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जौहर के बारे में पढ़ तो लेते भंसाली

 संजय लीला भंसाली और उनके समर्थक इतिहासकारों को खुला पत्र-आदित्य भारद्वाज
आदित्य भारद्वाज- स्वतंत्र पत्रकार
राजपुताना आन—बान शान का प्रतीक चित्तौड़ सदैव दुश्मन के लिए अजेय रहा है, चित्तौड. अपनी मर्यादा के लिए यवनों का सिर काटने वाले वीरों की कहानियां लोगों के लिए उतनी की पावन और जितना की गंगाजल। चित्तौड़ किले में जहां हजारों स्त्रियों ने जौहर किया, उस जगह को लोग तीर्थ की तरह पूजते हैं। वहां की मिटटी का तिलक लगाकर हर भारतीय खुद को गौरवान्वित महसूस करता है। जब चित्तौड़ जाओ तो वहां की हवाओं में एक अलग ही खुशबू है, जोश है। वहां हर व्यक्ति के पास सुनाने के लिए एक कहानी है। कहानी भी ऐसी नहीं ध्यान से सुनें तो मुर्दे की रगो में भी रक्त उबाल मारने लगे। मैं चित्तौड़ कई बार गया हूं। पूरा मेवाड़ क्षेत्र इस जौहर को साके के नाम से जानता है। चित्तौड़ में  केवल एक साका नहीं हुआ बल्कि तीन साके हुए हैं। जहां अपनी अस्मिता और मर्यादा की रक्षा के लिए हजारों माताओं ने साका किया यानी जलती चिता में अपनी आहूति दी। यदि आज कोई व्यक्ति एक यवन को बहादुरों की तरह प्रस्तुत कर महज पैसा कमाने के लिए फिल्म बनाता है तो यह राष्ट्रद्रोह है।
चित्तौड़ का पहला साका
चित्तौड़ में पहला साका विक्रमी संवत 1356 में हुआ। जब अलाउददीन खिलजी महारानी पदमिनी को पानेकी कुत्सित लालसा लिए चित्तौड़ पर आक्रमण किया। वह चाहकर भी किले को जीत नहीं सका। जब किले में रसद का अभाव हो गया तो राजपूतों ने केसरिया बाना पहन लिया। केसरिया बाना मतलब जब केसरिया बाना पहनकर वीर रण में रण करने के लिए जाते थे तो उनका एक मात्र ध्येय होता था अंतिम युद्ध। यानी या तो जीतकर वापस आएंगे या फिर वीरगति को प्राप्त हो जाएंगे। रावल रतन सिंह के नेतृत्व में राजपूत वीरों ने किले के दरवाजे खोल दिए और दुश्मन पर भूखे सिंहों की भांति टूट पड़े। गोरा और बादल ने युद्ध में जो वीरता दिखाई आज भी उसके किस्से पूरे मेवाड़ में लोग शान से बताते हैं। बादल के बारे में कहा जाता है कि बादल बारह बरस रो, ल​ड़ियों लाखां साथ, सारी दुनिया बादल बारह बरस रो, लडि़यो लाखां साथ, सारी दुनिया पेखियो, वो खांडो वे हाथ अर्थात बादल 12 वर्ष का था। वह लाखों के संग लड़ा। सारे संसार ने उसके हाथ व खांडे की सराहना की है।
चित्तौड़ का दूसरा साका
चित्तौड़ का दूसरा साका महाराणा विक्रमादित्य के समय पर हुआ। चित्तौड़ पर गुजरात के बादशाह बहादुरशाह ने आक्रमण किया था। तब राजमाता कर्मावती के नेतृत्व में 13 हजार क्षत्राणियों ने चित्तौड़ किले में स्थित विजय स्तंभ के सामने जौहर किया था। इस युद्ध में 33 हजार वीर मातृभूमि की रक्षा के लिए बलिदान हुए थे। कहते हैं समय के अभाव में जो स्त्रियां जौहर नहीं कर सकी वे अफीम खाकर मृत्यु को प्राप्त हो गईं। उन्होंने अपने बालकों को तालाबों में फेंक दिया। करीब 3 हजार बालकों के शवों को किले में स्थित तालाबों और बावडि़यों में जाल डालकर निकाला गया। केसरिया बाना पहने हिन्दू वीरों ने युद्ध में इतनी मारकाट मचाई थी कि भैंस का एक बच्चा जिसे स्थानीय भाषा में पाड़ा कहते हैं, वह खून में बहता हुआ बाहर के दरवाजे तक आ गया था। इस जगह को आज भी पाड़ा पोल कहते हैं।
चित्तौड़ का तीसरा साका
चित्तौड़ का तीसरा साका सन् 1538 में हुआ। उस समय महाराणा उदयसिंह का चित्तौड़ के सिंहासन पर अधिकार था। अकबर ने चित्तौड़ को जीतने के लिए घेरा डाल दिया। राजपूत सरदारों ने आपस में परामर्श किया और यह निर्णय लिया कि महाराणा, राजकुमार और रनिवास सहित दुर्गम पर्वतों में चले जाएं और किले की रक्षा का भार जयमल राठौड़ को दे दिया जाए। जब अकबर किले को नहीं जीत पाया तो उसने जयमल को संदेश भिजवाया कि यदि चित्तौड़ के किले पर मुझे कब्जा दे दोगे तो मैं आपका सम्पूर्ण राज्य आपको लौटा दूंगा और साथ में बहुत से प्रदेश भी भेंट करूंगा। इस पर जयमल ने प्रत्युत्तर में अकबर को कहलवाया कि ‘है गढ़ म्हारो हूं धणी, असुर फिरे किम आंण, कूंची गढ़ चितौड़री, दीणी मुझ दीवाण’। जयमल लिखै जबाव जब, सुणज्यो अकबर शाह, आण फिर गढ़ ऊपरां, पडियां धड़ पतसाह। अर्थात यह दुर्ग मेरा अपना है। मैं इसका स्वामी हूं। इस दुर्ग की चाबियां मुझे भगवान एकलिंगजी के दीवान महाराणा ने सौंपी हैं। असुरों की दुहाई यहां कैसे फिर सकती है। अकबर तुम्हारी दुहाई किले पर तब ही फिर सकती है, जबकि हमारे धड़ इस धरती पर पड़ेंगे अन्यथा हमारे जीवित रहते तुम दुर्ग में प्रवेश नहीं कर सकते। जब अकबर ने सेना नहीं हटाई और राजपूत वीरों को कोई रास्ता नहीं दिखाई दिया तो उन्होंने साका करने का व राजपूतानियों ने जौहर करने का निश्चय किया। किले में चार स्थानों पर जौहर हुआ। राजपूत वीरों ने केसरिया वस्त्र पहने और किले के दरवाजे खोल दिए। सेनापति जयमल राठौड़ अकबर की गोली से घायल हो गए थे। चलने में असमर्थ जयमल के लिए राठौड़ कल्लाजी आगे आए। उन्होंने जयमल को कंधे पर बिठाया। दोनों हाथों में तलवारें लिए दोनों राठौड़ों का चतुर्भुज रूप देखकर रण क्षेत्र में भगदड़ मच गई। मुगलों से लड़ते हुए दोनों वीरगति को प्राप्त हुए।

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