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अकादमिक आतंकवाद मौखिक आतंकवाद से कहीं अधिक खतरनाक है – प्रोफेसर कपिल कुमार

नई दिल्ली में मेधावनी सिंधु सृजन, राष्ट्र सेविका समिति दिल्ली के तत्वावधान में संस्कृति भवन, माता लीलावन्ती सरस्वती बाल मंदिर, हरि नगर में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसका विषय था ” उपनिवेशिक मार्क्सवाद चिंतन एवम् वर्तमान राष्ट्रवाद”।

इस संगोष्ठी के प्रमुख वक्ता, इंदिरा गांधी सेंटर फार फ्रीडम स्टरगल स्टडीस के डायरेक्टर प्रोफेसर कपिल कुमार थे, अध्यक्षता राष्ट्र सेविका समिति की प्रमुख कार्यवाहिका मां सीता दीदी ने की। इस अवसर पर दिल्ली प्रांत की प्रमुख कार्यवाहिका सुनीता भाटिया जी, दिल्ली प्रांत प्रचारिका सुश्री विजया जी,निशा राना जी,चारू कालरा जी,गीता भट्ट जी और समाज के विभिन्न क्षेत्रों से आई अनेक बहनें भी उपस्थित रहीं। कार्यक्रम का संचालन श्रीमती रुबी मिश्रा ने किया।

प्रोफेसर कपिल कुमार ने कहा कि अकादमिक आतंकवाद मौखिक आतंकवाद से कहीं अधिक खतरनाक है,और स्वाधीनता प्राप्ति के बाद इतिहासकारों का एक बहुत बड़ा वर्ग भारतीय इतिहास को अत्यंत तोड मरोड़ कर प्रस्तुत करता रहा है। आज आवश्यकता है कि हम सब वैचारिक तोर पर स्वंय को सक्षम करें,केवल आस्था से इस नकारात्मकता का मुकाबला नहीं हो सकता, बल्कि अपने तार्किक और सबूतों के साथ इनका प्रतिकार करना ही होगा। इस के लिए उन्होंने कई उदाहरण भी दिए। जैसे कहा जाता है कि कोलम्बस ने भारत की खोज की थी।पर सत्य तो यह है कि भारत तो पहले से ही था, पर उसने तो भारत आने का रास्ता ढूंढ निकाला था। ऐसे ही जब ईस्ट इंडिया या डच कंपनियां भारत आईं तो उन्होने अपने नाम के आगे इंडिया लगाया।

पिछले कुछ सालों से भारत की राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं राष्ट्रवादी पहचान बहस का मुद्दा बन गई है। कुछ लोगों द्वारा भारत की अक्षुण्ण राष्ट्रीय अस्मिता को नकारते हुए मार्क्‍सवादी और पश्चिमी विचारधारा के प्रबल प्रभाव में भारत के इतिहास और सांस्कृतिक निरंतरता को नकार कर काल्पनिक धरातल पर इसकी राष्ट्रीय पहचान को भरमाने की कोशिश कर रहा है। यह वैचारिक प्रयास बहुत हद तक कुछ लोगों को प्रभावित भी करता है। क्योंकि पिछले पचास वर्षों से भारत की राजनैतिक एवं सांस्कृतिक पहचान के बारे में उधार के तर्कों पर आधारित एकतरफा बयानबाजी का बोलबाला रहा है। सैध्दांतिक पराधीनता ने विचारों को आज भी कुछ यों जकड़ रखा है कि इतिहासकार सामाजिक चिंतक आक्रांता साम्राज्यों द्वारा बनाए गये सिध्दांत को सुलझाने का साहस नहीं दिखा पा रहे हैं।
आर्यों के आक्रमण का झूठा इतिहास पढ़ा रहे हैं तथा एक देवतावादी धर्म और एकपक्षीय राजनैतिक चिंतन को भारत की सामाजिक एवं सांस्कृतिक एकता को खंडित करने का प्रयास कर रहे हैं। सेकुलरवादियों एवं मार्क्‍सवादियों के लिए यह काम आसान भी था क्योंकि लम्बे समय तक साम्राज्यवाद का शिकार रहा भारत का पढ़ा-लिखा अंग्रेजीदां मानस अपने अतीत से मुंह मोड़ चुका था। नये उद्धाटित चरमपंथी इस्लाम और ईसाई चर्चों के कट्टरपंथ की पहचान सदैव ‘राजनीति और धर्म’ का एकीकरण रहा है अत: उन्होंने हिन्दुत्व को भी अपने जैसा सिध्दांत मानकर पूर्वाग्रहपूर्वक उसका विरोध करना शुरू कर दिया। भारत की ‘एकात्म सांस्कृतिक राष्ट्रीयता’ को चुनौती इसलिए दी जाती है क्योंकि उनका बौध्दिक एवं राजनैतिक प्रपंच ही समाज के विघटनकारी प्रपंच पर खड़ा है। यदि वे भारत की सांस्कृतिक एकता स्वीकार कर लें तो फिर जातिवाद, फिरकावाद, साम्प्रदायिक तुष्टिकरण पर आधारित उनकी राजनीति ही चरमरा जाएगी। अलगाववादी राजनीति की सीधा आवश्यकता होती है विघटित राष्ट्रवाद। इसलिए कहा जाता है कि भारत कई उप-राष्ट्रीयताओं का समूह है। इस चिंतन का ऐतिहासिक तथ्यों या सत्य से कोई सरोकार नहीं है।

प्रोफेसर कपिल कुमार ने कहा कि‌ कम्युनिस्टों के अनुसार भारतीय राष्ट्रवाद का जन्म अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरोध स्वरूप हुआ। यह अंग्रेजों के भारत पर सफलतापूर्वक शासन करने के लिए राजनैतिक, प्रशासनिक एवं आर्थिक एकीकरण के कारण ही संभव हुआ। उनके अनुसार 19वीं शताब्दी से पूर्व राजनैतिक तौर पर भारत नामक कोई देश नहीं था। अंग्रेजों के आने के बाद तथा उनके द्वारा शिक्षा, विज्ञान एवं दर्शन जैसे विषयों का परिचय कराकर ही भारत के संस्कृति को एक राष्ट्र के रूप में उसकी पहचान मिली। सत्य तो यह है कि हम अतीत काल से ही सांस्कृतिक रूप से एक राष्ट्र हैं। राजनैतिक रूप से भले ही आजादी की लड़ाई के समय एक राष्ट्र की कल्पना की गई किन्तु अपने संस्कारों से हम एक राष्ट्र के रूप में बंधे हुए थे। यदि हम एक राष्ट्र नहीं होते तो अंग्रेजी साम्राज्यवादियों ने भी केवल उसी भाग को हिन्दुस्तान क्यों कहा जो एक सांस्कृतिक और सामाजिक परिधि में थे। जबकि अन्य देश भी उसी के प्रभाव क्षेत्र में थे क्या वजह थी जो उन्होंने इन स्वतंत्र राज्यों को ही ‘इंडिया’ के रूप में स्थापित किया? स्पष्ट है पुरातनकाल से ही उन राज्यों में भारत राष्ट्र के सांस्कृतिक एवं राजनैतिक अंश विद्यमान थे। मौलिकताविहीन सेक्युलरवादी अंग्रेजीदानों का मानना था कि भारत और पाकिस्तान के विभाजन का कारण ही यह था कि दोनों देशों के बीच कोई सामान्य पहचान नहीं उभर पाई।

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