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नागरिक कर्तव्यों पर बात के बहाने…राजशेखर पंत

 


राजशेखर पंत, पेशे से अध्यापक आप नैनीताल के बिड़ला विद्यामंदिर विद्यालय में  पढ़ाते हैं। स्वभाव से घुमक्कड़, प्रकृति प्रेमी, छायाकार राजशेखर के लेख विभिन्न राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर छपते रहते हैं। प्रस्तुत लेख उनकी फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है। आजकल के माहौल में ये प्रासंगिक है और हमारे आपके सामने जो सवाल खड़ा करता है, उसके जवाब में ही हमारी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की नींव छुपी है ।
ट्रेन में सफ़र करते हुए मूंगफली खाना हम हिंदुस्तानिओं का खास शगल है. पर कभी गौर किया है आपने, इस तरह खाने की पूरी संतुष्टि तभी हो पाती है जब मूंगफली के छिलके फर्श पर लगातार बिखरते रहे, कुछ उसी तरह जैसे संतरे या केले को सड़क पर चलते हुए, या किसी पार्क अथवा पिकनिक स्पॉट पर खाने का कर्म-कांड तब तक पूरा नहीं हो जाता जब तक कि उसके छिलके चारों तरफ न बिखरा दिए जायें. गुटखे, पान, तम्बाखू से तो बाकायदा दीवारों से लेकर फर्श तक, चित्रकारी कर अपनी उपस्थिति का ज़बरदस्त एहसास करवाया जा सकता है. काफी कुछ वैसे ही जैसे हम अपने आक्रोश का इज़हार, या फिर किसी मांग को जायज़ ठहराने का प्रदर्शन, सरकारी गाड़ियों और अन्य सार्वजनिक संपत्तियों को जला कर, या फिर रेल की पटरियां उखाड़ कर करते हैं.
यानी कि हम सिर्फ, उसी चीज़ को अपना मानते हैं जो सिर्फ हमारी है. जो हम सबका है, उसका उपयोग भले ही हमारा अधिकार हो, पर उसकी सुरक्षा, उसके रख-रखाव से हमें कुछ लेना-देना नहीं होता. ये कुछ उदहारण हैं जो में दे रहा हूँ सिर्फ यह स्पष्ट करने के लिए हैं कि हम अपने नागरिक कर्तव्यों के लिए कितने उदासीन हैं, ऐसे कर्तव्यों के लिए जो हमसे इसलिए अपेक्षित हैं कि हम मनुष्य हैं, सभ्य और सुसंस्कृत समझे जाते हैं और साथ ही पढ़े-लिखे भी. मैं उन नागरिक कर्तव्यों की बात फिलहाल नहीं कर रहा हूँ जिन्हें सरदार स्वर्णसिंह समिति की सिफारिश पर 42वें संशोधन के तहत संविधान में शामिल किया गया था और जो रूस के संविधान से प्रेरित थे.
ये तो नैतिकता से जुड़ी सीधी-सादी अपेक्षाएं हैं, जिन्हें मानने के लिए कानूनी दबाव, कम से कम किसी सभ्य समाज में नहीं रहता है. अब ये बात दीगर है कि हमारे समाज में नैतिकता को भी कानून के द्वारा सिखाया जाना अपरिहार्य हो चुका है. आप ख़ुद सोचिये, जब इन छोटे-छोटे कर्तव्यों और अपेक्षाओं को दरकिनार करना हमारे राष्ट्रीय चरित्र का हिस्सा बन गया हो तो उन नागरिक कर्तव्यों के लिए क्या कहा जा सकता है जिनका पालन हमसे कुछ त्याग और अपने व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठने की अपेक्षा करता है. इन कर्तव्यों की उपेक्षा दरअसल हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बन गयी है. हम अपने कार्यक्षेत्र में भी स्वाभाविक रूप से यह ढूँढने लगते हैं कि कौन सा उत्तरदायित्व हमारा ‘नहीं” है. जब कि समाज की उन्नति के लिए यह ज़रूरी है कि हम आगे बढ़ कर जिम्मेदारियां स्वीकार करें.
अब आये दिन जो हम अपने चारों ओर देखते हैं न, -बाढ़ आने पर एक विभाग अपनी जिम्मेदारियां दूसरे विभाग पर ठेल कर एक ब्लेम-गेम शुरू कर देता है, हमारे प्रतिभाशाली इन्जिनियर्स लखनऊ के मेट्रो ट्रेक या फिर दिल्ली में ऐसे ओवर-ब्रिज बनाते हैं जो कि ट्रेन चलने या कामनवैल्थ गेम्स के शुरू होने से पहले ही धराशायी हो जाते हैं; मॉब-लिंचिंग जैसे मुद्दों पर गेंद बड़ी आसानी से राज्य सरकारों के पाले पर सरका दी जाती है; धर्म की दुहाई दे कर समाज का ध्रुवीकरण किया जाता है; टैक्सपेयर के पैसे से चलने वाली संसद को एक भद्दा मज़ाक बना दिया जाता है….देश की अवनति के लिए ज़िम्मेदार इन सभी कारणों की फेहरिस्त वाकई बहुत लम्बी है.
आग्रह है मेरा समाज के पढ़े लिखे लोगों से, कि इन घटनाओं, शायद दुर्घटना कहना ज्यादा वाजिब होगा इन्हें, की तह तक जाने की अगर वे कोशिश करें तो वहां उन्हें वही मूंगफली के छिलके और गुटखे की पीक से बने चित्र दिखाई देंगे जिनका जिक्र मैंने शुरू में किया था. ये इसलिए, क्योंकि अपने नागरिक कर्तव्यों के प्रति लापरवाही का जो हमारा राष्ट्रीय चरित्र बन गया है उसकी अभिव्यक्ति हर उस जगह पर जहाँ हम हैं, कमोबेश उसी अनुपात में होती रहती है.
अपने नागरिक कर्तव्यों के प्रति हम यदि जागरूक होते तो हमारी पहचान एक भ्रष्ट राष्ट्र के रूप में नहीं होती; सफाई और शौचालय जैसे मुद्दों को हमारे प्रधानमंत्री द्वारा लालकिले की प्राचीर से उठाये जाने की जरूरत नहीं पड़ती; गंगा की सफाई के लिए गंगा एक्शन प्लान से लेकर नमामि गंगे जैसी बेनतीजा पर खर्चीली यात्रा हमारी प्राथमिकता नहीं बनती और बनारस के घाटों पर कूड़े के ढेर की पृष्ठभूमि में सूर्य को अर्घ्य चढाते किसी युवा सन्यासी की, किसी विदेशी पर्यटक द्वारा खींची गयी तस्वीर, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हमारी संस्कृति का पोस्टर नहीं बनती.
कैसा विरोधाभास है यह, प्रगतिशील बनने या दीखने की होड़ में हम स्मार्ट-सिटी, बुलेट-ट्रेन और मंगल-यान की बातें करते हैं, और हमारे सीमित संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा चुक जाता है गन्दगी के ढेर हटाने में; लोगों को यह बताने में कि बच्चों को स्कूल भेजना आज के परिदृश्य में हर नागरिक का कर्तव्य है. हम संविधान से लेकर सड़क तक बातें करते हैं समानता की, और हमारी नागरिक सुरक्षा के लिए जिम्मेदार पुलिस को अपनी ताकत और संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ता है दंगों से निपटने में. इन अंतर्विरोधों के चलते जब गाय, ओरंगजेब, अकबर, तीन तलाक, भारत माता की जै… वगैरा वगैरा हमारे संसाधन, समय और संभावनाओं को दीमक की तरह चाटने लगें तो देश कि उन्नति तो भाषणों, नारों और १५ अगस्त या २६ जनवरी को होने वाली तकरीरों का श्रृंगार बन कर ही रह जायेगी. इसमें फिर कैसा संदेह और कैसा आश्चर्य?
हम सजग हैं, पर सिर्फ अपने अधिकारों के लिए, बगैर इस तथ्य को स्वीकारते हुए कि कर्तव्य के धरातल के बिना अधिकारों का अस्तित्व संभव नहीं है. अगर पेट भर भोजन करना या एक इज्ज़तदार ज़िन्दगी जीना प्रजातांत्रिक देश में मेरा अधिकार है तो उस भोज़न के लिए संसाधन जुटाना और इज्ज़त के लिए काबीलियत हासिल करना भी मेरा ही कर्त्तव्य होगा, मेरे पड़ोसी का नहीं.
आधुनिक समाज या राज्य, फ्रांस की क्रांति का आधार रहे तीन शब्दों से जन्मा है- इक्वलिटी, लिबर्टी और फ्रेटर्निटी- समानता, स्वतंत्रता और भाईचारा. इन तीनों अवधारणाओं पर यदि गौर करें तो इनका आधार हमारे नागरिक कर्तव्य हैं. स्वतंत्रता को ही लीजिये, अभिव्यक्ति की आजादी अगर हमारे राष्ट्रीय ध्वज के अपमान और युवाओं द्वारा लगाये गए ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे… इंशा अल्ला… इंशा अल्लाह’ जैसे नारों में तब्दील होने लगें तो इससे राष्ट्र प्रेम जैसे मूलभूत नागरिक-कर्त्तव्य का क्षरण होता है. और यही फिर राष्ट्रीय स्तर पर अवनति के एक दुष्चक्र को जन्म देता है.
आज के समाज में जो हम मध्य युग की और वापसी कर रहे हैं, उसके मूल में यदि देखें तो यही छोटे-छोटे कारण हैं जो हमें कंडीशन कर रहे हैं. अभी हाल ही में हुई एक घटना का संदर्भ लीजिये. एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के वी.सी. ने विश्वविद्यालय परिसर में टैंक रखवाने की गुजारिश की है. गरज ये कि युवाओं में देशभक्ति की भावना जाग सके. सोचिये… जब देशप्रेम जैसा हमारा प्रमुख नागरिक कर्तव्य अंधे राष्ट्रवाद में बदलता है तो हम देश-भक्ति का पाठ भी टैंक से पढना चाहते हैं. हम भूल जाते हैं कि राष्ट्र-भक्ति का स्त्रोत सेना की बैरक नहीं साहित्य की क़िताबें और संस्कृति की विरासत होते है. मैं जिस कंडीशनिंग की बात कर रहा था उसका एक शास्त्रीय उदहारण है ये.
मेरा विनम्र आग्रह है आप सब से कि समझें इस सत्य को- कि बड़ी इमारत की बुलंदी छोटी-छोटी ईंटों की दुरुस्तगी पर ही निर्भर रहती है.
वैसे फिलहाल, एक शेर नज़र कर रहा हूँ, अकबर इलाहाबादी साहब का, आपकी खिदमत में-
बोले ये तुझको दीन के, इस्लाह फ़र्ज़ है.  इस्लाह का अर्थ है सुधार, रिफार्म

तो अर्ज़ है-
बोले ये तुझको दीन के इस्लाह फ़र्ज़ है.
और में चल दिया ये कह के कि आदाबअर्ज़ है.

मुझे उम्मीद है कि आप आदाबअर्ज़ कह कर जाने वालों में से नहीं हैं, आप निश्चय ही अपने विचारों में परिवर्तन की संभावनाओं को तलाशेंगे.

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