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मोदी मंत्रिमंडल विस्तार पर अभी तक इस पहलू पर चर्चा क्यों नहीं हुई?-रवि पाराशर

 

 जिस प्रकार से मंत्रिमंडल विस्तार में नरेन्द्र मोदी ने जनता के चुने नुमाइंदो पर भरोसा ना करके अपने चुने दो अफसरशाहों को मंत्री बनाया है उससे उठे सवालों का जवाब तलाशता वरिष्ठ पत्रकार रवि पाराशर का ये लेख

दो ग़ैर-सांसद पूर्व अफ़सरशाहों को केंद्र में मंत्री बनाए जाने से बड़ा सवाल खड़ा होता है कि क्या हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली छीजने तो नहीं लगी?  क्यों प्रचंड बहुमत वाली बीजेपी के सांसदों में प्रधानमंत्री को पूर्व आईएएस के जे अल्फ़ोंस और पूर्व आईएफ़एस हरदीप सिंह पुरी के विकल्प नहीं मिले? ये दोनों किसी सदन के सदस्य नहीं हैं। इस गंभीर सवाल पर अभी तक मीडिया में विमर्श नहीं हुआ है। हालांकि मंत्रिमंडल में किसी को भी शामिल करने का अधिकार प्रधानमंत्री का है और ऐसा भी पहली बार नहीं हुआ है कि सदन की सदस्यता न होने पर किसी को मंत्री न बनाया गया हो, लेकिन किसी पार्टी या गठबंधन को अभूतपूर्व बहुमत के बाद भी अगर बाहर से विशेषज्ञ मंत्री बनाए जा रहे हैं, तो इसका विश्लेषण होना ही चाहिए।

अच्छी बात है कि सरकार वे लोग चलाएं, जिनकी प्रशासनिक दक्षता सिद्ध हो। लेकिन इसका ध्वन्यर्थ यह भी है कि सियासत में ऐसे दक्ष लोगों की सीधी दिलचस्पी ज़रूरत के मुताबिक़ क्यों नहीं है? हालांकि वोटिंग प्रतिशत बढ़ा है, फिर भी पढ़े-लिखे और समाज-सरकारों पर स्पष्ट सकारात्मक राय रखने वाले बहुत से लोग ऐसे हैं, जो वोटिंग ही नहीं करते। बहुतों की दिलचस्पी तो वोटिंग कार्ड तक बनवाने में नहीं है। सवाल है कि राजनीतिक पार्टियों को देश की व्यवस्था चला सकने वाले लोगों को शुरुआत से ही जोड़ना क्यों नहीं चाहिए? यह सियासी पार्टियों की नैतिक और सार्थक ज़िम्मेदारी है कि वे अच्छे लोगों को ख़ुद उनके घर चलकर जोड़ें, उन्हें झकझोरें। बहरहाल, पीएम मोदी ने इसकी शुरुआत कर दी है। भविष्य में बीजेपी और इस विचार से सहमति रखने वाली सभी पार्टियां इस तरफ़ ज़रूर सोचेंगी, यह उम्मीद की जा सकती है।

आमतौर पर मंत्रिमंडल विस्तार या फेरबदल बड़ी परिघटना नहीं होती, लेकिन मोदी मंत्रिमंडल के तीसरे विस्तार ने जिस तरह सुर्ख़ियां बटोरी हैं, उससे फिर साबित हुआ है कि वे लीक से हटकर सोचते हैं। जोख़िम लेने की उनकी प्रवृत्ति है। शपथ ग्रहण समारोह के बाद तमाम दिग्गज राजनीतिक विश्लेषकों और रिपोर्टरों के क़यासों के उलट रक्षा मंत्रालय की कमान निर्मला सीतारमन को सौंपकर मोदी ने फिर पूरे देश और दुनिया को चौंका दिया। आज़ादी के बाद पहली बार किसी महिला को स्वतंत्र तौर पर रक्षा मंत्रालय सौंपकर मोदी ने न केवल नारी शक्ति पर विश्वास का संदेश दिया, बल्कि दक्षिण भारतीय वोटरों को भी लुभाने का काम किया।

इससे पहले इंदिरा गांधी ने पीएम रहते हुए रक्षा मंत्रालय अपने पास रखा था। सीतारमन को राजनीति में आए ज़्यादा वक़्त नहीं हुआ है। इसके बावजूद वे मंत्रिमंडलीय प्रोटोकॉल में सियासी दिग्गज अरुण जेटली और सुषमा स्वराज से ऊपर आ गई हैं।

दक्षिण में बीजेपी अभी तक कर्नाटक में ही सरकार बना पाई है, लेकिन वह सरकार भी भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी रही थी। इसी तरह चौंकाने वाला फ़ैसला है चार पूर्व नौकरशाहों को मंत्री बनाने का। केरल कॉडर के तेज़तर्रार पूर्व आईएएस अफ़सर के जे अल्फ़ोंस को मंत्रिमंडल में लाकर मोदी ने फिर दक्षिण की तरफ़ नज़र पैनी की है। इसी तरह पूर्व आईएफ़एस अफ़सर हरदीप सिंह पुरी को भी राज्य मंत्री बनाया गया है। इसके अलावा बीजेपी सांसद पूर्व आईएएस आर के सिंह और पूर्व आईपीएस सत्यपाल सिंह को राज्य मंत्री बनाकर पीएम ने साफ़ संदेश दिया है कि सरकार की कमान उन्हें ही सौंपी गई है, जो योजनाओं का असरदार ढंग से क्रियान्वयन कर सकेंगे।

अच्छे काम करने वालों को प्रमोशन मिला, लेकिन पिछले छह साल में रेल मंत्रालय को 10वां मंत्री मिलना चिंता पैदा करता है। यूपीए-2 सरकार के आख़िरी तीन साल से लेकर अभी तक पीयूष गोयल 10वें रेल मंत्री हैं। साफ़ है कि भारतीय रेल पटरियों से उतरती लग रही है। इस ओर बहुत ध्यान देने की ज़रूरत है। एक और नियुक्ति ध्यान खींचती है। आज़ादी के बाद पहली बार खेल मंत्रालय की कमान ओलंपिक मेडल जीत चुके खिलाड़ी को सौंपी गई है।

हालांकि विजय गोयल का क़द क्यों घटाया गया, यह समझ में नहीं आया। राज्यवर्धन राठौड़ को उनका मंत्रालय दिया जाना तो ठीक है, लेकिन गंभीरता से काम करने वाले गोयल को अगर उनकी योग्यता के मुताबिक़ ज़िम्मेदारी मिलती, तो उनका सही उपयोग होता।

बहरहाल, इस मंत्रिमंडल विस्तार से महिलाओं को ख़ुश होना चाहिए। सुरक्षा पर संसदीय समिति में अब आधी नुमाइंदगी महिलाओं की होगी। मोदी कैबिनेट में अब महिला मंत्रियों की भागीदारी 23 प्रतिशत होगी। सेना में महिलाओं की भूमिका पर विचार अब एक महिला करेगी, जो उनकी ताक़त और कमज़ोरी समझती है। जहां तक सवाल सहयोगी दलों को इस बार जगह नहीं मिलने का है, तो प्रधानमंत्री को मिलाकर अभी 76 मंत्री हैं। नियम-क़ायदों के हिसाब से 81 मंत्री हो सकते हैं। इस तरह पांच सीटें अभी ख़ाली हैं। सही तालमेल रहेगा, तो पीएम एक और विस्तार कर ही सकते हैं।

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