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खूंटी बलात्कार- चर्च और बलात्कारी समान रूप से दोषी,सिटिजंस फॉर जस्टिस

 

नई दिल्ली- (11 अगस्त). गत 11 जून को झारखण्ड के खूंटी जिले के कोचंग गाँव में 5 महिलाओं से हुए सामूहिक बलात्कार में चर्च तथा बलात्कारी समान रूप से दोषी हैं, इनमे से 4 महिलाऐं जनजाति वर्ग की थी. इन दोषियों को कानून के अनुसार कड़े से कडा दंड दिया जाए. यह बात आज यहाँ प्रेस क्लब में आयोजित एक पत्रकार वार्ता में सिटीजंस फॉर जस्टिस द्वारा गठित जाँच-दल के अशोक साहू ने कही. इस दल में पूर्व आई.पी.एस. साहू के अलावा भुवनेश्वर के सेवानिवृत जिला व सत्र न्यायाधीश शिब प्रसाद राजू, कोलकाता उच्च न्यायालय की अधिवक्ता कु. देबजानी घोषाल, और दिल्ली की श्रीमती सुमन चौहान व श्रीमती अंकिता चौधरी राठी, अधिवक्ता (क्रमशः उच्च न्यायालय तथा सर्वोच्च न्यायालय) सम्मिलित थे. राजू के अतिरिक्त सभी सदस्य पत्रकार वार्ता में उपस्थित थे.

जाँच दल ने गत 26-27 जून व 20 से 22 जुलाई तक इस क्षेत्र में जाकर पीड़ित महिलाओं, आरोपियों एवं प्रत्यक्ष दर्शी गवाहों से बात कर यह निष्कर्ष निकाला है. 40 पन्नों की रिपोर्ट में जाँच-दल ने कहा है कि दिन दहाड़े  इन महिलाओं के  अपहरण व सामूहिक बलात्कार की यह जघन्य घटना न केवल  मानवाधिकारों का उल्लंघन है बल्कि देश में लागू कानूनी प्रावधानों के अधीन एक दंडनीय अपराध है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि पत्थलगढ़ी, चर्च तथा क्षेत्र में सक्रिय उग्रवादियों की मिलीभगत से यह क्षेत्र लम्बे समय से अशांत चल रहा है. लोगों ने बताया कि ये सभी तत्व आपस में मिले हुए हैं और इसकी आड़ में ये क्षेत्र में गांजा व अफीम जैसे नशीले पदार्थों की खेती करते हैं जिसके लाभ में इन सब की भागीदारी है. रिपोर्ट में चेतावनी डी गई है कि देश की सुरक्षा, कानून व्यवस्था व युवा पीढ़ी को भटकाने के इस षडयंत्र को समय रहते विफल नहीं किया गया तो इसके गंभीर परिणाम होंगे.

जाँच दल ने रिपोर्ट में यह भी कहा है कि गाँव के पादरी ने (जो अभी जेल में है) चर्च से जुड़ी ननों को तो बचा लिया पर स्थानीय जनजाति और गरीब महिलाओं को बलात्कार के लिए सौंप दिया जो बहुत ही शर्म की बात है.

अनुसूचित क्षेत्रों में लागू पंचायत कानून, 1996 और संविधान की पांचवी अनुसूची की मनमानी व्याख्या, इन कानूनों और वनाधिकार कानून के आधे-अधूरे क्रियान्वयन के कारण उपजे जन-आक्रोश को ये तत्व भुना रहे हैं. इसके साथ सरकार की ग्रामीण शिक्षण व्यवस्था के दुर्बल होने का लाभ भी चर्च उठाकर इसकी आड़ में धर्मांतरण के कार्य में लगा है. इस क्षेत्र में ग्रामीण संपर्क सड़कों की खस्ता हालत, समुचित चिकित्सा सेवाओं की गैर मौजूदगी और विकास के अभाव में यह क्षेत्र इन सभी समाज-राष्ट्र विरोधी तत्वों का चराह्गार बना हुआ है.

जाँच दल ने केंद्र व राज्य सरकार को सुझाव दिया है कि क्षेत्र की सरकारी शिक्षा व्यवस्था में सुधार कने के साथ धर्म-प्रचार से दूर प्रतिष्ठित स्वयंसेवी संस्थाओं को शिक्षा व चिकित्सा सेवा की किम्मेदारी देनी चाहिए. क्षेत्र में ऐसी संस्थाओं को चल-चिकित्सा के लिए भी प्रोत्साहित किया जाए. इसके साथ ही जनजातियों हेतु बने विशेष कानूनों, विकास कार्यों को ठीक से लागू करने के साथ ही इनके बारे में लोगों को शिक्षित भी किया जाए और हाल में बना धर्म स्वातंत्र्य कानून भी शख्ती से लागू किया जाए.

जाँच-दल ने आज यह रिपोर्ट भारत सरकार के जनजाति कार्य मंत्री जुएल ओराम तथा ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री नरेन्द्रसिंह तोमर को सौंपी. दल इसे आगामी 2/3 दिनों में भारत के गृह मंत्री, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राष्ट्रीय महिला आयोग और राष्ट्रीय जनजाति आयोग को भी देगा. इसी माह यह रिपोर्ट झारखण्ड के मुख्यमंत्री तथा अन्य सम्बंधित निकायों को भी दी जाएगी.

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