गृह नगर मुजफ्फर नगर से चुनाव लड़े और 6.43 लाख वोटों से चुनाव हार गए। इसको समझिए 6.43 लाख वोटों से चुनाव हारने वाले राकेश टिकैत किसानों के चैंपियन बनने का दम भर रहें हैं।

किसानों के एक ओर चैंपियन बनने का दावा कर रहें योगेन्द्र यादव एक बार ही चुनाव लड़े हैं और उनकी हार का अंतर था लगभग 5.65 लाख वोट यानि इतने वोटों से वह हारे थे। एक साहब है तस्लीम रहमानी। ये दिल्ली की ओखला सीट से विधानसभा का चुनाव से लड़कर 150 वोट पाने वाले ये साहब टीवी पर किसानों के चैंपियन बने दिखाई देते हैं।

ये किसको धमका रहें हैं। देश के प्रधानमंत्री को जो 4.80 लाख वोटों से जीत कर संसद में हैं, देश के गृहमंत्री अमित शाह को जिनकी जीत का अंतर लगभग 5.60 लाख रहा है, देश की रक्षामंत्री को जो 3.47 लाख वोटों से जीत कर संसद में हैं या फिर 1.33 लाख वोटों से जीतकर संसद पहुंचे देश के कृषि मंत्री को। ये लोग इस बात को भूल रहें हैं वह हवा हवाई नेताओं की सरकार से बात नहीं कर रहें है। उनके सामने मोदी, अमित शाह जैसे नेता हैं जिन्हें जनता का समर्थन हासिल है।

राहुल गांधी जैसे नेता जो अपनी परंपरागत अमेठी की सीट जहां से वह तीन टर्म सांसद रहे। वहां अपने क्षेत्र की जनता का जीवन स्तर सुधारने में नाकाम राहुल गांधी को स्मृति इरानी ने बुरी तरह हराया। वह आज किसानों से आह्वान कर रहें हैं कि वह तीनों कानूनों के वापिस होने तक धरने पर डटें रहें। कड़ी ठंड में अपने आरामदेह घर में बैठ कर किसानों से ये आह्वान करने वाले राहुल गांधी क्या ये बताना चाहेंगे कि उनके पंजाब चुनाव के घोषणा पत्र में यही वादे किस लिए किए गए थे? क्या ये झूठे वादे थे, या अब वह झूठ की खेती कर रहें हैं? जनता को ये तो जानने का हक है राहुल जी।

एक बात ओर किसान हित में सरकार का विरोध करते करते पंजाब के किसान देश के उद्योगपतियों का विरोध किस लिए करने लगे? पंजाब में जिस तरह से जिओ के टॉवर तोड़े जा रहे हैं उससे किसानों और पंजाब की जनता को क्या हासिल होने जा रहा है। कल जब प्रदेश में उद्योगपति निवेश नहीं करेंगे तो रोजगार के अवसर कहां से उपलब्ध होंगे? और फिर अंबानी, अडानी, पतांजलि का सेलेक्टिव विरोध? माजरा क्या है? देश की जनता को इसका भी तो उन्हें जवाब देना ही चाहिए।

सिंघू बॉर्डर पर चल रहे इस फाइव स्टार आंदोलन का सच अब धीरे धीरे सामने आ रहा है। सरकार को इस तरह के आंदोलन से निपटने के लिए अब कड़े कदम उठाने चाहिए। इन कानूनों में क्या है ये देश के प्रधानमंत्री हाथ जोड़कर पूरी विनम्रता से बता रहें है। किसानों को वार्ता के लिए आमंत्रित कर रहें हैं। किसानों को भी अब इस बात को समझना चाहिए कि उन्हें इस समस्या का समाधान निकालना है। सबसे पहले वह अपने हितचिंतक बने नेताओं की असलियत को समझे। देश के हित में निर्णय लें। वह याद रखें कि वक्त हाथ से निकलता जा रहा है। देश की जनता इस आंदोलन को समझ रही है। एक ओर शाहीन बाग किसानों की आड़ में बनने नहीं दिया जायेगा। ये ना तो देश हित में है और ना किसानों के हित में। सरकार के साथ बात करके अपनी समस्या का हल निकाले और इसमें रुकावट बन रहें फर्जी नेताओं को बाहर का रास्ता दिखायें। यही सबके हित में होगा।

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