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आज का भारत और हम और हमारी बदलती सोच- डॉ.मोहम्मद अलीम

डा. मोहम्मद अलीम
डॉक्टर मोहम्मद अलीम
अभी दो तीन दिन पहले ही बात है। फेसबुक पर एक पोस्ट पढ़ने का मौका मिला जिसे मेरे एक करीबी
लेखक और पत्रकार दोस्त ने शेयर किया था। इसलिए उसे थोड़ा तवज्जह से पढ़ा। उसमें झारखंड में अभी
हाल के दिनों में हुई एक मौब लिंचिंग की घटना का ज़िक्र था। जिस युवक का कत्ल हुआ था उसका नाम
तबरेज अंसारी था। अब तक की रिपोर्टों में उसे एक चोर बताया जा रहा था जो एक बाइक चुराने अपने कुछ
आवारा दोस्तों के साथ एक हिन्दू इलाक़े में गया था और दुर्भाग्य से कुछ लोगों के हत्थे चढ़ गया और बेमौत
मारा गया। उससे उसके धर्म को लेकर भी नाज़ेबा बातें कही गईं और नारे लगवाए गए। यह भी कहा गया कि
वह दिल का दौरा पड़ने की वजह से मरा ना कि पिटाई खाने से जबकि पूरी दुनिया ने देखा कि उसे घंटों मारा
पीटा गया यहां तक कि वह अधमरा हो गया।
उसके पिता को लेकर यह खबर फैलाई गई कि वह भी बेटा की तरह ही चोर था और दस सालों पहले इसी
तरह की एक घटना में मारा गया था।
दोनों खबरों की सच्चाई को परखना दिल्ली में बैठकर आसान नहीं था। इसलिए एक बार लगा कि शायद
दोनों खबरें सच होंगी और बेटे का अंजाम भी वैसा ही हुआ जैसे उसके बाप का हुआ था।
मगर आज जब इंकलाब उर्दू का अखबार पढ़ा तो मनीष चन्द्र मिश्रा का एक लेख इसी विषय पर पढ़ने को
मिला जो मशहूर वेब पोर्टल, फ़र्स्ट पोस्ट में छपा है। लेखक ने जो तथ्य प्रस्तुत किए वह बेहद चौंकाने वाले हैं
और सारी घटना पर नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर करता है।
मनीष चन्द्र मिश्रा के लेख के मुताबिक़ तबरेज के पिता की मौत किसी चोरी की घटना में नहीं जैसा कि दावा
किया जा रहा था और इस झूठ को फैलाया जा रहा था, बल्कि उसकी मौत रहस्मयी तरीक़े से किसी और
कारण से हुई थी। हुआ यूं था कि एक बार वह अपने चार हिन्दू दोस्तों के साथ पास के एक जंगल में किसी
काम के बहाने गया था और फिर वह जिंदा अपने घर वापस नहीं लौटा। पुलिस ने उसकी गुमशुदगी की
रिपोर्ट लिखी और तलाश शुरू कर दी। फिर उसकी लाश मिली। उसके कुछ दिनों बाद ही उसके उन चार
हिन्दू दोस्तों की लाश भी उसी जंगल से रहस्मयी हालत में मिली। किसी को कुछ पता नहीं चला कि इन
लोगों को किसने और क्यों मारा।
अब आज की एक घटना की ओर आपका ध्यान खींचना चाहता हूं जो हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित हुई है।
कालिंदी कुंज, दिल्ली के पास मुसलमानों और हिन्दुओं की एक बस्ती है जैतपुर। वहां ज्यादातर गरीब और
निम्न मध्यमवर्गीय लोग रहते हैं। एक मुस्लिम युवक की भीड़ के हाथों लिंचिग की कोशिश की गई मगर
ख़ुशकिस्मती से वह बच गया। पूरी घटना ऐसे घटित हुई। वह मुस्लिम युवक अपने एक दोस्त के साथ जो कि
एक दुकान पर काम करता था, रात के साढ़े ग्यारह बजे के करीब अपने घर लौट रहा था। उसके साथ उसका
एक दूसरा साथी भी था। दोनों की जेब में कुछ रूपए और मोबाइल फोन थे। उनका सामना चंद लुटेरों से हो
गया। उन लोगों ने उन्हें मारना पीटना शुरू कर दिया। एक किसी तरह उनके चंगुल से निकल भागा मगर
दूसरा उतना खुशकिस्मत नहीं था। जब उन लोगों को यह पता चल गया कि वह मुसलमान है तो उनके ज़ुल्म
की इंतेहा और बढ़ गई। जब कुछ लोग आस पास में जमा हो गए तो उन लुटेरों ने उल्टे उसी युवक के बारे में
यह कहना शुरू कर दिया कि यह एक चोर है जिसे उन्होंने पकड़ा है। अब भीड़ चोर को सजा देने के अपने
सामाजिक दायित्व के लिए आमादा हो गई मानों देश का क़ानून उन्हीं लोगों के हाथ में हो।
इस बीच अपनी जान बचा कर भागा हुआ युवक पास की एक पुलिस चौकी पर पहुंचा मगर उसे यह कह कर
वहां से भगा दिया गया कि यह उनके इलाक़े में नहीं आता।
बहरहाल वह लड़का अपने घर पहुंचा और घर वालों से सारा माजरा बयान किया और पुलिस की मदद से उसे
फिर किसी तरह छुड़ा कर अस्पताल पहंचाया गया।
यह सारी बातें एक बात की ओर इशारा करती हैं कि किस प्रकार आज धर्म के नाम पर अत्याचारों का
सिलसिला बढ़ गया है और पुलिस भी धार्मिक चश्मे से चीजों को देखने लगी है। जो लोग चोर हैं वही दूसरों
को चोर साबित करने में लगे हुए हैं। झूठ और फरेब के मकड़ जाल में आम जनता को गुमराह किया जा रहा
है।
दुख इस बात का है कि बहुसंख्यक समाज के पढ़े लिखे लोग भी इस प्रकार के झूठ को सच मानने लगे हैं।
एकाएक ऐसा लग रहा है कि अब तक पिछले सत्तर सालों से यहां का हिन्दू दबा कुचला था। अब उन्हें
आज़ादी की फिज़ा में सांस लेने का मौका मिला है। और फिर शायद ऐसा मौका कभी उन्हें मिले या न मिले।
हिन्दू धर्म की रक्षा आज नहीं की गई तो फिर कभी नहीं की जा सकेगी।
इस से बड़ा धोखा आम भोले भाले हमारे हिन्दू भाईयों के साथ और क्या हो सकता है कि उन्हें भूख, बीमारी,
अशिक्षा और बेरोज़गारी जैसे बुनियादी मुद्दों से हटा कर धार्मिक भावनाओं के उन्माद के दलदल में धकेल
दिया जाए।
हिन्दू धर्म की उदारता और विराटता की बातें अब तक बहुत सुनते आए हैं और उसमें सच्चाई भी है। मगर
कट्टर सोच और उन्मादी क़िस्म के लोग इसे तबाह करने में लगे हुए हैं और जिन्हें न तो अपने देश से प्रेम है ना
ही समाज से और ना मानव धर्म से। उनकी ज़ुबान से मुसलमानों के लिए गाली ऐसे झड़ती है जैसे कि फूल
बरस रहे हों।
मैं ने जब वाल्मीकि रामायण पर उर्दू में एक स्टेज नाटक लिखा तो रामायण जैसे महान महाकाव्य को बड़ी
गहराई से पढ़ने का मौका मिला और उस से इतना कुछ सीखने और समझने को मिला कि में उसे ठीक ठीक
शब्दों में बयान नहीं कर सकता। इस महाकव्य के सारे पात्र बेहद उद्दात और महान प्रवृत्ति के हैं जिनसे सारी
उम्र सीखा जाए तो कम है।
अंत में मेरा अपने हिंदू भाईयों से विनम्र आग्रह है कि कम से कम राम जी के नाम पर नफरत फैलाने का काम
ना करें और ना ही इस महान देवता के नाम पर किसी को गाली गलौज दें। इतना बड़ा अपमान उनके साथ
और दूसरा कुछ हो ही नहीं सकता।
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डॉक्टर मोहम्मद अलीम संस्कृति पुरस्कार प्राप्त लेखक और पत्रकार हैं। अभी हाल ही में इन्होंने ‘इमामे हिन्द:
राम’ नामक नाटक की रचना की है। संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सीनियर फेलो हैं।
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