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वामपंथी राज में दम तोड़ता लोकतंत्र

डॉ प्रवेश चौधरी साथ में आदित्य भारद्वाज 
केरल में एक और संघ के स्वयंसेवक की हत्या कर दी गई। गौर करने वाली बात है कि हाल ही में केरल में संघ और भाजपा कार्यकर्ताओं की लगातार हो रही हत्याओं के विरोध में प्रदेश की माकपा सरकार के खिलाफ जनसमर्थन हासिल करने के लिए भाजपा ने रैली निकाली थी। अभी 11 नवम्बर को देशभर से आये अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के 50,000 से अधिक कार्यकर्ताओं ने इन हत्याओं के विरोध में प्रदर्शन किया था।  इसके बाद भी हत्याओं का सिलसिला थमने का नाम नही ले रहा। एक बार फिर संघ के स्वयंसेवक की निमर्मता से हत्या कर दी गई। केरल में लगातार लोकतंत्र का गला घोटा जा रहा है। इसे रोकने के लिए व्यापक कदम उठाने जरूरी हैं।
एबीवीपी की रैली का दृष्य
 राज्य भारत के दक्षिण पूर्व के समुंदरी सीमा से सटा बहुत खूबसूरत  राज्य हैं , भारतीय लोकगाथाओं मे केरल को परशुराम के फरसे से निर्मित राज्य के रूप में देखा जाता है। सांस्कृतिक रूप से अधिकाधिक समृद्ध प्रांत भगवान विष्णु के बावन अवतार की प्रत्यक्षदृष्टा आर्थिक रूप से समृद्ध, भारत में व्यपार का एक अहम मार्ग |भारत के तमाम बड़े आंदोलनों और महापुर्षों की भूमि जहां कहीं शंकराचार्य हैं जो भारत को एक सूत्र में पिरोने हेतु कश्मीर से कन्याकुमारी विभिन्न पीठों की स्थापना करते हैं, कहीं पर नारायण गुरु और आयंकली का सामाजिक समन्न का आंदोलन हैं|केरल सदैव से भारत के दर्शन के संवर्द्धन में अहम भूमिका का निर्वहन करता रहा है | कभी केरल में अय्यांकली दलितों , वंचितों के अधिकारों को लेकर लड़ाई लड़ते दिखते हैं , तो कभी नारायण गुरु लोगों  मे शिक्षा का प्रचार प्रसार करने हेतु एक नये मत को  केरला की धरती पर जन्म देते हैं, परंतु क्या इन सबके विचारों को किसी सत्ता और सरकार ने कभी दबाया दलितों के सड़क पर चलने के आंदोलन का संपूर्ण समाज और सरकार ने समर्थन किया और कानून बना हां कुछ पुरातनपंथियों ने जरूर विरोध किया पर उनकी संख्या नाम मात्र की रही | लेकिन जहां केरल में विचार अभिवयक्ति की आज़ादी की सर्वधिक वकालत करने वाले तथाकथित वामपंथी लोगों की सरकार है वहां क्या स्थिति हैं इस पर एक नज़र डालना ज़रूर है, ऐसा इसलिए क्योंकि ये लोग देश– दुनिया भर में घूम -घूम कर विचार अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की वकालत करते नहीं थकते हैं | परंतु अगर इनके शासित देशों , प्रांतों को देखे तो स्थिति बिलकुल उसके विरुद्ध ही देखी  जाती है चीन जो वामपंथियो का सदैव प्रेरणा स्रोत रहा है।  यदि छात्रों ने कोई मांग सरकार से की तो उनको टैंकों से उड़ा दिया गया वहीं पूर्व की पश्चिम बंगाल की सरकार और आज की केरल की सरकार मे किस प्रकार से जनता और बुद्धिजीवी वर्ग जो उनके विचार का नहीं पर कितना अत्याचार होता हैं इसको आराम से देखा जा सकता हैं | विचार अभिव्यक्ति हमारी तो हे परंतु दूसरे का न विचार हे न उसकी अभिव्यक्ति ही केरल मे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और बीजेपी के कार्यकर्ताओं का दमन और उनकी हत्या क्या विचार की आज़ादी के साथ नहीं जुड़ा लेकिन  मीडिया के साथी कभी इस बिन्दु को नहीं उठाते हैं , अब तक 50 वर्षों में केरल मे लगभग 300 संघ और उसके विचारमत के संगठनो के कार्यकर्ताओं की हत्या की गई है | अगर इतिहास को टटोला जाए तो आज़ादी के एक वर्ष के बाद ही संघ और उसके विचार से वामपंथी तबके में डर था इसी का परिणाम था की 1948 और 1952 मे संघ के शारीरिक वर्ग में उस समय के सरसंघचालक माननीय माधवराव सदशिवराव गोलवलकर “ श्री गुरु जी “ के उदबोधन के तुरंत बाद वहां वामपंथियों ने हंगामा किया। केरल से भागों के नारे  लगाए, लेकिन इसके बाद भी संघ कार्य केरल में बढ़ता गया | केरल मे संघ और सीपीएम ( वामपंथीदल ) के बीच लंबे समय का संघर्ष हैं जो आज भी जारी है जिसकी शुरुआत भी बड़ी दिलचस्प हैं जो हम आगे देखते हैं|
• 1969 मे केरल (थिरुसुवर ) के एक कॉलेज “ केरला वर्मा कॉलेज “ के प्रबंध समिति से स्वामी चिन्मयनन्द को अपने यहां एक कार्यक्रम  में वक्ता के नाते से बुलाया जिसका विरोध वहां की सीपीआईएम और उनकी छात्र शाखा केरल छात्र संघ ( Keralastudentfederation ) जो आज का Student Federation of India (SFI) छात्र संगठन हैं ने किया | इसके प्रतियुत्तर में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP)ने चिन्मयानन्द के बुलाने का समर्थन किया अपने यहा संतों का सम्मान करना स्वाभाविक सी परंपरा रही है| सीपीआईएम के गुंडो ने स्वामी जी  पर हमला करने की साजिश रची थी परंतु ABVP के सक्रियता के चलते वह इस जघन्य कृत को अंजाम नहीं दे पाये और स्वामी जी को ABVP के कार्यकर्ताओं ने सहसम्मान उनकी गाड़ी तक छोड़ दिया। एबीवीपी ने अगले दिन शहर की सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन किया जिसका परिणाम ये हुआ की वामपंथी छात्र संगठनों के गुंडों ने एबीवीपी के कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमला किया |
•1969 में आज के तत्कालीन मुख्यमंत्री पिनरई विजयन और पूर्व पोलितबियूरो सीपीआईएम  सदस्य कोडियार बलकृष्णन ने अब संघ और उसके कार्यकर्ताओं की हत्या कर देने की बात की विजयन ने कहा की ” हमारी जो बात मानता हो वो हमारा हैं जो नहीं मानता वो हमारा शत्रु है और हम उसको नहीं छोड़ते “इस प्रकार के भाषणों ने वामपंथी कार्यकर्ताओं को संबल दिया और जिसका परिणाम हुआ कण्णूर जिले के थलस्सेरी मे संघ के स्वयंसेवक वादिक्कल रामाकृष्णन को बड़ी बेरहमी से मार दिया गया।  इसी प्रकार कोट्टयम जिले के पोंकुन्नम मे  श्रीधर्म नायर और  पलक्कड के रामकृषण्ण की हत्या कर दी गई इसमे नाम आज के केरल के मुख्यमंत्री का हैं। तब से लेकर आज तक य​ह सिलसिला जारी है।
वामपंथी ऐसा नहीं की केवल संघ के कार्यकर्ताओ पर ही हमला करते हैं या उनकी ही हत्या करते हैं बल्कि जो भी उनकी बात नहीं मानता उसको वो अपना शत्रु मानते हुए उसको मार देते हैं | मई 2012 मे टी.पी. चन्द्र्शेखरन जो पूर्व मे सीपीआईएम का कार्यकर्ता था उसको उसके भाई से मरवा दिया उसका कसूर सिर्फ इतना था की वो संघ विचार से जुड़ गया था | मार्च 2016 तहसील प्रचारक अमोल कृषणा पर लोहे की रोड से हमला किया गया काफी चोट आई 1969 से लेकर आज तक संघ के 400 से अधिक कार्यकर्ताओं की हत्या वामपंथी गुंडों ने की है। इसमें एक और बात करना अनिवार्य है जो लोग देश दुनिया घूम कर सामाजिक न्याय और दलित , महिला अधिकारों की बात करते हैं , वही केरल के वामपंथी आतंक के शिकार संघ के 60% से अधिक कार्यकर्ता दलित और वंचित वर्गों से ही आते हैं। विश्व हिन्दू परिषद के महामंत्री सुरेन्द्र जैन के अनुसार “ पिछले 50 वर्षों मे 400 से अधिक बीजेपी , आरएसएस , एबीवीपी  के कार्यकर्ताओं की हत्या सीपीआईएम ने की है उनमें आधे से अधिक लोग दलित वर्गों से ही संबंधित हैं “ हाल ही में जुलाई 2017 मे राजेश संघ के बस्ती कार्यवाह की हत्या वामपंथी गुंडों द्वारा की गई , ये राजेश दलित समाज से ही था और उनका अपने समाज में अच्छा प्रभाव था ये दलितों, पिछड़ों , वंचितों  मे शिक्षा के विस्तार के लिए अधिकाधिक कार्य कर रहे थे | जिस कारण से समाज के सामंती सोच के लोगो ने जिसमे वामपंथी यथास्थितिवादी लोग भी शामिल थे राजेश के ही मित्रों को मिला कर खुले आम उनको इतना मारा की उनके शरीर पर 124 कट आए उनका पूरा शरीर तलवारों से काट दिया गया इतनी बुरी तरह उनको मारा गया की उनकी पत्नी उनके चेहरे को चूम तक नहीं पाई ( जो केरला की एक प्रथा है )। हर कुछ दिनों बाद केरल में इस प्रकार की घटनाएं सुनने को मिल जाती हैं। केरल में हो रही इस हिंसा को रोकना बहुत जरूरी है। वहां लोगों की मानें तो केरल के हालात कश्मीर से कहीं बदतर होते जा रहे हैं। कहीं ऐसा न हो लगातार हो रही ऐसी घटनाओं के चलते जिस तरह कश्मीरी पंडितों को वहां से विस्था​पित होना पड़ गया था उसी तरह केरल को भी विस्थापन का दंश झेलना न पड़ जाए।

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