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ओछी सियासत का खामियाजा भुगत रहा शब्बीरपुर

ओछी सियासत का खामियाजा भुगत रहा शब्बीरपुर


नई दिल्ली,
सहारनपुर से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित शब्बीरपुर गांव। आजकल सियासत का केंद्र बना हुआ है। गांव के पीएससी और आरएएफ के जवानों ने डेरा डाला है। स्थानीय पुलिस, एलआईयू और जिला प्रशासन के तमाम लोग सक्रिय हैं। मीडियाकर्मियों की भीड़ वहां पर है। शासन स्तर पर हर मिनट गांव की हालत का जायजा लिया जा रहा है। हर पांच मिनट में गांव में तैनात अधिकारियों के फोन बजते हैं और आलाधिकारी उनसे गांव की स्थिति के बारे में जानकारी लेते हैं। बात कमाल की है जो गांव सुर्खियों में है वहां दलित और राजपूतों का संघर्ष है ही नहीं। दरअसल संघर्ष है सियासत का और स्वार्थ का। महज कुछ लोगों ने अपने सियासी स्वार्थों के लिए इस संघर्ष को जातीय संघर्ष बना दिया है। दिल्ली विश्वविद्यालय के दयाल सिंह कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. प्रवेश चौधरी के नेतृत्व में शब्बीरपुर इस मामले का पूरा अध्ययन करने गई टीम में पंजाब केसरी को भी आमंत्रित किया गया। प्रस्तुत है सहारनपुर से लौटकर पंजाब केसरी प्रमुख संवाददाता आदित्य भारद्वाज व फोटोग्राफर श्रेय गुप्ता की विशेष रिपोर्ट:-

गांव राजपूत बहुल प्रधान दलित समुदाय से
सामाजिक सौहार्द की इससे बड़ी मिसाल कहां मिलेगी कि राजपूत बहुल इस गांव में प्रधान दलित समुदाय से है। जाहिर है चुनावों में उसे हर तबके से वोट मिला। बहरहाल शब्बीरपुर गांव की आबादी लगभग चार हजार है। इसमें वोटरों की संख्या 2600 है। राजपूत बहुल गांव में 1400 की आबादी राजपूतों की है। दलित समुदाय के लोगों की आबादी 700 है। इसके लिए पिछड़ों में अन्य जाति के लोग जैसे निषाद, जोगी, धींवर आदि भी हैं। कुछ संख्या में गांव में मुस्लिम परिवार भी हैं। गांव के प्रधान शिवकुमार हैं जो दलित समुदाय से हैं। गांव दलितों का ही कहना वह बसपा पार्टी से संबंध रखते हैं। चुनावों में उन्हें सभी ने सहयोग किया था गांव के राजपूतों ने शिवकुमार के पक्ष में वोटिंग की और वह प्रधान बन गए।

ऐसे शुरू हुई घटना
दरअसल घटना की शुरुआत होती है पिछले महीने 14 अप्रैल को, गांव दो हिस्सों में बंटा हुआ है एक तरफ राजपूत हैं और दूसरी तरफ गांव के अन्य जातियों के लोग। अमूमन हर गांव में ऐसा ही होता है। दोनों तरफ से निकलने का रास्ता है। जिस तरफ दलित समुदाय के लोग रहते हैं वहां संत रविदास का एक मंदिर बना हुआ है। पिछले महीने गांव के दलित समुदाय के कुछ नई उम्र के लडक़ों ने निर्णय किया कि मंदिर के तिराहे पर बाबा साहेब अंबेडकर की मूर्ति लगानी चाहिए। गांव के लडक़ों ने मूर्ति बनवा ली। वहां गांव के राजपूत समुदाय के नई उम्र के भी कुछ लडक़े थे। मूर्ति लगनी चाहिए या नहीं। तिराहे पर मूर्ति लगाने की अनुमति लेनी चाहिए या नहीं इस बात उनके बीच बहस हुई। दलित समुदाय के युवकों ने कहा कि मूर्ति जरूर लगेगी तो ठाकुर समुदाय के लडक़ों ने कहा कि पहले प्रशासन से अनुमति लो फिर हमें मूर्ति लगाने में कोई दिक्कत नहीं है। गांव के कम उम्र के युवकों के बीच हुए झगड़े को सुलझाने की बजाए गांव में राजनीति करने वाले कुछ लोगों ने हाथों हाथ लिया और मामले को शांत करने की बजाए आग में पेट्रोल डालने का काम किया। गांव के एक दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले अरुण कुमार जो अब भीम आर्मी के समर्थक हैं वह कहते हैं कि मामले को तभी सुलझाया जा सकता था लेकिन तब किसी ने ऐसा नहीं किया। 5 मई को गांव पास स्थित शिमलाना गांव के महाराणा प्रताप इंटर कॉलेज में महाराणा की जयंती का कार्यक्रम था। आसपास के गांव के लोग जिनमें राजपूतों समेत तमाम बिरादरियों के लोग शामिल थे शब्बीरपुर गांव से रैली लेकर जा रहे थे। रास्ता संत रविदास के मंदिर के सामने से होकर निकलता था। गांववालों का कहना है कि गांव के प्रधान से डीजे बजाकर वहां से उन्हें निकलने को मना किया। इस बात को लेकर दोनों पक्षों में बहस भी हुई। रैली में ज्यादातर युवक थे। बड़े-बुजुर्ग नहीं थे। गांव के प्रधान ने पुलिस को फोन कर दिया। पुलिस आई और काफी बहस के बाद फैसला हुआ कि डीजे दूसरे रास्ते से लेकर जाएं। ऐसा भी हुआ भी। कुछ युवक डीजे लेकर दूसरे रास्ते से निकल गए। इस बीच गांव में बाइक से रैली निकालते हुए युवकों पर कुछ लोगों ने पथराव शुरू कर दिया। गांव के लोगों की मानें तो पथराव में पुलिसकर्मी भी घायल हुए इस बीच पथराव में राजपूत समुदाय के एक युवक की मौत हो गई।
शिमलाना गांव में पहले से राजपूत समुदाय के लोग हजारों की संख्या में जमा थे। मारा गया युवक सुमित राणा शिमलाना का रहने वाला था। तत्काल फोन घनघनाए और हजारों की संख्या में राजपूत समुदाय के लोग वहां पहुंच गए। लोगों में आक्रोश था नतीजतन गांव में आगजनी हुई तोडफ़ोड़ हुई। गनीमत रही कि गांव में किसी की जान नहीं गई। हालांकि इस बात से इंकार नहीं कि दलितों का नुकसान नहीं हुआ। दलित समुदाय के दल सिंह के परिवार में शादी थी। उसके रिश्तेदार भी आए हुए थे। दलसिंह का कहना है कि उनका घर जला दिया गया रिश्तेदारों की तीन गाडिय़ां भी जला दी गई। दलित समुदाय के रनीपाल को भी काफी चोट लगी है। गांव के प्रधान शिवकुमार के बेटे संतकुमार को भी काफी चोट लगी। इस समय वह देहरादून स्थित जॉलीग्रांट अस्पताल में है। पांच मई को हुई इस घटना के बाद गांव में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया।
मायावती के आने के बाद भडक़ी इलाके में और हिंसा
2015 में दलितों शिक्षा बढ़ाने और दलित उत्पीडऩ रोकने को भीम आर्मी का गठन हुआ। भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर ने इसकी स्थापना की थी। भीम आर्मी ने दलितों के घरों पर हुए हमले को लेकर जोरदार प्रदर्शन किए। सहारनपुर समेत आसपास के गांव के तमाम दलित समुदाय के युवक भीम आर्मी से जुड़े हैं। 23 तारीख को बसपा सुप्रीमो मायावती शब्बीरपुर पहुंची और लोगों को संबोधित किया। इसके बाद मायावती वहां से निकल गईं।
गांव लोगों का कहना है कि मायावती के आने से पहले बड़ी संख्या में भीम आर्मी से जुड़े युवक गांव में पहुंचे। गांव के राजपूत समुदाय के रमेशचंद्र कहते हैं कि गांव की सारी गलियां बाहर के युवकों से भरी हुई थीं। उन युवकों में से कोई भी गांव का नहीं था। उन्होंने गांव में आकर राजपूतों के घरों के दरवाजे पीटे दिन का समय था पुरुष घर पर नहीं थे। महिलाओं ने डर की वजह से दरवाजे बंद कर लिया। जैसे-जैसे खबर फैली आसपास के गांव के राजपूत समुदाय के लोग वहां इक_ा होना शुरू हो गए। इसके बाद कहीं दूसरी जगह पर दलित समुदाय के युवकों पर कुछ नकाबपोश लोगों ने हमला किया जिसमें एक युवक की मौत हो गई। इसका आरोप राजपूतों पर लगा। इस मामले में कई लोगों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज है। शब्बीरपुर में हुई आगजनी और तोडफ़ोड़ में राजपूत और दलित दोनों की समुदायों के लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हैं। दोनों ही तरफ के कुछ लोगों को पुलिस ने पकड़ा भी है। शब्बीरपुर गांव में हुए राजपूत समुदाय की युवक की हत्या के आरोप में वहां के प्रधान शिवकुमार के खिलाफ भी रिपोर्ट दर्ज है। फिलहाल वह फरार है उसकी तलाश की जा रही है।

हमें सियासत नहीं शांति चाहिए
शब्बीरपुर गांव में पिछड़ी जाति से आने वाले जनक कश्यप का कहना है कि गांव के कुछ राजपूतों को यह बर्दाश्त नहीं हो रहा कि सामान्य सीट होने के बाद भी एक दलित चुनाव जीत गया है। हालांकि वह गांव के सभी लोगों को इसके लिए दोष नहीं देते। वह यह भी कहते हैं कि गांव के राजपूतों ने भी प्रधानी के चुनाव में शिवकुमार को वोट दिया था। भीम आर्मी के समर्थक अरुण कुमार कहते हैं कि भीम आर्मी दलितों के लिए अच्छा काम कर रही है लेकिन हिंसा किया जाना सही नहीं हैं। उनका कहना है कि शब्बीरपुर में जो हो चुका है या हो रहा है उसे रोका जा सकता था लेकिन इसके लिए समय रहते प्रयास नहीं किए गए। उनका मानना है कि तमाम आर्थिक व समाजिक विषमताएं हर गांव की तरह उनके गांव में भी हैं लेकिन ऐसा राजनीतिकरण गांव में इससे पहले भी कहीं नहीं हुआ। गांव शांति चाहता है न की सियासत। राजपूत समुदाय के जयप्रकाश 72 वर्ष के हैं। गांव में हुई हिंसा में उनके भी दो भतीजे बंद हैं। वह कहते हैं कि जो हुआ वह गलत हुआ। शब्बीरपुर में जो झगड़ा हुआ था वह कम उम्र के बच्चों के बीच हुआ था लेकिन समय रहते कुछ लोगों के कारण बात को वहीं खत्म नहीं किया गया। तेजपाल कहते हैं कि गांव का हर आदमी अब शांति चाहता है इसके लिए गांव के सभी बड़े-बुजुर्ग मिलकर प्रयास कर रहे हैं। आज तक गांव में ऐसा कभी नहीं हुआ था। सारा गांव अब सिर्फ शांति चाहता है सियासत नहीं।

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