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रिव्यु- इंदु सरकार : इमरजेंसी का पहलु

सेंसर बोर्ड और राजनीतिक पार्टियों से लड़ाई लड़कर आखिरकार मधुर भंडारकर की फिल्म ‘इंदु सरकार’ आज रिलीज हो गई. फिल्म ‘इंदु सरकार’ उसी वक्त से विवादों के घेरे में आ गई थी, जब इसका ऐलान हुआ था, क्योंकि इस फिल्म की पृष्ठभूमि 1975-77 के आपातकाल के समय की है, जिसमें देश में इमरजेंसी के दिनों की याद ताजा कराने की कोशिश की गई है. तो आइए, जानते हैं मधुर भंडारकर कीफिल्म ‘इंदु सरकार’ कैसी है?

कास्ट कृति कुल्हारी, तोता रॉय चौधरी, अनुपम खेर, नील नितिन मुकेश 
निर्देशक मधुर भंडारकर 
अवधि 2 घंटा 19 मिनट

इंदु सरकारटाइटल और सीधा संबंध

‘इंदु सरकार’ का टाइटल सुनते ही आप इसका सीधा संबंध इंदिरा गांधी सरकार से लगाने लगते हैं, जिनकी सरकार ने 1975 में भारत पर आपातकाल लागू किया था. हालांकि फिल्म में आपको इंदु सरकार एक महिला का नाम मिलेगा, जिसके माध्यम से मधुर भंडारकर ने भारत में आपातकाल के समय झेले गए दर्द को दिखाने की कोशिश की है. ‘इंदु सरकार’ को बनाते समय मधुर भंडारकर ने बहुत ही दिमाग से काम लिया है.

इंदुका बचपन

फिल्म में इंदु सरकार का बचपन एक अनाथ की तरह गुजरा है और उसे रुक-रुक कर बोलने की आदत है. इस आदत की वजह से उसमें कॉन्फीडेंस की कमी है. जिस वजह से वो अपने आप को ढंग से पेश नहीं कर पाती है. इसी समय उसकी मुलाकात तोता रॉय चौधरी से होती, जो कि फिल्म में एक सरकारी अफसर और इंदु के पति बने हैं.

पति के विचारों से सहमत नहीं होती इंदु‘ 

सरकारी नौकर होने के नाते तोता रॉय चौधरी की फिल्म में अपनी एक विचार धारा है, जो कि सरकार के आपातकाल का समर्थन करती है. उनको कोई फर्क नहीं पड़ता है कि सरकार के इस फैसले से आम लोगों पर क्या बीत रही है? वह सत्ता के हर फैसले का समर्थन करते हैं और इसके बदले वह अपने हर उस सपने को साकार कर सकते हैं, जो उन्होंने कभी खुली आंखों से देखा था. हांलाकि इंदु अपने पति केविचारों से सहमत नहीं है और वो भारत पर लगे आपातकाल के खिलाफ आवाज उठाने की ठान लेती है. अब इंदु जैसी लड़की जिसके अंदर आत्मविश्वास की इतनी कमी है, वो इतना बड़ा फैसला कैसे ले पाती है ? यह जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी.

सरल तरीके से डील किया गया आपातकाल

फिल्म ‘इंदु सरकार’ की सबसे खास बात यह है कि इसमें आपातकाल जैसे विषय के साथ बहुत ही सरल तरीके से डील किया गया है. फिल्म में आपको बहुत ज्यादा लड़ाई-झगड़ा दिखाने की जगह भावनात्मक नजरिये से यह दिखाया गया है कि आपातकाल के समय देश में किस तरह का माहौल रहा था. हम बचपन से यह सुनते आये हैं कि आपातकाल में देश ने किस तरह का दर्द झेला है, यह फिल्मउस दर्द को पर्दे पर बहुत ही खूबसूरती दिखाती है.

लाजवाब है सभी की एक्टिंग

अगर एक्टिंग की बात करें, तो इस फिल्म में सभी कलाकारों की एक्टिंग लाजवाब है. खास करते कृति कुल्हारी की, जो कि रुक-रुक कर बोलने वाली महिला बनी हैं. एक बार को भी आपको कृति इस रोल को निभाते हुए स्ट्रगल करती दिखाई नहीं देती हैं. उनके अलावा तोता रॉय चौधरी ने भी एक सरकारी नौकर का किरदार अच्छी तरह से निभाया है. हम यहां नील नितिन मुकेश के लिए नहीं भूल सकते हैं,जिन्होंने स्क्रीन पर कम समय लिया है लेकिन अच्छी परफॉर्मेंस दी है.

फिल्म की नकारात्मक बातें

फिल्म ‘इंदु सरकार’ की सबसे नकारात्मक बात यह है कि यह पर्दे पर एक विचार धारा की तरफ झुकी हुई लगती है. जो कि एक तरह से डायरेक्टर का फेलियर है कि वह अपनी ऑडियंस को यह विश्वास नहींदिला पाया कि यह एक बैलेंस्ड फिल्म है.

– साक्षी दीक्षित

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