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सारे जहां से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा-शरत सांकृत्यायन

शरत सांकृत्यायन

आजादी के 70 साल। एक लंबा और कठिन सफर। क्या सफर के इस पड़ाव पर हम देशवासी पूरे विश्वास के साथ आज ये तराना गुनगुना सकते हैं कि, सारे जहां से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा? कुछ लोग भावावेश में कह सकते हैं, बिल्कुल। लेकिन इसका जवाब इतना भी आसान नहीं है। इसके लिए हमें पीछे मुड़कर बड़ी गहराई और ईमानदारी से पूरे सफर का आकलन करना होगा। किन हालातों का सामना करते हुए हम यहां तक पहुंचे हैं, कहां कहां ठोकरें खायीं, किन पड़ावों पर दम लेने के लिए रूके, रास्ते में कितने दोस्त मिले कितने दुश्मन, तूफानों और झंझावातों का कैसे किया सामना, कितनी रातें खुशगवार गुजरीं और कितनी आहें भरते हुए कटीं? हजारों सवाल मुंह बाए खड़े हो जाएंगे। क्या इतना आसान होता है सत्तर सालों का हिसाब किताब जांचना? लेकिन सरसरी तौर पर एक तस्वीर बनानी हो तो आज हम जहां खड़े हैं वहां के हालात, हमारे पूरे सफर का एक खाका तो खींच ही देते हैं। हमारा देश एक कृषि प्रधान देश रहा है। हम गर्व से कह सकते हैं अपनी 125 करोड़ की आबादी का पेट भरने में हम आत्मनिर्भर हैं। लेकिन क्या सचमुच सभी 125 करोड़ देशवासी रोज भरपेट खाना खा पा रहे हैं? अन्न उत्पादन में हम पूरी दुनिया में सबसे आगे होने का दावा करते हैं, फिर भी हमारे किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं। हम दुनिया के सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक हैं, फिर भी हमारे देश में करोड़ों बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। हम लाखों की संख्या में मोटरगाड़ियां बना रहे हैं, सड़कों पर गाड़ियों के चलने की जगह नहीं है, फिर भी लाखों बच्चे रोज मीलों पैदल चलकर स्कूल जाते हैं, बीमार के परिजन मरीज को मीलों कंधे पर लादकर अस्पताल पहुंचाते हैं और यदि मरीज गुजर जाए तो फिर लाश को कंधे पर ढोकर ही वापस घर ले जाते हैं। कल कारखानों, उद्योग व्यापार का जाल बिछ चुका है, फिर भी करोड़ों नौजवान बेरोजगार बैठे हैं। ऊंची ऊंची गगनचुंबी इमारतों ने आसमान ढक लिया है, फिर भी करोड़ों लोगों के सिर पर एक अदद छत नहीं है। हमारे देश में बनने वाली सस्ती दवाईयां पचासों देश में निर्यात होती हैं, लेकिन यहां रोज हजारों मरीज दवा और ईलाज के अभाव में दम तोड़ देते हैं। सत्तर साल बाद भी हजारों गांवों में बिजली की रोशनी नहीं पहुंची है, 90 फीसदी आबादी को शुद्ध पीने का पानी मयस्सर नहीं है, करोड़ों लोग आज भी खुले में शौच जाने को मजबूर हैं। करोड़पतियों – अरबपतियों की तादाद दिन दूनी, रात चौगुनी बढ़ रही है, लेकिन देश की 80 फीसदी आबादी 20 रुपये रोज से ज्यादा खर्च करने की हैसियत नहीं रखती। इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि हमने 70 सालों में कोई तरक्की ही नहीं की। आज हमारा आर्थिक विकास दर दुनिया में सबसे तेज गति से आगे बढ़ रहा है। चांद को कौन कहे, हमने मंगल ग्रह को छू लिया है। हमारे देश के डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक और आईटी प्रोफेशनल पूरी दुनिया में धूम मचा रहे हैं। फिर यह विरोधाभास क्यों? शायद इसलिए कि आधुनिकता और तरक्की की दौड़ में हमारा INDIA तो काफी आगे निकल गया लेकिन हमारा भारत काफी पीछे छूट गया है। और जबतक भारत की चाल INDIA के साथ कदमताल नहीं मिला लेती, यह गुनगुनाना मुश्किल है कि,


“सारे जहां से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा”


70वें स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं।
जय हिन्द।

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