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राष्ट्र प्रेम और इस्लामी मान्यताएं: डॉ.अलीम मोहम्मद

लेखक : डा. मोहम्मद अलीम

भारत दुनिया का अकेला ऐसा देश है जहां हिंदू और मुसलमान एक साथ बहुतायत की संख्या में सारे दुखों और सुखों के साथ सदियों से रहते आए हैं। भिन्नताएं भी रही हैं। खान-पान, संस्कृति एवं रीति रिवाज के मामले में। मगर एक साझी संस्कृति भी इसी के मेल से विकसित हुई जिसे हम हिंदुस्तान की साझी संस्कृति या विरासत के नाम से जानते हैं। जिसमें हमारे खान-पान, भाषा, पहनावा, रीति रिवाज, धार्मिक पद्धतियां अलग होते हुए भी कहीं न कहीं एक जगह जा कर मिल जाती हैं।

भारत के लगभग बीस करोड़ मसुलामना भारत का वैसे ही एक अटूट हिस्सा हैं जैसे कि 80 करोड़ या उससे ज्यादा हिंदू या अन्य धार्मिक समुदायों और जातियों के लोग।

भारतीय मुसलमानों ने आजादी के संघर्ष के दौरान अपनी उसी तरह कुरबानियां पेश कीं जितना कि देने का उसे हक़ था और जिसकी शिक्षा कुरान और हदीस ने उन्हें सिखाई थी। उन्हें मालूम था कि राष्ट्र या अपने देश से प्रेम ऐन इस्लामी उसूलों और मान्यताओं के मुताबिक है। यानि जो सच्चा देश भक्त नहीं हो सकता, वह एक सच्चा मुसलमान भी नहीं हो सकता।

इस फलसफे का अपनाते हुए भारत के मुसलमानों ने देश की आजादी के बाद भी अपनी जिंदगी की गाड़ी को आगे बढ़ाने की पूरी कोशिश की और देश के विकास और उन्नति में अपना भरपूर योगदान देने में कामयाब भी रहे। इस कौम ने बड़े बड़े वैज्ञानिक, जैसे कि ए पे जे अबुल कलाम, बड़े बड़े शिक्षाविद् एवं राजनेता जैसा कि अबुल कलाम आज़ाद और अन्य सैकड़ों विभूतियों देश को दीं। और वह सिलसिला आज भी जारी है।

इस्लाम राष्ट्र प्रेम की अवधारना को उसी प्रकार केंद्र में रखता है जैसे कि एक इंसान के शरीर में उसका दिल होता है।

पैगंबर मुहम्मद, जो इस्लाम के आखिरी पैगंबर थे और जो अल्लाह की तरफ से पूरी कायनात और मानव जाति को ईश्वरीय मार्ग दिखाने के लिए आज से लगभग चैदह सौ साल पूर्व अरब के रेगिस्तानों के बीच भेजे गए थे, उनका जन्म मक्का में हुआ था। यह वह शहर था जिसका अपना प्राचीन गौरवशाली इतिहास था और जिसका अपना राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं सामाजिक महत्व था। पूरे अरब में मक्का की हैसियत एक दिल की सी थी और उसकी धड़कन को सारा अरब जगत महसूस करता था।

पैगंबर मुहम्मद की हदीसों से हमें पता चलता है कि उन्हें अपने वतन अज़ीज़ मक्का से बेहद प्रेम और जज्बाती लगाव था। इसलिए जब पहली बार उन्हें नबी और रसूल और ईश्वर का दूत होने का पैग़ाम अता हुआ और वह अपनी घबराहट पर काबू पाने के लिए अपने समय के प्रसिद्ध ईसाई पादरी और विद्वान वरक़आ बिन नोफिल के पास गए अपनी पत्नी हजरत खदीजा के साथ तो उनकी जो भविष्यवायिां थीं उसमें एक यह भी थी कि एक ओर जहां उनके धार्मिक प्रचार प्रसार का मक्का में बहुत विरोध होगा, वहीं आपके अपने ही लोग एक दिन इस बात के लिए मजबूर कर देंगे कि आप स्वयं इस शहर को छोड़ कर विस्थापन यानी हिजरत करने के लिए मजबूर हो जाएंगे।

हजरत मुहम्मद को इस बात पर बहुत आश्चर्य हुआ था कि क्या ऐसा दिन भी आ सकता है कि उनहें अपने प्रिय शहर को छोड़ कर कहीं और जाना पड़ सकता है !

लेकिन हुआ भी ऐसा ही। न केवल उनके नए धर्म इस्लाम का पुरजोर विरोध हुआ बल्कि उन्हें अंततः तेरह सालों के प्रचार प्रसार के दौरान इस हद तक सताया और मजबूर किया गया और फिर अंत में उनकी जान तक लेने की बात सोची गई कि उन्हें मजबूर हो कर अपना शहर छोड़ना पड़ा। वह वहां से हिजरत यानी विस्थापन का रास्ता अपनाते हुए नए शहर मदीना की ओर रवाना हो गए।

मक्का की तरह मदीना भी धीरे धीरे उनके दिल व देमाग में वही स्थान लेने में कामयाब हो गया जैसा कि मक्का को लेकर उनकी भावनाएं थीं।

ऐसा कहा जाता है कि पैगंबर मुहम्मद की 10 साल की जो मदीना की जिंदगी थी , वह कई मानों में उनके लिए दूसरे जन्म स्थान की तरह था। इस शहर ने उन्हें न केवल मान सम्मान दिया था बल्कि उनके प्रिय धर्म इस्लाम के प्रचार प्रसार में भी सहायक बना था। इसलिए इसका महत्व उनकी जिंदगी में बहुत था।

इसी लिए बहुत सी हदीसों से इस बात की जानकारी मिलती है कि जब कभी पैगंबर मुहम्मद मदीना से किसी काम से तशरीफ ले जाते, विशेष रूप से लंबे या छोटे सफर पर रवाना होते तो वापसी में अपने शहर में आने की बेताबी उनकी इतनी बढ़ जाती थी कि उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। वह मदीना के घरों की दीवारों को जब दूर से ही देख लेते तो बेताबी के आलम में जल्दी पहुंचने की चाहत में अपने ऊंट को पैरों से इस क़दर टहोका लगाते कि उसकी रफतार तेज हो जाती थी।

कुरान में भी वतन की मुहब्बत का कई स्थानों में वर्णन मिलता है और मुसलमानों को समझाते हुए पूर्व के पैगंबरों की मिसला देते हुए, विशेष रूप से हजरत मूसा की मिसाल देते हुए समझाया गया है कि आखिर जिन लोगों ने जबरदस्ती तुम लोगों को अपने वतन से निकलने पर मजबूर किया उनके खिलाफ जिहाद क्यों नहीं करते ?

यानी जिहाद की इजाजत उसी हालत में है जब कोई बाहरी दुष्ट शक्ति आपके प्रिय देश और वतन को बुरी निगाह से देखे और उसे निशाना बनाए। आपकी इज्जत और आबरू को पामाल करे। आपके धन और संपत्ति को नष्ट करे। आपके देश और जमीन पर कब्जा जमा ले।

भारतीय मुसलमानों ने अपने इन ही इस्लामी उसूलों को सामने रखते हुए अपनी जिंदगी गुजारने को हमेशा अहमीयत दी है। दुशमन कोई भी हो, चाहे उसका तअल्लुक और संबंध किसी धर्म या समुदाय से हो, हर मामले में मुसलानों ने अपनी देश भक्ति का सबूत दिया है। पाकिस्तान और बंग्लादेश भले ही दो मुसलमान पड़ोसी मुल्क हों और जो इस देश का कभी एक अटूट हिस्सा रहे हों। मगर वास्तव में अगर वह हमारे मुल्क पर बुरी निगाह रखते हैं या हमसे संघर्ष की हिम्मत दिखाते हैं तो हमारा फर्ज बनता है कि हम उसी तरह उसका मुकाबला करें जैसा कि हम अपने अन्य दुशमनों के साथ करते हैं। और ऐसा हमेशा भारतीय मुसलमानों ने अपने देश वासियों के साथ किया भी है। और यही उनका धर्म इस्लाम उसकी शिक्षा भी देता है।

पाकिस्तान के साथ चाहे वह 1965 की जंग हो, या 1971 की या फिर कारगिल की जंग हो, मुसलमाना फौजियों ने भी अपनी कुरबानियां उसी दिलेरी के साथ पेश की हैं जैसे कि अन्य धार्मिमक समुदाय के फौजियों ने पेश की हैं।

अल्लाह तआला ने कभी भी वतन की मुहब्बत से मना नहीं किया। हां, यह अवश्य कहा कि वतन की मुहब्बत का यह अर्थ भी नहीं है कि तुम अपने धर्म को भूल जाओ, अपने पैदा करने वाले को भूल जाओ और जिन अच्छे कामों को करने का तुम्हें हुक्म दिया गया है उसे न बजा लाओ। यानी एक सच्चा देशभक्त मुसमलान वही हो सकता है जो कि सच्चा मुसलमान भी हो और अपनी इस्लामी शिक्षाओं का ठीक तरह से पालन भी करता हो।

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डॉक्टर मोहम्मद अलीम राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार प्राप्त लेखक एवं पत्रकार हैं।

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