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आतंक उत्पन्न कर विचार मनवाना भारतीय परंपरा नहीं : डॉ कृष्ण गोपाल

बोल बिंदास,नई दिल्ली, 15 अप्रैल। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल ने आज कहा कि भगवान का स्थान केरल मार्क्सवादी हिंसा का प्रतीक बन चुका है। केरल में नई सरकार के बहुत छोटे से कार्यकाल में 436 हिंसक घटनाएं अकेले कन्नूर जिले में हुई हैं। कुछ महीने के इतने कम कार्यकाल में 19 कार्यकर्ताओं की हत्याएं हुई हैं, जिसमें 11 कार्यकर्ता हमारे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के थे। चार कार्यकर्ता कांग्रेस से जुड़े थे। 4 कार्यकर्ता थे तो सीपीआई-एम के, लेकिन वो मार्क्सवादी विचार छोड़कर कहीं न कहीं संघ की शाखा, भारतीय मजदूर संघ या भाजपा की ओर आकर्षित थे, इस कारण उनकी भी हत्या कर दी गई। बम बनाना केरल में कुटीर उद्योग बन गया है। पुलिस राज्य सरकार के आदेश पर सबूत इकट्ठे करती और और बाद में उन्हे नष्ट कर देती है। इसलिए वहां मार्क्सवादी विचारधारा से अलग विचार रखने वालों के लिए बहुत संकट पैदा हो गया है।


केरल हमारे देश का ही एक अंग है इसलिए यह सारे देश की समस्या है। वैचारिक भिन्नता से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन इस देश के महान तत्त्व दर्शन, महान परम्पराओं को नष्ट नहीं करने दिया जा सकता। इसके लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने देशव्यापी विरोध प्रदर्शन भी किया था जिसमें साढ़े चार लाख लोग शामिल हुए थे। राज्य के मुख्यमंत्री, जिनके पास गृह विभाग भी है, को अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी का पालन करना चाहिए। एक राजनीतिक नेता से उपर उठकर श्री पिनारी विजयन को एक मुख्यमंत्री की तरहं व्यवहार करना चाहिए। उन्हें राज्य में कानून, न्याय और शांति सुनिश्चित करनी चाहिए। डॉ. कृष्ण ने गोपाल एनडीटीएफ (नेशनल डेमोक्रेटिक टीचर फ्रंट) व योगक्षेम न्यास द्वारा मावलंकर सभागार नई दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में उक्त विचार प्रकट किये।
श्री कृष्ण गोपाल ने कहा कि आर.एस.एस का विरोध किसी कम्युनिस्ट से नहीं है अपितु भारत के लिए प्रतिकूल कम्युनिज्म विचारधारा से है। क्योंकि हमारे देश में शास्त्रार्थ कर अपने विचारों से दूसरों को जीतने की परम्परा रही है। किसी की हत्या से आतंक उत्पन्न कर अपने विचार मनवाना यह भारतीय परंपरा कभी नहीं रही। संघ के कार्यकर्ताओं का स्वभाव सभी जानते हैं। आपात काल में अनेक कार्यकर्ता मारे गए, हजारों को जेल हुई, अनेकों के वंश समाप्त हो गए। तब हमारे बाला साहब देवरस जैसे ही जेल से बाहर आए उन्होंनें एक ही बात कही, जिन्होंने हमको बंद किया, कष्ट दिया वे अपने ही थे, अपने मन के अन्दर से यह बैर-भाव निकाल दो, सबसे मित्रता रखो। हमारा दर्शन ही ऐसा है कि हम लम्बे समय तक अपने ऊपर हुए अत्याचारों को याद ही नहीं रखना चाहते।
प्रज्ञा प्रवाह के संयोजक श्री जे. नंदकुमार ने बताया कि केरल में मार्क्सवादी आतंक से पीड़ित परिवारों यहां लाना तथा उनके परिवार के सदस्यों की निर्मम हत्याओं का प्रस्तुतिकरण उनके तथा हमारे लिए अत्यंत कष्टकारी है, लेकिन केरल के बाहर वहां का सच तथाकथित बुद्धिजीवियों के सामने लाने का अन्य मार्ग न होने के कारण इस तरह के सेमिनार आयोजित करने पड़ रहे हैं। एक अखलाक की हत्या मीडिया में कई-कई दिनों तक चर्चा व बहस का विषय बनी रहती है लेकिन केरल में सत्ताधारी वामपंथियों की वैचारिक असहिष्णुता के कारण हुई सैकड़ों निर्शंश हत्याओं पर मीडिया में चर्चा नहीं होती। श्री नन्द कुमार ने केरल से आये पीड़ित परिवारों का परिचय संगोष्ठी में आये बुद्धिजीवियों से करवाते हुए उनके परिजनों की मार्क्सवादियों द्वारा की गयी हत्यों का उल्लेख किया।

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