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कश्मीर में मीडिया की भूमिका पर गौर करने की जरुरत- दिल्ली पत्रकार संघ

दिल्ली जर्नलिस्टस एसोसिएशन (डीजेए) और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के जरिये कार्यक्रम “जम्मू-कश्मीर और मीडिया : मिथ और वास्तविकता” विषय पर आयोजित संगोष्ठी.
देश में राष्ट्रीय और फिर अंतरराष्ट्रीय मीडिया हिंदुस्तान का जन्नत कहे जाने वाला राज्य जम्मू-कश्मीर के हालात की सही तस्वीर पेश नहीं कर रहा. लगभग एक करोड़ तीस लाख की आबादी और 22 जिला वाला यह राज्य में सिर्फ 15 फीसद हिस्सा कश्मीर है. राज्य में आबादी के लिहाज से घाटी की ख़बरे केवल नेगेटिव बनाकर या दिखाकर पेश किया जाता हैं, वहां की अच्छी खबरें नहीं छपती.
जम्मू कश्मीर ना तो बीजेपी और ना ही कांग्रेस का मसला हैं और  ना ही हिन्दू व मुसलमान का मसला हैं. स्थानीय समस्याओं के लिए हो रहे आंदोलनों को भी अलगाववादी आंदोलन के तौर पर मीडिया पेश कर रहा है. जम्मू-कश्मीर के बारे में मीडिया की भूमिका अक्सर उत्तरदायित्वपूर्ण नहीं रही है. जम्मू-कश्मीर के सिलसिले में मीडिया में अधिकतर उन ही वर्गों और गुटों के बारे में ख़बरें आती हैं जो हिंसा का सहारा लेते हैं, जो नकारात्मक गतिविधियों में लिप्त हैं या जो चौंकाने वाले बयान देते हैं. इस तरह जो चित्र बनता है वो न तो पूरा होता है, न ही सच्चा. जम्मू-कश्मीर में कई तरह के लोग रहते हैं, उत्तर-पश्चिमी पहाड़ों में लद्दाख का बहुत बड़ा क्षेत्र है जहां का प्रमुख धर्म बौद्ध धर्म है. दक्षिण में जम्मू का विशाल क्षेत्र है. घाटी और जम्मू की पहाडि़यों में गुजर और बकरवाल रहते हैं. कश्मीर घाटी में मुस्लिम संप्रदाय के लोग हैं जिसमें शिया और सुन्नी दोनों हैं. ऐसे में, कुछ वर्ग भारत विरोधी गतिविधियों में सक्रिय है और लोग हिंसक राजनीति कर रहे हैं. यानि पूरे राज्य की आबादी के 10 फीसद लोगों की गतिविधियां ही मीडिया की रूचि का विषय है. बाकि सभी वर्गों की आवाज़ अनसुनी कर दी जाती है. ऐसे में, राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में मीडिया की भूमिका पर गौर करने की जरुरत हैं. जिससे देश के अन्य क्षेत्रों के लोगों में अनेक तरह की भ्रांतियां पैदा हो गई हैं जिसे सही मायने में जानना व समझना होगा

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