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ग़ालिब (नहीं) छुटी शराब… राजशेखर पंत

ग़ालिब (नहीं) छुटी शराब…

राजशेखर पंत

अंधे को अँधा न कह कर अगर सूरदास कहा जाये तो सुनने वाले को बुरा नहीं लगता, साथ ही यह भी पता चल जाता है कि बोलने वाला एक सभ्य, संस्कारवान व्यक्ति है।पर भारतीय संस्कृति, जय श्री राम , गौमाता और देवभूमि जैसे जुमलों की बैसाखी से सत्ता में आयी सरकार जब सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय के चलते सांसत में आयी शराब लाबी को राहत पहुचाने की नीयत से राज्य में स्थित लगभग चौंसठ हाइवेज को यह कह कर डिस्ट्रिक्ट रोड्स मे डीनोटिफाई करती है कि- “राज्य के शहरी स्थानीय निकाय क्षेत्रों की सीमा के अंदर आने वाले राजमार्गों में जनसंख्या दबाव सहित मार्ग के किनारों पर भवन निर्माण, गतिविधियों में अधिक वृद्धि होने, मार्ग में सीवर लाइन, नाली, बिजली के स्तम्भ/ट्रांसफार्मर, टेलीफोन लाइन, स्थानीय निकाय के होर्डिंग आदि होने के कारण मार्ग के इन भागों का रख-रखाव और अन्य विकास व विस्तार ‘राजमार्ग’ की विशिष्टताओं के अनुरूप किये जाने में व्यवहारिक कठिनाई आ रही है…” -तो यह साफ़ हो जाता है कि कथित देवभूमि में आज भी सरकारी और दरबारी कठपुतलियों की डोर शराब लाबी के हाथ में है -अपने अन्य बिरादरों, जैसे खनन माफ़िया, जंगल माफ़िया इत्यादि के साथ. खैर, यह एक दीगर विषय है.

यूँ भी हमाम के पिछले दरवाज़े निकलने वाली नंगों की सामूहिक भीड़ के द्वारा, सुविधा और अवसरों की नज़ाकत भांपते हुए अगर अपने कपड़ों की अदला-बदली कर भी ली जाये तो उनकी फितरत और नीयत में किसी बदलाव की उम्मीद करना बेमानी होता है. ज़ाहिर है घर वापसी का अनुकूल अवसर आने पर उधार लिए हुए कपड़े यह कह कर वापस लौटाए जा सकते हैं कि – “क्षमा कीजियेगा आपके कपड़े कुछ तंग थे, में इनमें असहज महसूस कर रहा था.”

निम्न मध्यमवर्गीय संस्कारों में पले-बढ़े और थोड़ा बहुत पढ़े-लिखे मुझ जैसे आम आदमी के लिए शासक वर्ग से राजनैतिक शुचिता की उम्मीद करना, यह जानते हुए भी कि यह एक दिवास्वप्न है, कमोबेश स्वाभाविक है. हालाँकि अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि और संस्कारों के चलते मैं पूर्ण शाकाहारी हूँ, और शराब के लिए मेरा कभी कोई आकर्षण नहीं रहा है पर मेरा मानना है कि शराब पीना या मांसाहार एक निजी मामला है जिसमें दखलंदाज़ी की कोई खासगुंजाइश कभी नहीं होती. हाँ, शराब जब आपके व्यक्तित्व, आपकी ज़िन्दगी के तौर-तरीक़ों को कंडीशन करने लगती है तो यह चिंता का विषय हो जाता है. हमारे राज्य की समस्या भी यही है. यहाँ नशाखोरी एक सामाजिक बुराई बन चुकी है, उस आयु-वर्ग में भी जिसका इससे दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं होना चाहिए था.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश को अंगूठा दिखाते हुए उत्तराखंड की नवनिर्वाचित सरकार ने अपनी नीयत साफ़ कर दी है. सरकार के अथक प्रयासों से खनन पर लगी रोक भी हट चुकी है. साफ़ है, शासक वर्ग के लिए निर्वाचित होने की चिंता ‘ग्रेटेस्ट गुड ऑफ़ ग्रेटेस्ट नंबर’ जैसी किताबी राजनैतिक संस्कृति से कहीं ज्यादा मत्वपूर्ण है.

चुनावों के दौरान रेता-बजरी जैसी दुधारू लॉबी से जुड़े वोटर्स को संबोधित हमारे बड़े-बड़े नेताओं के सोशल मीडिया में वायरल हुए भाषणों का संदर्भ लें या फिर शहर-विशेष में नालों को पाट कर पार्किंग-लॉट में तब्दील करने जैसे अभूतपूर्व हालिया निर्णयों की; इस सच से दो-चार होने के लिए किसी खास मगज़पच्ची की जरूरत नहीं है कि सामाजिक परिवेश, रोज़गार, नशाखोरी, पर्यावरण या शिक्षा जैसी चीज़ें, पाँच सितारा होटलों में बिसलरी वगैरा के साथ डिस्कशन के लिए रिज़र्व कुछ सदाबहार नमूने भर हैं. वास्तविकता यह है कि शराब, खनन,और जंगल माफ़िया जैसी संगठित और संरक्षित लाबियाँ हमारे सम्पूर्ण राजनैतिक और प्रशासनिक तंत्र को अपने हिसाब से कंडीशन कर रही है. मैं अपवादों के अस्तित्व को नकार नहीं रहा हूँ, यही तो बची-खुची उम्मीदें हैं आम आदमी की,पर अफ़सोस कि चंद नखलिस्तानों से तपते हुए रेगिस्तान ठंडे नहीं हुआ करते. शराब बिकती रहे , यह सुनिश्चित करने के लिए हम हाईवेज़ को एक बचकाने तर्क से डीनोटीफाई कर सकते हैं, पर क्या करते हैं हम यह सुनिश्चित करने के लिए कि पहाड़ के गाँवों में कम से कम पीने का पानी तो आसानी से मिल सके? नैनीताल, भीमताल जैसे शहरों में यहाँ-वहाँ लाल-पीला रंग पोत कर, अशुद्ध अंग्रेज़ी-हिंदी में सूचना देने से ज़्यादा हंसाने वाले बोर्ड लगा कर, मल्लीताल फ्लैट्स में उबले अंडे बिकवा कर या फिर चिनार के पेड़ों से घिरे पुराने फव्वारे को निहायत ही फूहड़ तरीके से सजा कर हम पर्यटकों की बाट जोहते हैं, पर राज्य बनने के बाद निर्जन हुए तीन हज़ार गाँव पर हमारी नज़र नहीं जाती; भूल जाते हैं हम नैनीताल या भीमताल की झीलों की नब्ज़ पर हाथ रखना, बावज़ूद इस सच के कि ये झीलें इस क्षेत्र की जीवन रेखा हैं. नैनीताल में लगातार बढ़ रही फ्लोटिंग पापुलेशन या रसूख-दारों द्वारा किया जा रहे निर्माण कार्यों को नियंत्रित करना हमारे अजेंडे से अक्सर ग़ायब रहता है…. सैकड़ों उदाहरण हैं ऐसे जो यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि हमारे अपने चार्वाक ऋषि या उनके ग्रीक संस्करण एपीक्यूरस के सच्चे अनुयाइयों की तरह हमारे राजनेता, हमारे प्रशासक और हम सब सिर्फ वर्तमान में जी रहे हैं. आने वाली पीढ़ी के लिए एक बीमार और भ्रष्ट मानसिकता तथा एक बदरंग दुनिया की विरासत छोड़ने का ख़याल अब हमें डराता नहीं है.

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