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मैं संघ में और मुझमें संघ- मा. गो . वैद्य

आदित्य भारद्वाज स्वतंत्र पत्रकार हैं
इस वर्ष नागपुर में संघ के तृतीय वर्ष के संघ शिक्षा वर्ग के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले ने अपने संबोधन में देशभर से संघ शिक्षा वर्ग में चुनकर पहुंचे स्वयंसेवकों से कहा था कि संघ को बाहर रहकर नहीं समझा जा सकता। जिस प्रकार तैराकी सीखने के लिए नदी में कूदना पड़ता है। उसी प्रकार संघ कार्य किए बिना संघ को नहीं समझा जा सकता। संघ का समझने के लिए उसके संबंध में किताबें पढ़ना और शोध करना ही पर्याप्त नहीं है। संघ कार्य करते हुए भी संघ को समझने में समय लगता है।
हाल ही में प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित और  मा. गो . वैद्य जी द्वारा लिखित पुस्तक  ‘मैं संघ में और मुझमें संघ’ पढ़ने के बाद यह बात और भी स्पष्ट हो जाती है। इस पुस्तक को पढ़कर संघ क्या है यह तो नहीं समझा जा सकता लेकिन एक स्वयंसेवक को कैसा होना चाहिए, यह जरूर समझा जा सकता है। मा. गो. वैद्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विभिन्न दायित्वों पर रहते हुए संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख रहे हैं। वर्तमान में संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य उन्हीं के सुपुत्र हैं।
पुस्तक को पढ़कर संघ को नहीं लेकिन एक स्वयंसेवक को को कैसा होना चाहिए ? उसका आचरण कैसा होना चाहिए ? संघ कार्य स्वयंसेवक के लिए कितना महत्वपूर्ण है वह जरूर समझा जा सकता है।
मा.गो. वैद्य जी ने संघ कार्य करने और समाजिक कार्यों में खुलकर भाग लेने की इच्छा के कारण अधिक वेतन पर सरकारी कॉलेज नौकरी नहीं की बल्कि एक ईसाई मिशनरी के प्राइवेट कॉलेज में उन्होंने कम वेतन पर लगातार 17 वर्षों  तक संस्कृत पढ़ाई ।
 ईसाइयों का कॉलेज होने के बाद भी भी मा.गो. वैद्य जी के संबंध सभी से अच्छे रहे। जबकि सभी लोग यह जानते थे कि वह संघ के स्वयंसेवक हैं और प्रखर हिंदूवादी और राष्ट्रवादी व्यक्ति हैं। अपने नौकरी के कार्यकाल में उन्होेंने लगातार संघ कार्य किया। अनेक पत्रिकाएं छापीं, आंदोलनों में भाग लिया लेकिन इस संबंध में कभी प्रबंधन ने उनसे सवाल नहीं किया। 1966 तक उन्होंने वहां पढ़ाया और बाद में संघ संकेत पर  ‘तरुण भारत’ के संपादक मंडल में आने के लिए उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दिया। यहां पर उन्होंने कॉलेज से तीस फीसद कम वेतन पर काम किया। आपातकाल के दौरान वह जेल में बंद थे। इस दौरान उनकी पुत्री की शादी हुई। बहुत कोशिशों के बाद भी उन्हें पैरोल नहीं मिली। पुस्तक में एक संस्मरण उन्होंने एक स्वयंसेवक राजा पांढरीपांडे के बारे में लिखा कि कैसे खेल के दौरान अचानक पानी आने से कान्हान नदी में डूबकर उसकी मृत्यु हो गई थी। वह लिखते हैं कि इस घटना के बाद संघ अधिकारी के तौर पर उन्होंने अनेक पर्यटनों का आयोजन किया, लेकिन पानी में खेलने का कभी कोई आयोजन नहीं किया। बहरहाल केवल इस लेख में पुस्तक की समीक्षा करना मुझे संभव नहीं दिखाई देता, लेकिन इतना जरूर है कि हर स्वयंसेवक को एक बार इस पुस्तक को जरूर पढ़ना चाहिए।

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