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अलगाववाद और आतंकवाद से हजारों वर्ष पुराना है कश्मीर का इतिहास : राम माधव

 

नई दिल्ली, 11 अगस्त। रिसर्च एंड हेवलपमेंट फाउंडेशन फौर इंटेग्रल ह्यूमेनिज्म के तत्वावधान में त्रैमासिक पत्रिका ‘मंथन’ के ‘कश्मीर विशेषांक 1 और 2’ का विमोचन आज राष्ट्रीय संग्रहालय के सभागार में किया गया।

इस अवसर पर भाजपा महासचिव एवं जम्मू-कश्मीर के प्रभारी श्री राममाधव, जम्मू कश्मीर स्टडी सेंटर से श्री जवाहल लाल कौल, जम्मू-कश्मीर विधानसभा अध्यक्ष डॉ. निर्मल सिंह तथा श्री उत्पल कौल ने जम्मू-कश्मीर से संबंधित विषयों की जानकारी दी।

इस विषय पर श्री राममाधव ने कहा कि जम्मू-कश्मीर हजारों वर्षों से भारत की अविभाज्य भूमि है और यह भारत से कभी अलग नहीं होने वाला। वहां अलगाववाद 70 वर्ष और आतंकवाद 30 वर्ष पुराना है लेकिन जम्मू-कश्मीर का इतिहास हजारों वर्ष का है। कश्मीर जिससे देश तथा समाज का मन जुड़ा हुआ है उसके सही इतिहास को लोगों के सामने लाना बहुत महत्वपूर्ण काम है। कश्यप ऋषि से लेकर कल्हण कवि तक, कम्बोज रिपब्लिक से लेकर महाराजा रणजीत सिंह के साम्राज्य तक इतिहास में भारत का अभिन्न अंग रही हुई भूमि है कश्मीर। कोई यह न समझे कि किसी की कृपा से 1947 में भारत में आया कश्मीर। कश्मीर की भूमि ही नहीं वहां का एक-एक नागरिक भी हमारा है, उसका जीवन और दिमाग ठीक रखना भी हमारा कर्तव्य है। अगर वो गलत कर रहा है तो उसे ठीक करना होगा, आज हम उसी प्रयास में लगे हुए हैं। मांग करने का अधिकार देश के प्रत्येक नागरिक को है लेकिन वह संविधान के दायरे के अंतर्गत होनी चाहिए। आतंकवादी आतंकवादी है चाहे पाकिस्तान का हो या कश्मीर का दोनों के साथ एक सी कार्यवाही होनी चाहिए। कश्मीर के लोगों को आश्वासन देना होगा कि हिन्दुस्तान उनके साथ खड़ा है। हमने सरकार इसलिए बनाई क्योंकि जम्मू-कश्मीर हमारा है, इतने सालों से जम्मू-कश्मीर के लिए देश लड़ रहा है, जम्मू-कश्मीर के लिए कुछ करने का मौका ही नहीं मिला। जम्मू-कश्मीर की जनता को वापस देश की मुख्यधारा से जोड़ने का एक अवसर अब मिला था लेकिन जब लगा कि इस विचार को लेकर सफलता नहीं मिल रही तो एक क्षण नहीं लगाया वहां की सत्ता छोड़ने में। कश्मीर में अलगाववाद और आतंकवाद इतने लम्बे काल तक इसलिए चलता आ रहा है क्योंकि किसी राष्ट्रवादी दल की वहां सरकार नहीं थी। हमने वहां सरकार छोड़ी है लेकिन जम्मू-कश्मीर नहीं। अपने पुरुषार्थ से जम्मू-कश्मीर के पुनरुद्धार के प्रयास जारी रहेंगे।

मंथन पत्रिका के इस विशेषांक के अतिथि संपादक श्री जवाहर लाल कौल ने चिंता प्रकट करते हुए बताया कि केवल राजनीति ही अब जम्मू-कश्मीर को जानने का मानक बन गई है, आज आवश्यक है कि वहां के बारे में ज्यादा से ज्यादा तथ्यपरक जानकारियां एकत्र कर हम विशेषज्ञों के पास भेजें। आज ‘मंथन’ के इन विशेषांकों में जम्मू-कश्मीर के विषय में इस्लाम के आगमन के पूर्व तथा उसके बाद का कश्मीर इसी तरह का एक प्रयास है । हमने मंथन के बारे में लिखते समय यह कभी नहीं सोचा कि हमारा ही विचार सबसे श्रेष्ठ है। जिन तथ्यों को कश्मीर में छिपाया गया उन्हें इसके माध्यम से सामने रखा गया है। एक समय कश्मीर धर्म, पंथ, विचारधारा, साहित्य, कला की प्रयोगशाला था। ऐसा वहां पहले कभी नहीं हुआ हुआ था कि दो समुदायों के बीच शास्त्रार्थ हो रहा हो और दोनों में असहमति के कारण द्वेश या हिंसा हुई हो। विचार एवं मतभिन्नता के कारण हिंसक विरोध नहीं हुआ था कश्मीर में। शास्त्रों के अनुसार परखने के बाद जो सामने आया उसको सबसे स्वीकार किया था। अतः बौद्ध, शैव आदि मत कश्मीर की प्रयोगशाला रूपी भूमि से ही विश्व के अन्य क्षेत्रों में पहुंचे। लेकिन आज यह धारणा बन गई है कि जम्मू-कश्मीर राज्य में हिंसा के अतिरिक्त कुछ नहीं बचा। लेकिन जम्मू-कश्मीर का असली चेहरा अब भी खोया नहीं है, वहां कई लोग है जो कश्मीर के वर्तमान हालात से खुश नहीं हैं। कश्मीरी समाज डरा हुआ है, बंदूक के साये में वहां के वर्तमान हालात के उन्होंने समझौता कर रखा है।

डॉक्टर निर्मल सिंह ने कहा कि महाराजा हरिसिंह की भूमिका जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण है, सबसे ज्यादा ऐतिहासिक अन्याय महाराजा हरिसिंह के साथ हुआ है, उनके व्यक्तित्व को ठीक प्रकार से प्रस्तुत करने की आवश्यकता है। 1932 में महाराजा हरिसिंह ने जम्मू-कश्मीर में हरिजनों को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दिलवाई, बाल विवाह समाप्त करने के लिए शारदा एक्ट भी उन्होंने बनाया। मुस्लिमों को मुख्यधारा में लाने के लिए- जो मुस्लिम स्कूल नहीं जाते थे उन्हें जबरन स्कूल भेजने की व्यवस्था करवाई, यहां तक कि उनके लिए विद्यालयों में कुरान को भी पाठ्यक्रम में शामिल करवाया। कश्मीर को अंग्रेजो के चुंगल से बचाने के लिए ही उन्होंने 1927 में जम्मू-कश्मीर में स्टेट सब्जेक्ट का कान्सेप्ट दिया था लेकिन देश स्वतंत्र होने के बाद अलगाववादियों ने इसका गलत अर्थ देकर कश्मीर को भारत से अलग करने के प्रयासों में इस्तेमाल किया।

‘मंथन’ के संपादक डॉ.महेश चन्द्र शर्मा ने कार्यक्रम की समाप्ति पर सबको धन्यवाद देते हुए कहा कि भारत के विभाजन ने ही कश्मीर की समस्या पैदा की। श्री उत्पल कौल ने मंथन के इस विशेषांक में जम्मू-कश्मीर के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों के बलिदानों की जानकारियों का संकलन किया है।

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