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धड़ों में बंटा मीडिया देश के लिए घातक 

—अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर न फैलाएं सनसनी 
—एक तरफा न सोचे मी​डिया, सनसनी बनाने से बचे 
आदित्य भारद्वाज
 असहिष्णुता दरअसल है क्या। असहिष्णु कौन है, मीडिया में आजकल एक सवाल छाया रहता है। फ्रीडम आॅफ एक्सप्रेशन यानी अभिव्यक्ति की आजादी देश में नहीं हैं । ऐसे तमाम मुदृदे मीडिया का एक तबका उठाता रहता है। असहिष्णुता, अभिव्यक्ति की आजादी और मीडिया का रुख, इस विषय पर रविवार को ईस्ट एंड क्लब में एक विमर्श का आयोजन किया गया। इस आयोजन के दौरान विभिन्न क्षेत्रों के लोगों ने अपने विचार रखे। मीडिया स्कैन के तत्वावधान में आयोजित हुए इस कार्यक्रम की खास बात यह थी कि न यहां कोई अतिथि था, न ही कोई मुख्य वक्ता के तौर पर आमंत्रित था, मंच पर सभी को अपनी बात रखने का अधिकार था।
करीब तीन घंटे तक चले इस विमर्श में कई बातें निकल कर सामने आईं। मसलन मीडिया जिस तरह से चीजों को रिप्रेजेंट करता है क्या वह सही है। कार्यक्रम के दौरान दिल्ली पत्रकार संघ के पूर्व अध्यक्ष अनिल पांडे ने कहा कि दरअसल मीडिया दो धड़ों में बंट गया है। एक धड़ा वह है जिसका दशकों से मीडिया पर वर्चस्व है और दूसरा धड़ा वह है जो इसके विरोध में है। मीडिया को तटस्थ रहने की आवश्यकता है। किसी भी चीज को सनसनी बनाकर प्रस्तुत करना मीडिया की आदतोें में शुमार है। एक धड़ा खुद को लेफटिस्ट कहता है तो दूसरा खुद को राइटिस्ट। मीडिया में इस तरह की मानसिकता नहीं होनी चाहिए। विचार किसी का कुछ भी हो सकता है लेकिन वह लेखन में नजर नहीं आना चाहिए। पत्रकार एवं  राजनीतिक कार्यकर्ता दीप्ति रावत ने कहा कि लंबे समय तक उन्होंने मीडिया में काम किया है और जिन पत्रकारों को उन दिनों बड़ा और निष्पक्ष पत्रकार माना जाता रहा है धीरे—धीरे उन सबकी कलई खुल रही है और उनका पक्षपात पूर्ण रवैया जगजाहिर हो रहा है। अपनी बात को दीप्ति ने आशुतोष, राजदीप सरदेसाई और बरखा दत्त के उदाहरणों से स्पष्ट किया। कार्यक्रम में आउटलुक से प्रभात कुमार, ईटीवी से रविप्रकाश, अहमदाबाद से डॉ मयूर जोशी ने भी अपनी बात रखी।

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