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सिद्धांत और विचारधारा की नहीं दौलत और वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे हैं नक्सली : शरत सांकृत्यायन

सिद्धांत और विचारधारा की नहीं दौलत और वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे हैं नक्सली : शरत सांकृत्यायन

छत्तीसगढ़ का सुकमा एक बार फिर हमारे जवानों के खून से लाल हो गया है। नक्सली हमले में 25 सीआरपीएफ जवान शहीद हो गये। नक्सलियों की इस कायरतापूर्ण कार्रवाई की हर तरफ कड़ी निंदा हो रही है।


नक्सलियों के खिलाफ कठोर से कठोर कार्रवाई की मांग हो रही है। लेकिन यही सारी बातें पिछले हमले और उसके पहले के अन्य हमलों के बाद भी इतनी ही जोर शोर से हुई थी। हर बार सरकार ने नक्सलियों को नेस्तनाबूद कर देने की कसमें खाईं। लेकिन नक्सली हर बार पहले से और ज्यादा मजबूत दिखे। ऐसे में हमें समझना होगा कि सरकार की सोच के साथ ही साथ पुलिस और अर्धसैनिक बलों से कहां चूक हो रही है? आखिर हमारे जवान कहां चूक करते हैं कि नक्सली उन्हें इतने बड़े स्तर पर निशाना बना लेते हैं? माओवादियों के खिलाफ वर्षों से चलाए जा रहे अभियान बेअसर क्यों दिखने लगे हैं? और आखिर इसका उपाय क्या है? क्या इन अतिवादियों के खिलाफ अब सैन्य कार्रवाई ही अंतिम विकल्प बच गया है? इन सारे प्रश्नों के जवाब सिलसिलेवार ढंग से ढूंडने होंगे।

1. माओवादियों ने अपने आप को काफी तैयार कर लिया है। इन दिनों नक्सली कैंप में मिलिट्री के समकक्ष ट्रेनिंग दी जाती है। इसी वजह से नक्सलियों को फौज की लड़ाई की रणनीति के बारे में लगभग पूरी जानकारी होती है.

2. नक्सली हर एनकाउंटर का विश्लेषण बेहद गहराई से करते हैं। वहीं पुलिस में ऐसा कोई संगठन नहीं है या अब तक ऐसा कोई सिस्टम नहीं है, जिसमें एनकाउंटर का गहन विश्लेषण किया जाए। यही मुख्य वजह है कि पुलिस नक्सलियों के हमले के तरीके को समझ नहीं पाती है। सीआरपीएफ, कोबरा, आईटीबीपी आदि नक्सल इलाकों में तैनात की जाने वाली बटालियन को बुनियादी ट्रेनिंग दी जाती है। उन्हें अलग से नक्सलियों से लड़ने की अतिरिक्त ट्रेनिंग नहीं दी जाती है।

3. इस तरह की आंतरिक समस्या से निपटने के लिए सेना की मदद लेना समझदारी नहीं हो सकती। ज्यादातर नक्सल प्रभावित इलाके आदिवासी बहुल हैं। नक्सलियों को स्थानीय आदिवासियों का सहयोग और समर्थन हासिल होता है। ऐसे में इन जगहों पर सेना का प्रयोग नासमझी भरा फैसला हो सकता है।
माओवादी नेतृत्त्व आज भी मानता है कि वह जीत दर्ज कर लेंगे, हालांकि वे इस बात को भी कहते हैं कि इसके लिए उन्हें लंबी लड़ाई लड़नी होगी। पिछले साल हुई कार्रवाइयों में माओवादियों को बैकफुट पर डाला गया, लेकिन इसका कतई मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि माओवादी परास्त हो गए हैं।
नक्सलियों को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए सबसे जरूरी है राजनीतिक इच्छाशक्ति। सबसे पहले हमें उनके लक्ष्य और उनकी सोच को पूरी तरह समझना होगा। यदि नक्सल आंदोलन के इतिहास पर गौर करें तो इसकी शुरुआत हुई प. बंगाल में और बाद में एकीकृत बिहार में ये तेजी से फैला। लेकिन आज ये बंगाल और बिहार में मृतप्राय हो चुका है। और सबसे मजबूत कहां है तो छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड और तेलंगाना के खनिज बहुल इलाकों में। इसका आप क्या मायने निकालते हैं? सीधी सी बात है कि नक्सलवादी आंदोलन जिन सिद्धांतों, जिस विचारधारा और सोच पर शुरू हुआ था उसे कब का तिलांजली दिया जा चुका है। आज का पूरा नक्सली आंदोलन बस लेवी वसूली का धंधा मात्र रह गया है। इसीलिए बंगाल और बिहार, जहां लेवी मिलने की संभावनाएं जैसे जैसे कम होती गयीं, नक्सली गतिविधियां भी सिमटती चली गयीं। यहां के दमित, शोषित, खेतिहर मजदूरों की दुर्दशा से उनका कोई नाता नहीं रह गया। अब इनके निशाने पर वैसे राज्य हैं जो खनिज सम्पदा से भरे हों, जहां भरपूर पैसा है, फलता फूलता उद्योग व्यापार है, आधारभूत संरचना के विकास पर हजारों करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं। और इन सभी क्षेत्रों पर अपना प्रभुत्त्व कायम करने और भयादोहन के लिए इन्हें चाहिए नौजवानों की फौज, अत्याधुनिक हथियार और पैसा। अनपढ़, गरीब, बेरोजगार आदीवासी युवक युवतियों को पैसे और ताकत का लालच देकर ये अपने साथ जोड़ते हैं। लेवी में वसूले जा रहे करोड़ों रुपये से अत्याधुनिक हथियार खरीदे जाते हैं, नक्सलियों का खर्च चलता है और महानगरों में छुप कर रह रहे इनके शीर्ष नेता ऐशो आराम की जिन्दगी जीते हैं, जमीन जायदाद खरीदते हैं, महंगी गाड़ियों पर घूमते हैं। उनके बच्चे अंग्रेजी बोर्डिंग स्कूलों में पढ़ते हैं। इसी पैसे का एक मोटा हिस्सा उन तथाकथित बुद्धिजीवियों को भी जाता है जो सभ्य समाज और मीडिया में नक्सल आंदोलन के पक्ष में प्रोपेगंडा वार चलाते हैं। और इन्हीं सारी गतिविधियों के रास्ते में जब सुरक्षाबलों की कार्रवाई रोड़े अटकाने लगती है तब उनके खिलाफ ये बड़ा नक्सली हमला होता है। इन हमलों के पीछे नक्सलियों का उद्देश्य होता है सुरक्षाबलों के मनोबल को तोड़ना, उनकी गतिविधियों पर ब्रेक लगाना और उनके पास से अत्याधुनिक हथियार लूटना।
इसलिए सरकार को यदि सचमुच इनके खिलाफ निर्णायक कदम उठाना है तो इन सारी परिस्थितियों पर गंभीरता से विचार करते हुए, पूरी तैयारी और योजना के साथ इनके सारे संसाधनों और सभी स्त्रोतों पर एक साथ हमला करना होगा। आदिवासियों के अंदर सरकार और व्यवस्था के प्रति विश्वास जगाकर उन्हें नक्सली प्रभाव से दूर करना होगा। विशेष प्रशिक्षित दस्तों को नक्सलियों के खिलाफ अभियान में लगाना होगा। सूचना तंत्र को मजबूत बनाना होगा। और सबसे बड़ी बात, नक्सलियों की रणनीति और सोच की दिशा को पकड़ना होगा। ये सारी कवायद जब संयुक्त रूप से लगातार चलायी जाएगी, तभी इस समस्या को जड़ से खत्म किया जा सकता है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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