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एक लेखक की जीत – कमलेश के मिश्र

फ़िल्म मेकिंग ऐसी विधा है जिसमें आपकी क्रीएटिविटी अपने साथ एक जंग को भी जन्म देती है. आपने अपनी, सूझ, समझ,बौधिक सामर्थ के साथ एक कहानी रची, उसे स्क्रीन पर उतारने की शक्ल दी. अब आप एक जंग के मैदान में उतरते हैं. उन सम्भावित लोगों से मिलना जुलना शुरू करते हैं जो आपकी कहानी को तवज्जो दें, पैसा लगा कर उसे फ़िल्म की शक्ल देने का हौसला और फ़ैसला दें. इस क्रम में आप अपने दर्जन भर विश्वस्त लोगों, मित्रों का अपनी कहानी बाँट देते हैं. अब इस बीच आपकी कहानी किसी को भा गई और वह आपको फ़िल्म बनाने के लिए सहयोग दे दे, पैसा लगा दे, या आपसी सहमति से आपकी स्क्रिप्ट का राइट ख़रीद ले तो आप धन्य हो गए. पर ज़रा सोचिए कि आपकी स्क्रिप्ट पर किसी का दिल आ गया और वह आपको बिना बताए आपकी स्क्रिप्ट को अपनी बताने लगे तो फिर क्या गुज़रेगी आप पर. हालाँकि आपकी चीज़ को आपकी कहने के लिए असोसीएशन हैं. जैसे स्क्रिप्ट के लिए है “स्क्रीन राइटर असोसीएशन”. पर आपके लिए एक जंग शुरू हो जाती है, अपनी चीज़ पर ही अपने नाम की मुहर लगवाने के लिए. फ़िल्ममेकर अतुल गंगवार तीन साल इस जंग से गुज़रे हैं. मामला अदालत तक पहुँच गया और अभी अभी सत्य की जीत हुई है, इस मामले में उनके पक्ष में फ़ैसला आया है. फ़िल्म नगरी में ऐसे क़िस्से आम नहीं, पर होते ही रहते हैं.
अब सीधे मामले पर आते है. 2009 में अतुल ने “Yenky Bhai” नाम से फ़िल्म लिखी, WGA में रेजिस्टर्ड भी करा लिया. 2011  में” बेचू भाई'” के नाम से यही कहानी FWA  में रजिस्टर्ड कराई। अपने मित्र गिरीश जुनेजा को सुनाई. गिरीश जुनेजा का दिल आ गया अतुल की “मुआवज़ा” पर. अतुल को कहीं से ख़बर लगी कि गिरीश उनकी स्क्रिप्ट पर फ़िल्म बना रहे हैं. अतुल हैरान कि न उनके साथ कोई अग्रीमेंट साइन हुआ न उनसे कोई कन्सेंट लिया. मामला असोसीएशन में आया, फ़ैसला अतुल के पक्ष में. तय हुआ कि गिरीश के प्रडूसर अतुल को एक तय रक़म और “स्टोरी” का क्रेडिट देंगे. अतुल को वो पैसे तो मिले नहीं, हाल ही में जब फ़िल्म का पोस्टर जारी हुआ तो पता चला कि क्रेडिट भी नहीं. अतुल ने केस ठोक दिया. अदालत ने भी अतुल के पक्ष को स्वीकार किया. फ़ैसला आया है कि कहानी का क्रेडिट अतुल को जाएगा.
अब ज़रा पीछे चलिए. फ़िल्म जब बन रही होगी तो डिरेक्टर गिरीश जुनेजा इस स्क्रिप्ट के लिए कैसे पुरी यूनिट, ऐक्टर्ज़, क्रू आदि से अपने लिए तालियाँ बटोर रहे होंगे. क्या तब उनकी अंतरात्मा अतुल को याद नहीं कर रही होगी. करती होगी. पर वे उस आवाज़ को अपनी मुस्कुराहटों से दबा देते होंगे. चलिए फ़िल्म रिलीज़ हो, अच्छा करे, शुभकामनायें हैं हमारी. पर सवाल है की ऐसे लोग दुबारा उन्ही ऐक्टर्ज़ टीम मेम्बर्ज़ आदि से आँख कैसे मिला पायेंगे. क्रेडिटखोरी भी कलाबाज़ी हैं. भगवान बचायें ऐसे लोगों से. जंग का यह आख़िरी मामला नहीं. आज अतुल कल कोई और लड़ेगा. पर मेरी अपील है लड़े तो अतुल की तरह. अपनी चीज़ पर कोई दूसरा अपने नाम की मुहर लगा कर चैन से कैसे बैठे भाई!!

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