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रेणुका सौंधी गुलाटी की चित्र और मूर्तिशिल्पों की प्रदर्शनी में बोल रहा है स्त्री का जीवन?

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रवि पाराशर

देश की राजधानी दिल्ली के त्रिवेणी कला संगम में मशहूर चित्रकार रेणुका सौंधी गुलाटी की पेंटिंग और मूर्तिशिल्पों की प्रदर्शनी चल रही है। रेणुका अपने अस्तित्व की तलाश के लिए कैनवास पर पेंटिंग उकेरती हैं और अपने अस्तित्व को रेखांकित करने के लिए, उसकी पड़ताल के लिए मूर्तिशिल्प गढ़ती हैं। उनका काम स्त्री के जन्म से लेकर मृत्यु तक की जिजीविषा भरी यात्रा को सजीव करता है। जीवन के सभी पहलुओं और आयामों को रंगों के साथ ही स्पष्ट और गड्डमड्ड, लेकिन यथार्थपरक बिंबों के माध्यम से व्यक्त करने में वे माहिर हैं।

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कैनवास पर भावनाओं, विचारों को उभारने की द्विआयामी कला हो या फिर मूर्तिशिल्पों की भंगिमाओं में जान डालने की त्रिआयामी कला, रेणुका के अंदर मौजूद संवेदनशील चितेरा दोनों माध्यमों में पूरी दक्षता के साथ व्यक्त होता है। उनके बिंब अविधा के बिंब नहीं, एब्सट्रेक्ट बिंब नहीं, बल्कि ठोस आकारों में गढ़े हुए होते हैं, जिन्हें समझने, मसहूस करने के लिए माथे पर लकीरें उभारने की ज़रूरत नहीं पड़ती। उनकी अभिव्यक्ति की शैली जटिल और गूढ़ भावभूमि वाली दार्शनिकता के धरातल पर नहीं खड़ी है, बल्कि सहजता की वास्तविक आकृतियों के कंधे पर दोस्ताना गुनगुने स्पर्श के साथ हाथ रख कर जीवन की यथार्थपरक धरती पर आराम से खड़ी है।

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रेणुका के अंदर के सजग चित्रकार और मूर्ति शिल्पकार पर लिखते हुए ख़ुमार बाराबंकवी के नाम से मशहूर हुए हरदिल अज़ीज़ शायर मोहम्मद हैदर ख़ान का 1955 में बारादरी फ़िल्म के लिए लिखा गया गीत याद आ रहा है –तस्वीर बनाता हूं, तस्वीर नहीं बनती…। असल में इस गीत का मुखड़ा फ़िल्म के किरदार की भग्न मन:स्थिति को बयां कर रहा है। इसके उलट रेणुका का चित्रकार जब तस्वीर बनाना चाहता है, तब तस्वीर बनती भी है और देखने वाले से स्पष्ट और सटीक संवाद भी करना जानती है। यह संवाद कहीं से भी तोतला नहीं, बल्कि पूरी तरह मुखर और प्रांजल उच्चारण वाला है। उनकी कला फुसफुसाती नहीं है, अपने विचार, अपनी बात बेलाग अंदाज़ में बयां करती है।

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रेणुका की कलाकृतियों के साथ ही –मिंडरिंग जर्नी- में नासा के फ़ोटोग्राफ़र कौशिक अमृतर की पेंटिंग भी प्रदर्शित की गई हैं। वे श्वेत-श्याम माध्यम से रंगबिरंगे जीवन की अपनी अनुभूतियों को व्यक्त करते हैं और उनका हर चित्र हमारा परिचय, हमारी दोस्ती जीवन के दुर्धर्ष संघर्षों से कराता है। कौशिक की तस्वीरें पौराणिक किंवदंतियों और दक्षिण-पश्चिमी अमेरिका और अलास्का में उभरती स्वदेशी संस्कृतियों की आध्यात्मिकता को उजागर करने वाली छवियों में शामिल हैं। बारह देशों के होती हुई कौशिक की भारत में ये पहली प्रदर्शनी है।

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रेणुका नौवीं कला बिएननेल, माल्टा, 2011 में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सर्वश्रेष्ठ मूर्तिकला पुरस्कार प्राप्त कर चुकी हैं। उन्हें कई बार ललित कला राष्ट्रीय और एआईएफएसीएस राष्ट्रीय प्रदर्शनियों के लिए चुना गया है। रेणुका का काम भारत और विदेश, दोनों जगहों की प्रसिद्ध आर्ट गैलरियों में सराहा जा चुका है। उनके चित्र कई मशहूर अंतर्राष्ट्रीय गैलरियों में संग्रहीत किए गए हैं। देश में शूरवीर कोहली गैलरी, चंडीगढ़ हवाई अड्डे, उत्तरी क्षेत्र सांस्कृतिक क्षेत्र, चंडीगढ़, साहित्य कला अकादमी, दिल्ली और ललित कला अकादमी के साथ ही राष्ट्रपति भवन के निजी कला संग्रह में भी रेणुका का काम शामिल है।

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इस टिप्पणी में के अंत मैं ये सिफ़ारिश ज़रूर करूंगा कि अगर आप दिल्ली-एनसीआर में रह रहे हैं, कला प्रेमी हैं, तो थोड़ी फ़ुर्सत निकालिए और त्रिवेणी कला संगम में चल रही -मिंडरिंग जर्नीज़- शीर्षक से रेणुका और कौशिक अमृतर की प्रदर्शनी का एक चक्कर अवश्य लगाकर हौसलों से लबरेज़ हो आइए। हो सकता है कि आपका वजूद वहां आपका शिद्दत से इंतज़ार कर रहा हो। प्रदर्शनी 23 दिसंबर तक रोज़ 11 बजे से रात 08 बजे तक चलेगी।

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मिंडरिंग जर्नी का अर्थ है घुमावदार सफ़र। वास्तव में ज़िंदगी का सफ़र एकदम लंबवत या सरल रेखा में ऊर्ध्वगामी नहीं हो सकता। सकारात्मक, सच्चरित्र, सशक्त, साहसी, सहनशील, संवेदनशील, सहृदय, समुन्नत, सचेत, सजग, सहज, सरल, सारगर्भित, सार्थक और नश्वर होते हुए भी शास्वत जीवन की यात्रा ऊर्ध्वमुखी होती अवश्य है, लेकिन सीधी रेखा में नहीं। जीवन का ये सफ़र बहुत सी परिस्थितियों और एहसासों के टेढ़े-मेढ़े, हरेभरे, जंगली, रेतीले, सपाट, भीड़भाड़ वाले और महा-एकांत से गूंजते हुए सन्नाटों के घुमावदार रास्तों से होकर गुज़रता है। जीवन संघर्ष की आपाधापी में हम इस रास्ते से गुज़रते तो हैं, लेकिन इसे महसूस नहीं कर पाते। ऐसे में रेणुका के चित्रों और मूर्तिशिल्पों, कौशिक के श्वेत-श्याम चित्रों की प्रदर्शनी –मिंडरिंग जर्नीज़- उस रास्ते को बहुत क़रीब से एक झटके में महसूस करने का मौक़ा है। इसे गंवाइए मत।

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