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मैत्रेयी पुष्पा ने उड़ाया छठ व्रतियों का उपहास तो कमलेश मिश्रा ने दिया करारा जवाब

चार दिनों तक चलने वाला छठ व्रत दुनिया के सबसे कठिन व्रतों में से एक है. स्त्रियां अपने सुहाग और बेटे की रक्षा करने के लिए भगवान सूर्य के लिए 36 घंटों का निर्जला व्रत रखती हैं. वहीं, भगवान सूर्य धन, धान्य, समृद्धि आदि प्रदान करते हैं.
छठ पूजा में सुहाग की रक्षा के लिए स्त्रियां बड़ी निष्ठा और तपस्या से व्रत रखती हैं. सिंदूर और सुहाग का रिश्ते के बारे में हम सभी को पता है.पर शायद ये बात मशूहर लेखिका मैत्रेयी पुष्पा को नहीं पता, हल ही मे उन्होंने फेसबुक के जरिये एक आपत्ति जनक पोस्ट किया है की “छठ के त्योहार में बिहार वासिनी स्त्रियां मांग माथे के अलावा नाक पर भी सिंदूर क्यों पोत रचा लेती हैं? कोई खास वजह होती है क्या?”

इस पर फिल्ममेकर कमलेश के मिश्रा  ने शानदार जवाब दिया ” मैत्रेयी जी. आप नारी विमर्श की अगुवा हैं, ज्ञानी हैं, क़लमकार हैं. आप सवाल न कर इसका जवाब ढूँढती और अपने फकेबूकी पाठकों को बताती तो ज़्यादा मुनासीब होता. पर हम समझ रहे हैं आपका मक़सद इस सवाल के ज़रिए अपने नारीमुक्ति आवाज़ को सामने लाना है. लायिए पर भगवान के लिए छठ जैसे पर्व को अपने आंदोलन से मुक्त रखिए. वैसे आपने “पोतना” शब्द इस्तेमाल कर साफ़ कर दिया है कि आप “व्रतियों” का भरपूर माखौल उड़ा रहीं हैं. बहुतों ने आपको मानवीय संवेदनावों वाली लेखिका समझा है, मैं भी आपको पहले ऐसा ही समझता था. पर आपका मक़सद था व्रतियों का माखौल उड़ाना उन्हें दकियानूस बताना. पर जान लीजिए कि आपने इस सवाल के माध्यम से अपनी ही बौधिकता का माखौल उड़ाया है. वैसे तो छठ को समझना आपकी समझ से परे है. पर लग रहा है एक कोशिश कर लूँ कि आप छठ को जान सकें. मैं पौराणिक कथा नहीं कहूँगा. बता दूँ की छठ पर्व आस्था का पर्व तो है ही पर इसका गहरा सम्बंध पर्यावरण से जुड़ा है. हमारे ढेर सारे पर्व त्योहारों के विधि विधान हमारे पुरुख़ों ने कुछ इस तरह बनाये हैं कि व्रत पूजा के बहाने पर्यावरण की रक्षा भी हो सके. अब छठ पूजन के संदर्भ में सुनिए: बारिश का मौसम ख़त्म हो हो गया है. गाँव के पोखर तालाब के आसपास घास पात उग आया है, जंगल झाड़ में तमाम कीड़े मकौड़े घर बना चुके हैं, तालाब का पानी भी साफ़ रखना ज़रूरी है. सो अब ज़रूरत है उसकी साफ़ सफ़ाई की. जाकर देखिए इस छठ के बहाने ही सारे तालाब पोखर नदी के घाट, उधर जाने वाले सारे रास्ते एकदम साफ़ सुथरे हो गए हैं. और सुनिए, छठ में महत्व है पानी का. संदेश हैं कि तालाब पोखर नदियों का पानी बचा कर रखा जाए. आज जल बचाने के लिए नारे गढ़े जा रहे हैं, हम छठ पूजन के ज़रिए अपने पोखरों को देवता पितर की तरह दो दिन पूजेंगे. साल भर उसमें जल और वह जल पवित्र रखने की कोशिश करेंगे, क्योंकि अगले बरस फिर वहीं पर पूजा करनी है, जीवन के लिए खेतीबाड़ी के लिए भी जल ज़रूरी है. “जल संरक्षण” के इससे बढ़िया उपक्रम की और कोई मिसाल देखीं हों तो बताइएगा. और सुनिए, सामाजिक समरसता का इससे बढ़िया उदाहरण भी आप नहीं ढूँढ पाएँगी. इस संदर्भ में सबसे पहले तो ये देखिए की यहाँ कोई होड़ नहीं होती कि मेरी “छठ माई” तुम्हारी छठ माई से बड़ी हैं. क्योंकि इनकी कोई आडंबर पूर्ण प्रतिमा हम बनाते ही नहीं. घाट किनारे माटी, ईंट, पत्थर जोड़कर उसे रंग देते हैं, उसमें अपनी आस्था से जान भर देते हैं, हो गईं छठ माई की मूरत. अब देखिए उसके चारों ओर बैठ कर कौन कौन पूजा कर रहा है हम न पूछते हैं न किसी को मना करते. बाभन, राजपूत अहिर दूसाध, धोबी नोनिया जो जहाँ मन करे बैठ जाए. न कोई भेदभाव न छुआछूत का भाव. प्रसाद में तो सुनी ही होंगी कि सब कुछ बड़ी पवित्रता के साथ पकाया बनाया जाता है, और कोई भी किसी का दिया प्रसाद खा लेता है, कोई भी किसी से प्रसाद माँग लेता हैं. व्रती सिर्फ़ व्रती होती है, किस जाति की है किसी को इस बात से कोई मतलब नहीं. हम इस पर्व में दिखावटी गिफ़्ट के लेनदेन के आडंबर से बचे हैं और यक़ीन कीजिए सदा बचे रहेंगे.

और सुनिए हम छठ वाले पहले डूबते सूर्य को पूजते हैं, क्योंकि हमें पता है कि ये सूर्य हैं, उनका उदय जीवन के लिए ज़रूरी हैं, इन्हें गुहराना ज़रूरी है कि “हे सूर्य आप सहाय होइए, कल पुनः उगिए, आपके उदय से ही ये सृष्टि है, जीवन है. मैत्रेयी जी मत उड़ाइए हमारी माँ बहनो का माखौल, जो तीन दिन के व्रत में भी रातभर लगभग जगकर पानी पोखर में घंटों खड़ी होकर सूर्य से उनके उदय की प्रार्थना कर रह रही हैं.

आप कहेंगी कि औरतें ही व्रत क्यों करें, तो जान लिजिए व्रत यातना नहीं होती, ये उनकी पसंद हैं, परम्परा है, रीति है. परम्परा और रीति पर जानता हूँ आप कुछ नहीं टोकेंगी, अन्यथा आपको बहुतों को टोकना पड़ेगा और वो आप करने की हिम्मत नहीं रखतीं. बहुतों के पर्सनल लॉ आपकी ज़बान सी देंगे.
रही बात व्रत की तो आपके घर में तो डॉक्टर हैं, पूछ सकती हैं कि व्रत करने से शरीर को कई नुक़सान नहीं होता.

अब रही बात व्रतियों के नाक से माँग तक सिंदूर लगाने की , चलिए जैसा आप सोच रही हैं, मान लेते हैं कि ये उनकी दकियानूसी है, यह स्त्री के लिए एक बंधनप्रतीक है, तो बताइए ना कहाँ तक आज़ाद देखना चाहेंगी आप औरत को. मैत्रेयी जी कुछ चीज़ों का जवाब न ही माँगा जाए तो बेहतर हैं. आप जिस नारी विमर्श के संदर्भ में औरत की मुक्ति का सवाल उठा रही हैं, उसके संदर्भ में अब कोई ये आपसे पूछे कि “शादी बंधन है, यह भी कहेंगी क्या? आज़ाद ख़याल नारी होकर आप शादी के पवित्र ही सही ” बंधन” में क्यों बंध गईं? औरत की आज़ादी के संदर्भ में क्या गर्भधारण से मुक्ति का भी विमर्श होना चाहिए क्या? तमाम अंतहीन उलजुलूल सवाल खड़े हो जाएँगे आपके समक्ष और आप जवाब न दे पाएँगी.

मैं जानता हूँ सिंदूर के ज़रिए आपने स्त्री विमर्श का सवाल उठाया है, तो बता दूँ कि छठ के संदर्भ में हमारी घर की माताओं बहनों की आज़ादी का अंदाज़ा आप इस बात से लगा लीजिए कि आस्था के पोखर बिहार की सीमा से बहुत दूर दिल्ली मुंबई ही नहीं लंदन वाशिंगटन तक खुद चुके हैं. वहाँ भी गाया
जा रहा है, “सूरज होखिं ना सहाय”.
छठी माई, आपका कल्याण करें.

 

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