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संदेश और मनोरंजन का मेल ‘टॉयलेट एक प्रेम कथा’: कमलेश के.मिश्र

कमलेश के.मिश्र

टॉयलेट: एक प्रेम कथा. अक्षय कुमार की फ़िल्म है. और अक्षय कुमार फ़िल्म को मज़ेदार, दर्शनीय और कमाऊ बनाने के सारे नुस्ख़े जानते हैं. तो इस लिहाज़ से उनकी यह फ़िल्म “मज़ेदार, दर्शनीय बिकाऊ और कमाऊ” इन तीनों चारों पेपर में फ़र्स्ट डिविज़न से पास है. इस लिहाज़ से कह लीजिए कि अच्छी फ़िल्म है. फ़िल्म के टाइटल में दो चीज़ें हैं टॉयलेट और प्रेम.. प्रेम के मोर्चे पर यह फ़िल्म एक दम फ़िट बैठ गई है अक्षय और भूमि पेंधेकर की केमिस्ट्री इस प्रेम कथा को एकदम रसीली बना रही है. मथुरा में सेट इसकी कथा ब्रज क्षेत्र की चटक ठिठोली से शुरू होती है..और अंत तक इसे क़ायम रखे है.. लेकिन “टॉयलेट” जो इस फ़िल्म का मुख्य टाइटल और मुद्दा है वह अपने बड़े “मायने” से दूर है. लोटा पार्टी उन महिलाओं को कहा गया है जो भोर होते शौच के लिय खेतों को जाती है. नित्यक्रिया की यह प्रक्रिया कितनी शर्मशार करने वाली, ख़तरे से भरी और सामाजिक रूप से चुनौती पूर्ण होती है यह किसी से छुपी नहीं है. पर फ़िल्म की पटकथा इसे इस तरह पेश कर रही है जैसे तमाम महिलायें खुले में शौच जाने को एंजॉय करतीं है और यह मुहल्ले या टोले भर की महिलाओं का विमर्श काल है. हक़ीक़त की ज़मीं पर जाकर देखें तो इस देश की महिलाओं ने खुले में शौच के जो दुशपरिणाम झेले हैं वे भयावह हैं. घर में शौचालय न होने के कारण गाँव क़स्बों की महिलायें आपातकाल में जो कष्ट उठातीं हैं, वे हमारी शहरी सोच से परे हैं. टॉयलेट एक प्रेम कथा में केशव की भूमिका निभा रहे अक्षय अपनी पत्नी जया ( भूमि पेंधेकर) की पीड़ा तो समझ पाए हैं पर अफ़सोस की इसके पटकथा लेखक महिलाओं के समग्र दर्द को समझ नहीं पाए या कहें निर्देशक श्री नारायण सिंह दिखा नहीं पायें हैं. फ़िल्म इस विषय की गहरायी को समझ पाती तो और बेहतर होती.. लेकिन शायद तब बाज़ार उन्हें इसकी अब वाली क़ीमत न दे पाता. फ़िल्म का संवाद अच्छा है. दर्शक हँस रहे हैं, उसे एंजॉय कर रहे हैं. आजकल रिलीज़ हों रहीं १०- १२ फ़िल्मों में किसी एक फ़िल्म का कोई एक गाना ऐसा बन पड़ता है जो महीनों सालों तक ज़ुबान पर चढ़ा रहता है, इस फ़िल्म में ऐसे एक गीत की जगह थी, जो बन न सकी।अक्षय, भूमि, सुधीर पाण्डेय, दिव्येन्दु सभी अपने किरदार में फ़िट है.. पर अनुपम खेर का कैरेक्टर इस फ़िल्म में समझ से परे है. सीधे सीधे कहें तो बेवजह ठूँसा हुआ है. एक बड़े अख़बार की बड़ी पत्रकार महोदया ने इस फ़िल्म में अनुपम खेर के चरित्र की तुलना रियल लाइफ़ toilet टायकून डॉक्टर विंदेश्वर पाठक से की है. मेरा ख़याल है ऐसा करना बिलकुल भी ठीक नहीं है बल्कि मेरी नज़र में आपत्तिजनक है. फ़िल्म में अनुपम एक बेहद सतही किरदार निभा रहे हैं…. जो सन्नी लियोनी  का दीवाना है… उनके किरदार का टॉयलेट बनाने / बनवाने जैसे किसी भी कार्य में योगदान नहीं है. ऐसे चरित्र की तुलना सुलभ शौचालय के संस्थापक उन डॉक्टर पाठक से करना गैर ज़रूरी है जिनका शौचालय के क्षेत्र में किया “टू पिट टॉयलेट” अविष्कार BBC की लिस्ट में दुनिया के 5 शीर्ष आविष्कारों में शुमार है। बहरहाल टॉयलेट एक प्रेम कथा एक बार देखने लायक तो है ही. थोड़ा सा सामाजिक सरोकार, पूरा मनोरंजन. दर्शकों का पैसा वसूल भी कह सकते हैं.

 

– कमलेश के मिश्र⁠⁠⁠⁠

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