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क्या कोरोना और बाढ़ को भूलकर सिर्फ चुनावी तैयारी में जुटे हैं नीतीश ?- मनीष वत्स

मनीष वत्स

बिहार में कोरोना के मामलों में लगातार हो रहा इजाफा चिंता का विषय है। ताजा आंकड़ों पर नजर डालें तो राज्य में अब तक साठ हजार से ऊपर पॉजिटिव मामले आ चुके हैं । 349 लोगों की मौत हुई है और 40,760 लोग कोरोना को हरा कर घर जा चुके हैं।

बिहार में चुनाव सिर पर है, ऐसे में कोरोना के बढ़ते मामले को लेकर राजनैतिक घमासान भी चरम पर है। मुख्य विपक्षी दल राजद के नेता तेजस्वी यादव कोरोना को लेकर काफी मुखर हैं और सरकार पर लगातार हमले कर रहे हैं। सरकार की सहयोगी पार्टी लोजपा भी कोरोना के बढ़ते मामले को लेकर नीतीश कुमार पर हमलावर है।
इन सबके बीच सरकार चुनाव की तैयारी में जुटी है। चुनाव आयोग अपनी तैयारी कर रहा है और सत्ताधारी दल अपनी।

भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यू के नेता विधानसभा वार वर्चुअल रैलियां कर रहे हैं। हालांकि विपक्षी दल भी चुनाव तैयारी में जुटे हैं पर चुनाव टालने को लेकर ये चुनाव आयोग को चिट्ठी लिख रहे हैं।

इन सबों के बीच बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था कुव्यवस्था में तब्दील हो गई है। कहीं अस्पतालों में मौलिक सुविधाएं नहीं हैं तो कहीं जांच सैम्पल बाढ़ के पानी में बह जा रहे हैं। स्वास्थ्य मंत्री की स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव से नाराजगी है तो मुख्यमंत्री कोरोना काल में 3-3 स्वास्थ्य सचिव बदल चुके हैं। पर स्थिति में कोई सुधार नहीं आ पा रहा है।
बिहार में स्वास्थ्य व्यवस्था चरमराई हुई है। डॉक्टरों का अभाव स्वास्थ्य विभाग की नाकामी को और बढ़ा ही रहा है। बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने 16 मई 2020 को पटना हाई कोर्ट में एक आंकड़ा पेश किया था। जिसके अनुसार राज्य में डॉक्टरों के कुल स्वीकृत पद 11645 हैं, इनके एवज में सिर्फ 2877 डॉक्टर नियुक्त हैं। 8768 पद खाली पड़े हैं। यानी 75 फीसदी से भी अधिक। शहरी क्षेत्र की स्थिति फिर भी थोड़ी ठीक है। गांवों में तो लगभग 85 फीसदी पद खाली हैं।

इन ढाई हजार डॉक्टरों के भरोसे 13 करोड़ की आबादी है। इन डॉक्टरों के पास पर्याप्त सुरक्षा किट नहीं हैं। WHO के अनुसार हर एक हजार की आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिये। बिहार में एक डॉक्टर के जिम्मे 50 हजार की आबादी है। ऐसे में कोरोना जैसी महामारी का इलाज मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होता जा रहा है पर सरकार को कोई सुध नहीं है।

हालांकि मुख्य विपक्षी दल के नेता तेजस्वी यादव स्वास्थ्य विभाग के नकारापन को लेकर सवाल उठा तो रहे हैं परन्तु सवाल उनसे भी है कि जब उनकी पार्टी की सरकार 15 सालों तक बिहार में थी तब उनके पिता नेतृत्व कर रहे थे, उस समय से बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था को दुरुस्त करने का काम क्यों नहीं हुआ ? बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी का कहना है कि “बिहार को बदहाली के रास्ते पर लाने का श्रेय राजद का है। 15 वर्षों के शासन के दौरान राजद ने बिहार का सिर्फ शोषण और दोहन किया। ना कोई अस्पताल बनवाया और ना ही किसी भी तरह की सुविधाएं उपलब्ध करवाई”

सुशील मोदी का प्रश्न जायज हो सकता था, जब वे खुद सत्ता में नहीं होते। पिछले 15 सालों से सुशील मोदी भी बिहार की सत्ता में जमे हुए हैं। अगर राजद ने काम नहीं किया तो उनको किसने काम करने से रोका था ? यदि राजद ने अस्पताल नहीं बनवाए, सुविधाएं नहीं उपलब्ध करवाई, डॉक्टरों की नियुक्ति नहीं की तो सुशील मोदी तो कर सकते थे।

कुल मिलाकर राजनीति के आरोप-प्रत्यारोप के दौर में बिहार की जनता ही पिस रही है। महामारी के इस काल खंड में जनता को डॉक्टर चाहिए, अस्पतालों में सुविधाएं चाहिए, कोरोना से बचाव के लिए सरकार की मदद चाहिए और तो और इस विषम स्थिति में जब रोजगार धंधे चौपट हो रहे हैं, खाने को रोटी चाहिए।

ये तुच्छ राजनीति तो बिल्कुल ही नहीं चाहिए जिसके सहारे बिहार के राजनैतिक दल अपनी चुनावी वैतरणी पार करने की आस में हैं।

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