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कब तक भागोगे…?

अतुल गंगवार

चाइनीज़ कोरोना वायरस को देखा तो नहीं। ऊपर वाले की दया से फिलहाल अपने इष्ट मित्रों, परिजनों में से कोई इससे पीड़ित भी नहीं। शरीर को इसके कारण क्या कष्ट होता है इसका अहसास नहीं है मुझे, लेकिन इसके कारण अपना घर-द्वार छोड़कर भागते लोगों के चित्रों ने मन को बहुत कष्ट पहुंचाया है। देश के विभाजन के समय के दृश्यों की याद ताजा हो गई। कोई सर पर गठरी लादे, कोई अपने बच्चों को कंधे पर बिठाये, बैलगाड़ी, पैदल, सूनी आंखें जिनके आंसू भी सूख गए थे लिए ऐसे लोग जो अपना सब कुछ छोड़ कर किसी मंजिल की तलाश में चले जा रहे थे। पीछे शायद मौत थी जिसका खौफ आंखों में था। आगे क्या होगा किसी को पता नहीं बस चले जा रहे थे।

कोरोना के कारण अपना घर द्वार छोड़ कर जाते लोगों के ताजा दृश्य विभाजन के दृश्यों से कम त्रासद नहीं हैं। आज आज़ादी के 73 वर्ष बाद भी अगर कोई अपनी ज़मीन को छोड़ कर पलायन करने के लिए मजबूर है तो कैसे शासक हमने इस देश में चुने हैं जो दो वक्त की रोटी की गारंटी भी नहीं दे सकते हैं। आखिर क्या वजह है कि बेहतर भविष्य का सपना लिए गांव से शहर में आने वाले लोग, जिन्होंने अपने पेट के लिए अपने घर से नाता तोड़ लिया अपने लिए कुछ भी बेहतर नहीं कर पाये। सिर्फ 21 दिन की लड़ाई की शुरूआत में ही उन्होंने हार मान ली। रेल नहीं मिली, बस नहीं मिली, गाड़ी-घोड़ा कुछ नहीं मिला तो भी शहर छोड़ कर निकल लिए। सर पर बक्सा, गोद में बच्चा, मां-पिता की उंगली पकड़े चलता मासूम बचपन। मंज़िल वही पारिवारिक घर जिसे बरसों पहले छोड़ कर चले आये थे। अपने घर पर उन्हें विश्वास है लेकिन जो घर उन्होंने यहां बनाया था उस पर उन्हें विश्वास नहीं है। जिस सरकार को उन्होंने अपने वोट से चुना था उस पर भी उन्हें भरोसा नहीं था। उनका अड़ोस-पड़ोस… क्या कोई उन्हें रोकने वाला नहीं था?  पलायन हमारे समाज पर एक कालिख की तरह है। हमारी सरकार के मुंह पर एक तमाचा है।

इसके जिम्मेदार हम हैं। हम जो आज मानवीय संवेदनाओं से परे एक आभासी दुनिया में जी रहे हैं। सोशल मीडिया के तमाम मंचों ने हमें संवेदना हीन बना दिया है। हम अपने परिवार से कट गए हैं, अपने अड़ोस पड़ोस से कट गए हैं। फेसबुक,टिवटर, इंस्टा पर पोस्ट डाल कर हम अपने कर्तव्य को पूरा करते हैं। पोस्ट डालने के बाद घंटों बैठे लाइक्स कमेंट्स का इंतज़ार करना हमारी नियति बन गयी है। हम जैसे संवेदनहीन लोगों से कोई क्या उम्मीद कर सकता है। हम पर कोई विश्वास कैसे कर सकता है जब हमें खुद पर ही विश्वास नहीं है। इसी अविश्वास के कारण हुआ है ये पलायन।

सोशल मीडिया पर कई राय बहादुरों के लिए सरकार को कठघरे में खड़ा करना बड़ा आसान था। कोरोना आपदा उनके लिए शायद एक खेल से ज़्यादा नहीं थी। मीडिया के धुरंधरों का भी कुछ यही हाल था। टीपी के बिना एक लाइन ना बोल पाने वाले एंकर इस चीनी वायरस का विश्लेषण कुछ यूं कर रहे थे जैसे वही डॉक्टर हों, वहीं मरीज़, वहीं नेता हों, वही सरकार, वही जज। टीवी के तमाम विश्लेषण उठा कर देख लीजिए ऐसा लग रहा था कि सरकार… देश का प्रधानमंत्री, पूरा केन्द्रीय मंत्री मंडल, राज्य सरकारें सब बेवकूफ चला रहें हैं। सारा ज्ञान तो सोशल मीडिया के राय बहादुरों एवं मीडिया के मुखोटों के पास है। हां स्क्रीन पर चिल्ला चिल्ला कर ख़बर बेचने वाले मुखोटें ही तो हैं… स्क्रिप्ट कोई लिखता है, पैनल पर बैठा प्रोडयूसर अगर दो मिनट कान में मंतर फूंकना भूल जाये तो… इनका बस उपर वाला ही मालिक है। साथ में बैठे तथाकथित विशेषज्ञ जो तमाम विषयों पर अपनी राय देने में शान समझते हैं। जो सरकार से हिसाब मांगना अपना अधिकार समझते हैं, लेकिन उनकी जिम्मेदारी क्या है ये तय नहीं करते। मीडिया की समाज के प्रति ये संवेदनहीनता हम CAA,NRC,NRB के मामले में देख चुके हैं। दुर्भाग्य हैं कि देश का विपक्ष भी भीड़ के पीछे चल रहा है। कानून क्या है जानते बूझते उसने महज वोटों के लिए इस मसले को हवा दी। लोगों को इसके प्रति जागरूक करने या यूं कहें उन्हे उसके प्रति शिक्षित करने की बजाय सारे मामले को सनसनी बनाते रहे और जिसकी परिणति दो समाज में परस्पर अविश्वास की भावना बढ़ी और इसका अंत दिल्ली दंगों पर हुआ।

आज भी यही हो रहा है। कोरोना पर लोगों के डर को कम करने की बजाय उनके डर को बढ़ाया जा रहा है। न्यूज़ चैनल इसमें अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं, समाचार पत्रों का योगदान इसमें कुछ कम नहीं है। सबसे बड़े कलाकार हैं सोशल मीडिया चैम्पियन्स जो अपने घरों में बैठे अपने हाथ सेंक रहें हैं। रही सही कसर हमारा विपक्ष पूरा कर रहा है। विपक्ष से मेरा मतलब जो जहां जिस भूमिका में है वहां वो सरकार का पलीता लगा रहा है।

सरकार ये करे, सरकार वो करे, सरकार इसका ध्यान रखे, सरकार उसको ना देखे, सरकार ने ये जल्दी करना था, सरकार ने देर कर दी, सरकार को चीन के साथ ये करना चाहिए ये सब सवाल खड़े किए, लेकिन सरकार ने क्या किया ये बताने की कोई कोशिश नहीं की।

कोरोना के कारण देश 21 दिन के लिए बंद है। आप और हम घरों में बैठें है, लेकिन हजारों लोग अपने घरों को छोड़कर सड़क पर अपने घरों के लिए निकल पड़े हैं। उन्हें किसी ने नहीं रोका… उस पड़ोसी ने भी नहीं जिन्होंने कई बार एक दूसरे से चीनी-दूध-चाय पत्ती उधार ली होगी। उस फैक्ट्री-दुकान, कंस्ट्रक्शन साइट के टेकेदार ने भी नहीं जिनके धंधे को इन्होंने अपने खून पसीने से सींचा होगा। वो नेता जो उनकी वोटों की तिजारत करके आज मोटे हो गए हैं उन्हें भी आज इनकी ज़रूरत नहीं है। हो भी क्यों-फिलहाल यहां चुनाव जो नहीं हैं।

अगर समाज के ये सारे ठेकेदार इस भागते आदमी को बताते, समझाते कि तुम यहीं रुको… सरकार तुम्हारे लिए काम कर रही है। समाज आगे बढ़कर कहता कि यहीं रहो किसी भी बात की चिंता मत करो ये 21 दिन कट जायेंगे हम हैं ना। सरकार की ये योजना है जिसमें तुम्हारे खाने की व्यवस्था हो रही है। इस योजना में तुम्हें पैसे मिलेंगे जिससे तुम ये मुश्किल वक्त काट लोगे। क्या हुआ अगर एक महीना तुम किराया नहीं दे पाये। बाद में हिसाब हो जायेगा। सरकार ने यहां इलाज की बेहतर व्यवस्था की है, अगर दुर्भाग्य से तुम बीमार हो गए तो अच्छा इलाज हो जायेगा।

देश 21 दिनों के लिए इसलिए बंद किया गया था कि लोग घरों में रहें और इस लड़ाई में सरकार का साथ दें। लेकिन जिस मजाहिया ढंग से कुछ लोगों ने इस देश बंदी को लिया उससे जो लोग अपने घरों में बैठे थे उनका जीवन भी संकट में आ सकता है। अगर इन लोगों को ये समझाया जाता ये समय कि ये वक्त अपने घर में बैठने का है बाहर निकलने का नहीं। बाहर निकल कर अपना ओर दूसरों का जीवन खतरे में मत डालो। लेकिन ये समझाना तो दूर लोग इनके बाहर निकलने पर सरकार को ही कोसने लग गए। सरकार इन्हें इनके घर पहुंचाने का इंतजाम करें, खाने का इंतजाम करें, इन्हें सुविधा उपलब्ध कराये। दिल्ली का मुख्यमंत्री संवेदनहीन हैं उसने इनके लिए कुछ नहीं किया, यूपी वाला क्या कर रहा है, केन्द्र सरकार सोती रही है। सरकार भी हरकत में आयी है। अब वो सारी व्यवस्था कर रही है। जो मामला दिल्ली में निपट सकता था अब वो पूरे देश में जहां जहां वो जायेंगे फैलेगा। कोई नहीं रोक सकता। सरकारें एक बार फिर भीड़ के पीछे खड़ी हो गयीं। वो लोग जो 21 दिन तक घर में रह कर इस अभियान को सफल बनाने में जुटे हैं उनकी मेहनत पर पानी फिरता नज़र आ रहा है। देश में काम धंधे बंद करके नुकसान उठाने वालो को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा।

दोस्त घर से भागकर यहां आये… मेहनत की अपनी छोटी सी दुनिया बनाई। इसे छोड़कर फिर भाग रहे हो। क्यों? कभी ना कभी तो ठहरो। सामना करो। कोई भी संकट स्थायी नहीं होता। भागने की गलती मत करो। आखिर कब तक भागोगे…?

भारतीय सिनेमा के शोमेन सुभाष घई की पलायन करती जनता से अपील

Posted by Bol Bindaass on Saturday, 28 March 2020
सुभाष घई पलायन करने वाले लोगों से अपील करते हुए

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